
"बिहार में शिक्षक को कक्षा से बाहर निकालने की एक स्थायी परंपरा बन चुकी है।......... हर बार तर्क एक ही दिया जाता है—“काम ज़रूरी है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी नहीं?
क्या शिक्षा हमेशा स्थगित की जा सकने वाली गतिविधि है?" - इसी आलेख से

"कोई मक्खी यों ही नहीं निगलता। इसके लिए मूल्य चुकाने होते हैं। यह मूल्य पैरवी और पैसे के रूप में चुकाए जाते हैं, लेकिन इस मूल्य के बदले में मरती है उच्च शिक्षा।" - इसी आलेख से

दुनिया में सबसे अधिक पढ़नेवाले देशों में भारत का स्थान दूसरा है। जबकि यहाँ बमुश्किल 10 प्रतिशत लोग मैट्रिक पास हैं। उनकी पढ़ाई का स्तर भी श्लाघनीय नहीं है। तो फिर वे कौन हैं, जिनके कारण भारत दुनिया का दूसरा सबसे पढ़ाकू देश है? - पढ़िए इस आलेख में।

"भीष्म ने कृपाचार्य से पूछा कि पांडव और कौरव को किस-किस चीज की शिक्षा दे रहे हैं? कृपाचार्य ने उल्लसित होकर उत्तर दिया कि इन्हें मल्ल युद्ध, धनुर्धर विद्या और शस्त्र संचालन की अनेक विद्याएँ दी जा रही हैं। भीष्म पितामह चिंतित हुए।" क्यों? पढ़िए इस आलेख में

दुनिया के अलग-अलग देशों में गहरी आर्थिक असमानता है और यह असमानता एक देश के भीतर अलग-अलग-क्षेत्रों और समुदायों में भी चिंताजनक रूप से व्याप्त है। यह आर्थिक असमानता शैक्षिक अवसरों की असमानता सृजित करती है और शैक्षिक असमानता सामाजिक-आर्थिक असमानता को पुनर्स्थापित करती है।

कहानी में कुछ ऐसा नहीं है, जो आकर्षित कर सके - न कथ्य, न शिल्प। लेकिन यह कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार दुहराया गया है। इसीलिए बार-बार कहे जाने की जरूरत भी है। इसी जरूरत के कारण इसे फिर से कहा गया है। आप चाहें तो इसे फिर से पढ़ सकते हैं।

"सीधा-सीधा दस हजारी योजना वोट खरीद योजना है। लोकतंत्र का आधार चुनाव है और चुनाव को धीरे-धीरे रसातल में लेकर जा रहे हैं।" - इसी आलेख से

"वंशीधर को जब नौकरी मिलती है तो उसका परिवार इसलिए खुश होता है कि इस पद में ऊपरी आमदनी बहुत है। आज ऊपरी आमदनी वाली पढ़ाई है। हम अपने बच्चे को उसी दिशा में ठेल रहे हैं। तब हम आप अच्छी राजनीति और अच्छा समाज कहां से पायेंगे?" - इसी आलेख से

देश की विविधता पूर्ण स्वतंत्र वैचारिक चेतना पर नियंत्रण के उद्देश्य से राजनीतिक नियामक समूह विकासोन्मुख नीतियों के नाम पर विद्यालयों में एक ऐसा शैक्षणिक ढाँचा तैयार करने जा रहा है, जो “राष्ट्रीय एकता” के नाम पर विविधता और आलोचनात्मक चेतना को दबा रहा है। - इसी आलेख से

जिस राज्य में महज 22% लोग ही किसी तरह पाँचवीं कक्षा तक पहुँच सके हों, एक तिहाई लोगों ने कभी स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा हो और 21% बच्चे दसवीं कक्षा की चौखट तक पहुँचने के पहले ही स्कूल से बाहर हो जाते हों, वह राज्य तो मध्यकाल के किसी पिछड़े हुए असभ्य समाज की तस्वीर पेश करता है। वहाँ के लिए स्वास्थ्य, रोजगार, समृद्धि आदि की बात ही बेमानी है। - इसी आलेख से