अर्थशास्त्र की बुनियाद अभाव पर टिकी है, और वाणिज्यशास्त्र का आधार व्यापार पर। आइए! समझते हैं कैसे? इस अध्याय में हम दोनों का अंतर समझेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि इनकी हमारी जिंदगी में क्या जरूरत है। जरूरी नहीं है कि आपको इनमें पीएचडी करनी हो, पर इनकी ज़रूरतों को समझना आपके लिए बहुत जरूरी है।
सामाजिक विज्ञान हो या मानविकी की कोई शाखा, या चाहे विज्ञान हो या साहित्य, हर विद्या व्यक्ति और समाज के बीच का संबंध समझने का प्रयास करती है। एक छोटी सी कहानी से विधाओं के इस ताने-बाने को समझने का प्रयास करते हैं।
मेरा जन्म एक परिवार में हुआ। एक असहाय निर्बल काया, जिसे अगर जंगल में छोड़ दिया जाए तो शायद मैं अगले दिन का सूरज भी नहीं देख पाता। अब सब कोई मोगली तो होता नहीं। एक आदर्श माता-पिता की तरह उन्होंने मेरी हर जरूरतों को पूरी करने की कोशिश की। इन जरूरतों की पूर्ति करने के लिए उन्हें बाजार पर निर्भर करना पड़ा। क्योंकि वे अकेले खेती से लेकर मोबाइल फ़ोन का उत्पादन नहीं कर सकते थे। जब वे अपनी आमदनी और आपूर्ति के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश कर रहे थे। वे वाणिज्य-शास्त्र का प्रयोग कर रहे थे। लेकिन वे वाणिज्यशास्त्री नहीं हैं। शास्त्री वो होता है, जो इन विधाओं को पढ़ता है, समझता है। और यह भी अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि कहाँ समस्याएँ हैं, और जो उनका समाधान तलाशने का प्रयास करता वह शास्त्री कहलाता है। हर पीएचडी डिग्री वाला शोधार्थी नहीं होता।
बाज़ार से सामान लाने के लिए पैसे लगते हैं। ये पैसा क्या होता है? एक ५०० के नोट को छापने में ₹2.29 से ₹2.65 के बीच का खर्च होता है। फिर, क्या है जो इन्हें इतना मूल्यवान बनाता है? एक वादा, एक पंक्ति — “मैं धारक को ‘इतने’ रुपये की राशि का भुगतान करने का वचन देता हूँ।” कौन है जो यह गारंटी दे रहा है। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर, सीधा सरकार नहीं। इसके बदले रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा और स्वर्ण भंडार होता है। साथ ही उसके पास सरकारी प्रतिभूतियाँ, या Government Securities और क़ानूनी निविदा या Legal Tender होते हैं। तभी वह हमें यह गारंटी दे पाता है। वैसे गौर से देखें तो आरबीआई भी सरकार ही चलाती है। उसके गवर्नर से लेकर कर्मचारी वही नियुक्त करती है। इसलिए हमें नौकरशाही की जरूरत पड़ती है। भरोसा RBI पर होता है, पर असल में यह वादा हम, भारत के लोगों की ज़िम्मेदारी है। आख़िर सरकार से लेकर नौकरशाही, यहाँ तक कि बाज़ार भी हम ही तो चला रहे हैं।
तो अब मामला आता है, कि बाज़ार से सामान कैसे लाया है? यहाँ हमें अर्थशास्त्र की शरण में जाना पड़ता है। क्योंकि यहाँ समस्या अभाव की बन जाती है। अगर हमारे मम्मी-पापा के पास उतना पैसा होता, जितने की जरूरत होती, तो क्या बात होती? पर ऐसा होता नहीं। जब मैं छोटा बच्चा था, तब मेरे पास एक सवाल आया था — क्यों सरकार और पैसा छापकर सबमें नहीं बाँट रही। फिर कोई गरीब नहीं होगा। प्रॉब्लम ख़त्म, मुर्गी हज़म। पर, अफ़सोस ऐसा सरकार कर नहीं सकती। कर सकती तो १०-१०,००० काहे? १५-१५ लाख बाँट देती। सब पैसा लेकर मंदिर बनाते और घंटा बजाते ज़िंदगी कट जाती। अच्छे दिन भी आ जाते।
