लोकसभा में गृह मंत्री का यह कहना कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की “शाखा” थी, केवल एक बयान नहीं है—यह उन असंख्य शहादतों का अपमान है, जिसने अंग्रेजों से लड़कर देश को मुक्त करने में अपनी सर्वश्रेष्ठ कुर्बानी थी
आज़ादी शाखा में बैठकर बड़ी बातें बोलने से नहीं मिली, बल्कि जेलों की कालकोठरियों में लिखी गई थी। नौजवानों के मुख से निकलता नारा “इंकलाब जिंदाबाद” आजादी की लड़ाई का मंत्र बन गया था। यह नारा किसी विदेशी शक्ति ने नही दिया था
बल्कि हमारे देश के ही एक कम्युनिस्ट नेता मौलाना हसरत मोहानी (उर्दू कवि और स्वतंत्रता सेनानी) ने 1921 में दिया था। जिसे और अधिक लोकप्रिय बनाने और देश भर के युवाओं के दिल तक पहुंचाने का श्रेय भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को जाता है, जिन्होंने 1929 में सेंट्रल असेंबली में बमबारी के समय इसे बुलंद किया।
हजारों किसानों ने अपनी जमीनें गंवाईं, मजदूरों ने अपना खून-पसीना बहाया—ताकि भारत गुलामी की जंजीरों को तोड़ सके। उस संघर्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केवल एक संगठन नहीं थी, बल्कि वह उस चेतना का नाम थी, जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सिखाया।
1925 में कानपुर की धरती पर जन्मी CPI किसी विदेशी आदेश का परिणाम नहीं थी, बल्कि भारत की पीड़ा, शोषण और विद्रोह की मिट्टी से उगी हुई एक क्रांतिकारी धारा थी। ब्रिटिश हुकूमत ने कम्युनिस्टों को इतना खतरनाक माना कि उन्हें “राज के खिलाफ युद्ध” के आरोप में सालों-साल जेलों में डाला गया। क्योंकि वे सिर्फ सत्ता से नहीं, व्यवस्था से सवाल कर रहे थे।
क्या भगत सिंह, सूर्य सेन, सोहन सिंह भगाना, सहजानंद सरस्वती, एम. एस. नंबूदिरिपाद, मौलाना हसरत मोहानी, जिन्होंने अपने जीवन की अंतिम साँस तक इस देश के लिए लड़ाई लड़ी—किसी “विदेशी शाखा” के सिपाही थे? या वे इस मिट्टी के सच्चे सपूत थे?
और सिर्फ यही नहीं—एम सिगरावालु, जिन्होंने भारत में मजदूर आंदोलन की नींव रखी, पहली बार मई दिवस मनाया और श्रमिक अधिकारों की आवाज बुलंद की और काम के घंटे आठ करो जैसे मुद्दों को उठाया। पी सी जोशी ने कम्युनिस्ट पार्टी के आंदोलन को एक व्यापक जनआंदोलन में बदला और मजदूरों के हक के साथ स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा। ए के गोपालन ने गरीबों, किसानों और दलितों के अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित किया और संसद में जनता की आवाज बनकर उभरे। कामरेड नंबूदिरिपाद ने ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकार का नेतृत्व किया और शिक्षा व भूमि सुधारों के जरिए सामाजिक न्याय का रास्ता दिखाया। कामरेड बी टी आर और डांगे जैसे नेताओं ने मजदूर वर्ग के संगठित संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर दिशा दी। इन नेताओं का संघर्ष क्या किसी “विदेशी एजेंडे” का हिस्सा था या भारत के करोड़ों मेहनतकश लोगों की आवाज थी?
ऐसे में अमित शाह का यह बयान न केवल CPI का अपमान है, बल्कि उन सभी वीर , महान और राष्ट्रप्रेमी सपूतों का भी अपमान है, जिन्होंने अपने खून से इस देश की आजादी का इतिहास गढा। यह उन माताओं के आँसुओं का अपमान है, जिन्होंने अपने बेटे खो दिए; यह उन गुमनाम सेनानियों का अपमान है, जिनकी पहचान सिर्फ एक कामरेड और स्वतंत्रता सेनानी की थी।
रूस की क्रांति से प्रेरणा लेना उस समय की जागती हुई दुनिया का हिस्सा था। लेकिन प्रेरणा को “विदेशी गुलामी” बताना, उस चेतना को बदनाम करना है, जिसने दुनिया भर में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
आज राष्ट्रवाद को संकीर्ण बनाने की कोशिश हो रही है—जहाँ असहमति को देशद्रोह और इतिहास को प्रचार में बदला जा रहा है। लेकिन भारत का असली राष्ट्रवाद ऐसा न था, न है और न ही होगा। हम विविधता में विश्वास करते है, हम संघर्ष में विश्वास करते है, जो बराबरी और न्याय के लिए खड़ा होता है।
भारत का राष्ट्रवाद उन करोड़ों लोगों की साझी विरासत है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के इस देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।
इतिहास को तोड़ा जा सकता है, लेकिन शहादत को मिटाया नहीं जा सकता। जब सत्ता शहादत को छोटा करने लगती है, तब वह खुद अपने राष्ट्रवाद को छोटा कर रही होती है।
संसद में बोले गए शब्द केवल शब्द नहीं होते—वे देश की आत्मा को छूते हैं। इसलिए याद रखना होगा:
राष्ट्रवाद केवल नारा नहीं है, बल्कि यह बलिदान की परंपरा है।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक









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