Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : फाइव ट्रिलियन का सपना और लोगों पर बुलडोजर

"संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई।‌ खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा।‌ संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अपने शहर में एक सुबह

बात केवल शिक्षा के लिए समर्पित स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह के मकान में जिला जज का आवास बनाने और लाजपत पार्क में लाला लाजपत राय की कोई निशानी नहीं होने भर की नहीं है। बात है एक मुकम्मल इतिहास को दफ़न किए जाने की।

इन दिनों : कलियुग के अघोषित ईश्वर

"बहुत से लोग इन पर हंसते हैं। जो हंस नहीं पाते, वे विश्वास करते हैं। जो विश्वास नहीं करते, उन्हें भी लगता है कि क्या ठिकाना, जो कह रहे हैं, वही सच हो।" - इसी आलेख से

इन दिनों : लोकतंत्र पर मंडराते खतरे

संसद अब सवाल और जवाब नहीं, आरोप और प्रत्यारोप की जगह हो गयी है। राष्ट्र के अस्तित्व और लोकतंत्र की बुनियाद के जरूरी प्रश्न भी भद्दी बहसों में खो जाती है।

इन दिनों : वंदे मातरम और माता की रुलाई

"मान लिया कि उन्हें महात्मा गांधी और नेहरू पसंद नहीं है। उनकी तस्वीरें हिन्दू महासभा और आरएसएस के दफ्तरों में नहीं लगाती जा सकतीं। कम-से कम-सरदार पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें तो लगाते। मगर किसी आर एस एस के दफ्तर में इनकी तस्वीरें नहीं हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : पुनर्जागरण की जरूरत और पाखंडियों के स्वर

यह देश आज भी अस्त-व्यस्त, शंकालु और अरक्षित है। अनेक प्रयासों के बावजूद पुनर्जागरण के बदले प्रतिपुनर्जागरण हो रहा है। पढ़िए इस लेख में।

भारतीय राजनीति के संकट और अमेरिका की नयी राजनीति के सबक 

आलेख में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर के रूप में चुने जाने वाले ममदानी और काउंसलर के रूप में निर्वाचित होने वाले कम्युनिस्ट नेताओं की राजनीतिक रणनीति की विवेचना है और इसके साथ ही जन-जुड़ाव के चुनावी अभियान की संभावना की भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पड़ताल है।

इन दिनों : पिघलते रुपये का राजनैतिक हल गीता – कुरान पाठ

डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिरता जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री चुप हैं। उनके मंत्रीगण अजब-ग़ज़ब जवाब दे रहे हैं। पहले जो लोग हर छोटी-बड़ी बात पर हाहाकार मचाते थे, वे भी आज चुप हैं। मीडिया मौन है। शोर है तो केवल मंदिर और मस्जिद बनने का। क्या कारण है इसका? पढ़िए इस आलेख में।

इन दिनों : तुलसीदास मस्जिद में क्यों सोना चाहते थे

"तुलसीदास बहुत तंग हुए बनारस में। उनके समय से लेकर अब तक कितने मंदिर बने। आश्चर्य यह है कि मंदिर बनाने के लिए मुस्लिम बादशाहों ने जमीन दी।‌ मगर एक बनावटी कथा में तुलसीदास के राम घिर गए। बाबरी मस्जिद में आधुनिक स्वार्थी राजनीतिक संतों ने राम को उलझा दिया।" - इसी आलेख से

विदेशी पूंजी-पलायन और रुपये का अवमूल्यन (2025): भारतीय अर्थव्यवस्था के अधूरे संक्रमण का राजनीतिक–अर्थशास्त्रीय पाठ

"रुपये का गिरना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं; यह भारतीय विकास मॉडल के भीतर छिपे उस अंतर्विरोध का परिणाम है, जिसे तीन दशक से अनदेखा किया जा रहा है।" - इसी आलेख से