मगर, ऐसा हो नहीं सकता। मुद्रा छापना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। अगर आपूर्ति नहीं बढ़ी और मुद्रा बढ़ा दी, तो चीज़ें महँगी हो जाती हैं — यही महँगाई है। होगा अपार सोना आरबीआई के पास, पर अनंत नहीं है। और जुमलों की सरकार ने अपनी प्रतिभूतियों की धज्जियाँ उड़ा रखी है। सरकारी प्रतिभीतियाँ क्या होती हैं? सरकार अपनी योजनाओं से उतनी राशि कमाने का वादा करती है, और उसके बदले आरबीआई का गवर्नर हमसे वादा कर बैठता है। अगर सरकार अपनी कमाई नहीं बढ़ा पाती, तो मुद्रा का मूल्य गिरता है। यह दबाव आरबीआई को ब्याज दर, मुद्रण या विदेशी मुद्रा भंडार जैसे उपायों से सम्भालना पड़ता है, और रुपया गिरता जाता है। अब सरकार के पास अर्थोपार्जन का दो मुख्य जरिया है — एक तो टैक्स लगा दो, दूसरा प्रॉफिट कमाओ। सरकार मुनाफा कैसे कमाती है? पब्लिक सेक्टर संस्थाओं के ज़रिए, जैसे रेलवे। सरकार ने हमें यातायात की सुविधा दी, और उसके बदले हमने किराया दिया, सरकार को मुनाफा हुआ। जब सरकार की आमदनी और खर्च में बड़ा अंतर होता है, तो या तो टैक्स बढ़ते हैं, या उधारी। दोनों का असर जनता पर पड़ता है। हाल के पिछले कुछ सालों में तो मध्यम वर्ग की कमर तोड़ डाली सरकार ने ताकि आरबीआई के गवर्नर का वादा क़ायम रहे। जिस देश की सरकार अपने केंद्रीय बैंक को नहीं बचा पाती, वहाँ आर्थिक तबाही आती है। एक आदर्श अर्थव्यवस्था में नागरिकों को कम और उद्योगों को अधिक टैक्स देना चाहिए।
तो अब बाज़ार भी है, व्यापार भी है। पर ग्राहक के पास पैसे ही नहीं हैं। अर्थशास्त्र के अनुसार अभाव की आपूर्ति उत्पादन से ही संभव है। यह उत्पाद बाजार पहुँचेगा। अगर उसकी माँग ही नहीं हुई तो व्यापार नहीं होगा। इसलिए बाजार की जरूरत समझे बिना उत्पादन संभव नहीं। इस समझ के विकास की ज़िम्मेदारी ही तो शिक्षा और उसकी व्यवस्था की है। क्योंकि जब मैं पैदा हुआ था, अबोध था। जिस समझ, परिवेश में मैं पला-बढ़ा उसे पढ़ता-लिखता ही तो मैं आपके सामने आया हूँ। क्योंकि मुझे लगता है कि खाने के बाद सबसे बड़ा खतरा आज हमारे सामने शिक्षा है। जबसे मैंने होश संभाला है, सब मेरी शिक्षा को लेकर इतने चिंतित दिखे कि मैं परेशान हो गया। सबसे ज़्यादा हैरानी मुझे इस बात कि हुई — किसी को नहीं पड़ी थी कि मैं जानता क्या हूँ? जानना क्या चाहता हूँ? सबको नंबर, डिग्री और नौकरी की पड़ी है। क्या साहित्य में अर्थ नहीं? क्या एक किताब उत्पाद नहीं? मैंने तो अब तक छह लिखी है। स्वागत है आपका, नीचे दिये लिंक पर क्लिक कर आप उन सबकी पीडीएफ कॉपी पढ़ सकते हैं।
खैर, चलिए उत्पादन भी हो गया। अब वितरण कैसे होगा? खेती को ही ले लेते हैं। खेत से घर पहुँचने तक के उसके सफ़र में अर्थ और वाणिज्य का संबंध समझने की कोशिश करते हैं। खेत में किसान मजदूरी करता है, अपना ख़ून पसीना बहाता है। फिर वह मंडी में अपना सामान बेचता है, वह या तो सीधा अपने ग्राहक तक पहुँच सकता है। या फिर किसी निजी थोक व्यापारी को, या सरकार को भी बेच सकता है। जब अंतिम ग्राहक तक सामान पहुँचता है, तक प्रॉफिट होता है। किसानों की समस्या यह है कि लेबर या मजदूरी उन्हें मिलती नहीं, और प्रॉफिट भी उन तक पहुँचते-पहुँचते कई लोगों की नाजायज कमाई हो जाती है। यही तो भ्रष्टाचार है। अर्थ से ज़्यादा मुद्रण का होना ही तो अनैतिक है। अगर किसान के पास ज़मीन अपनी नहीं है, तो वह ज़मीन के मालिक को किराया या रेंट देता है। अगर उसने सरकार को बेचा, तो प्रशासन में काम करने वाले लोग अपने समय और हुनर के बदले वेतन ले रहे हैं। इस प्रकार अर्थशास्त्र हमें बताता है कि मुद्रण के वितरण के चार कारण होते हैं — मजदूरी या लेबर, वेतन या वेज, किराया या रेंट, मुनाफा या प्रॉफिट।
उत्पादन की प्रक्रिया में हर शैक्षणिक विधा का उपयोग होता है। विज्ञान के योगदान से ही तो हमारा संवाद करना इतना सरल हो पाया है। आप अपनी टिप्पणी जरूर लिखें, कितना आसान हो गया है।
समस्या और समाधान के बीच ही हमारी दुनिया झूलती रहती है। कैसे हम अपनी दुनिया चला सकते इसी इच्छा का नाम इहलोकतंत्र है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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