
व्यतीत का विश्लेषण राजनीतिक उठा-पटक और छल-छद्म को समझने में सहायक हो सकता है। परंतु वास्तविक चिंता राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संभावनाओं की होनी चाहिए। यह आलेख इन्हीं संभावनाओं का विश्लेषण करने की कोशिश करता है।

"प्रकृति की किसी भी चीज़ को मनुष्य ने निर्मित नहीं किया, फिर इन पर मनुष्य का एकाधिकार क्यों हो? ये तमाम चीज़ें सबके लिए हैं और किसी लालची तानाशाह को इसे बर्बाद करने की छूट देना मनुष्यता के साथ द्रोह है।" इसी आलेख से

" राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं।" इसी आलेख से

"भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है।" - इसी आलेख से

"प्रधानमंत्री ने विदेशी दौरे पर अरबों रूपये लुटाए और जिसका कुल नतीजा है कि वे ट्रंप के ट्रैप में हैं।" इसी आलेख से

शताब्दियों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त किए थे, वे फिर से कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाएँ कमज़ोर नहीं हो रही हैं। अपने अधिकारों को बनाए रखने और समानता के लिए पूरी दुनिया में महिलाएँ आज भी संघर्ष कर रही हैं। इस आलेख में चिंता और विश्वास दोनों हैं।

"चार महीने पूर्व भी मैंने लिखा था कि नीतीश कुमार के लिए बढ़िया है कि वे अब सम्मानपूर्वक विदा हो जायें, मगर लिप्सा कम खतरनाक नहीं होती। अंततः उनका कारुणिक अवसान हुआ- मुँह लिपलिपाते और पेट पर हाथ फेरते।" इसी आलेख से

"हाट से जानवर तक देखभाल कर लेते हैं और जिन्हें देश के नेतृत्व के लिए चुनते हैं, उन्हें कम से कम लापरवाही या भड़काऊ बयानों के आधार पर न चुनें।" इसी आलेख से

"इधर के दिनों में सभी हिन्दू पर्वों की व्याख्या हो रही है। होली की भी। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा में मन प्रह्लाद के पक्ष में रहता था। इधर पता चला कि प्रह्लाद का तो इस्तेमाल किया गया। ......." - इसी आलेख से

विश्व कप में "मौजूदा टीम सेमीफाइनल में पहुँच गयी है, लेकिन यह टीम बेहतर क्रिकेट नहीं खेल रही है। कैच टपकाना और पिच और ज़रूरत के हिसाब से क्रिकेट नहीं खेलना उनकी आदत बन गई है।" इसी आलेख से