लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अधिकार : प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 का संदर्भ

प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 के द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार पर शिकंजा
आपातकाल का पुनरावलोकन -1 :      क्या संविधान की हत्या हुई थी?

आपातकाल का पुनरावलोकन -1 : क्या संविधान की हत्या हुई थी?

12 जून, 2024 को केंद्र सरकार ने घोषणा की कि 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जायेगा। ज्ञात हो कि 25 जून, 1975 को ही आपातकाल की घोषणा की गई थी। 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक अर्थात् 21 महीने की इस कालावधि को ‘लोकतंत्र की हत्या’, भारतीय इतिहास का काला अध्याय’ आदि विशेषणों से अभिहित किया जाता रहा है। इस घटना के व्यतीत …
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केंद्रीय शिक्षा बजट, 2024 : कैसे देखें, क्या देखें

केंद्रीय बजट 2024-25 में शिक्षा बजट के आबंटन की प्रवृत्ति और दिशा का विश्लेषण …
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लोकसभा चुनाव 2024 : संविधान को बचाने या बदलने का चुनाव 

‘संविधान बचाओ’ और ‘संविधान हटाओ’ की दृष्टि से लोकसभा चुनाव 2024 की समीक्षा …
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  1. विविधता और बहुलता का सम्मान- अभिव्यक्ति के अधिकार से विभिन्न विचारधाराओं और संस्कृतियों को प्रकट होने का अवसर मिलता है। यह समाज में बहुलता को बढ़ावा देता है और विभिन्न समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने में मदद करता है। 
  2. सरकार की जवाबदेही- जब नागरिक स्वतंत्रता से अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं, तो वे सरकार की नीतियों और कार्यों पर सवाल उठा सकते हैं। इससे सरकारों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक रहना पड़ता है और वे जनता की अपेक्षाओं के प्रति उत्तरदायी बनती हैं।
  3. सामाजिक परिवर्तन- अभिव्यक्ति का अधिकार सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने और बदलाव लाने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। जब लोग अपने विचार साझा करते हैं, तो यह सामाजिक न्याय, समानता और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष को प्रेरित कर सकता है। 
  4.  सूचना का प्रवाह- स्वतंत्र अभिव्यक्ति से पत्रकारिता और मीडिया को भी मजबूती मिलती है। स्वतंत्र मीडिया न केवल सूचनाओं का प्रवाह सुनिश्चित करता है, बल्कि यह सत्ता के खिलाफ एक महत्वपूर्ण चेक भी होता है। 
  5.  शिक्षा और जागरूकता- अभिव्यक्ति के अधिकार से नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया जा सकता है। यह उन्हें सशक्त बनाता है और समाज में शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाता है।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

रुपेश रॉय
रुपेश रॉय

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

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2 Comments

  1. माननीय मोदी जी की सरकार को न तो संविधान से सरोकार है और न ही लोकतंत्र से। वे मनुस्मृति के आधार पर शासन स्थापित करना चाहते हैं। बुद्धिजीवी उनके लिए अर्वन नक्सल हैं। …

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