Category जन पत्रकारिता

संविधान पर चर्चा या कांग्रेस पर वार?

लोकसभा के शीतकालीन सत्र में संविधान के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में संविधान पर विशेष चर्चा आयोजित की गई थी। सत्तारूढ़ दल और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सारी ऊर्जा, लोकतंत्र के सशक्तिकरण और संवैधानिक मूल्यों को व्यावहारिक जीवन में उतारने के दृष्टिकोण की प्रस्तुति की अपेक्षा कांग्रेस की निंदा करते हुए खर्च हो गई।

इतिहास के फैसले: मंदिर, मस्जिद और न्यायालय

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की यह दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी कि 1991 का कानून 1947 से पहले के स्थानों के धार्मिक चरित्र की जाँच करने से नहीं रोकता है, ने ऐतिहासिक मस्जिदों का सर्वेक्षण करने के लिए अदालती आदेशों की बाढ़ ला दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या उन्हें मंदिरों को नष्ट करने के बाद सदियों पहले बनाया गया था। इसने सत्तारूढ़ पार्टी और निर्वाचित सरकारों द्वारा समर्थित हिंदुत्व संगठनों को खतरनाक तरीके से, यहाँ तक कि लापरवाही से अतीत को उजागर करने में सक्षम बनाया है। इसने पुरानी लड़ाइयों को पुनर्जीवित करने और नई लड़ाइयों को बनाने में मदद की है, और इसके माध्यम से खतरनाक रूप से सांप्रदायिक दरार को बढ़ाया है, जिससे धार्मिक लड़ाइयों को बढ़ावा मिला है, जो पीढ़ियों तक चल सकती हैं।

बुझता हुआ चिराग़ है संविधान की प्रस्तावना

जिस उदात्त सोच के साथ इस देश की संवैधानिक बुनियाद रखी गई थी, समय बीतने के साथ ही लगातार वह जर्जर होती गई। और, अब तो यकीन करना भी मुश्किल है कि यह वही देश है, स्वतन्त्रता के संघर्ष से निकले हुए तप:पूतों ने जिसका प्रस्ताव पास किया था।

सामाजिक-मानवीय आधार पर शिक्षा के पुनर्गठन की ज़रूरत

सत्ता और पूँजीवाद के गठजोड़ ने शिक्षा को अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। सामाजिक और मानवीय हित कहीं खो गए हैं। सामाजिक और मानवीय हितों को पुनर्स्थापित करने के लिए समाज और सामाजिक लोगों को ही शिक्षा के स्वरूप के पुनर्गठन की चिंता करनी होगी।

प्रौद्योगिकी के प्रभाव में ज्ञान-सृजन को अमानवीय नहीं बनाना चाहिए

मानवीय संपर्क, जिसके तहत विद्यार्थी कक्षा में दिलचस्प प्रश्न पूछ सकते थे, शिक्षकों को चुनौती दे सकते थे, आत्मनिरीक्षण कर सकते थे या अपनी बहस को कक्षा से बाहर निकालकर गलियारों और कैंटीन तक ले जा सकते थे, धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, क्योंकि शैक्षणिक परियोजना व्यक्तिगत और अलगावकारी होती जा रही है।

तीन नये आपराधिक दंड क़ानून और नागरिक स्वतंत्रता

तीन नये आपराधिक दंड क़ानूनों पर यह 'लोक स्वातंत्र्य संगठन' (पीयूसीएल) का दृष्टि-पत्र है, जो दिनांक 01 सितंबर, 2024 को 'भारतीय संसद द्वारा पारित तीन नये आपराधिक दंड क़ानून और नागरिक स्वतंत्रता पर बढ़ते ख़तरे' विषय पर आयोजित परिचर्चा में प्रस्तुत किया गया था।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से निपटने के लिए अपनी राजनीतिक चेतना में परिवर्तन लायें

जाति, वर्ग, जातीयता और लिंग की जटिलताओं पर विचार करने की आवश्यकता है। यह न्याय का प्रश्न है और साथ ही असमानता का भी, जो अन्याय को जन्म देती है।

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अधिकार : प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 का संदर्भ

प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 के द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार पर शिकंजा