Category जन पत्रकारिता

संसाधनों के दोहन से बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन : एक विश्लेषण

"प्राकृतिक संतुलन का तात्पर्य उस सामंजस्य से है, जिसमें सभी जैविक और अजैविक घटक एक-दूसरे के साथ संतुलित रूप से क्रियाशील रहते हैं। जब यह संतुलन बना रहता है, तब पृथ्वी पर जीवन सुचारु रूप से चलता है। किंतु ...." - इसी आलेख से

इन दिनों : वक्त ने किया, क्या हँसी सितम…

"सच यह है कि आँधी-तूफ़ान तो यहाँ आया हुआ है, जिसमें देश की बौद्धिक क्षमता चुक गई है और अबौद्धिक मेंढक की तरह टर्रा रहा है।" इसी आलेख से

इन दिनों :अनिर्वचनीयता के बीच सृष्टिखोर

"असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। आदमखोर नहीं, सृष्टिखोर।" - इसी आलेख से

इन दिनों : प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरी ज़िंदगियाँ 

"लोकतंत्र के सिपाही और औपनिवेशिक तंत्र के सिपाही के स्वभाव, बातचीत और लहजे में अंतर तो होना चाहिए। यह हमने सिखाया नहीं और न ज़रूरत महसूस हुई।" - इसी आलेख से

इन दिनों : जड़ों को याद करने या भूलने का मतलब क्या है?

a close up of a lion on a field
"जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से मिले व्यवहार, आस-पड़ोस के संबंधों की ख़ुशबू से अगर उखड़ गए तो फिर वे कहीं टिकते नहीं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : विष के दाँत तोड़ने ही होंगे

a lizard with its mouth open
"हर देश को देखिए। उसने विष के दाँत विकसित किए हैं। अपनी आय या कर्जखोरी का बड़ा हिस्सा मारने के उपकरण पर खर्च कर रहे हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : प्रकृति, असमय के मेघ और षडयंत्र

"मुड़वारा के बारे में तीन क़िस्से हैं, जिनमें से एक है अंग्रेज़ों और बाग़ियों से संबंधित। लोग सत्ता के ख़िलाफ़ बगावत न कर दें, इसके लिए अंग्रेज़ बाग़ियों के सिर काटकर टाँग देते थे। इसलिए इस स्थल का नाम मुड़वारा है।" - इसी आलेख से

20 साल की सत्ता से राज्यसभा तक

नीतीश कुमार की कहानी उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जो, राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में, सत्ता के केंद्र से हाशिये की ओर ढकेला जाता है।