Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : संस्कृतिहीनता के युग में

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"वे खूब ज्ञान परंपरा की तलाश करें, लेकिन वे बतायें कि वे ज्ञान परंपराएँ इतनी निर्बल क्यों थीं कि भारतीय परस्पर घृणा करते रहे और देश ग़ुलाम होता रहा?" पढ़िए इस आलेख में

शिक्षा, भाषा और समानता का सवाल

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शिक्षा-सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के आधारों पर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अच्छे स्कूल नहीं कहा जा सकता। कैसे? तथ्यों और तर्कों से अवगत होने के लिए पढ़े यह आलेख.

इन दिनों : मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है

"अड़ानी एनटीपीसी स्थल में ज्योंही हमलोगों ने प्रवेश किया, पहाड़िया जाति के बीसों स्त्री-पुरुष आ गए। ये लोग हताश-निराश हैं। कोई आता है तो उनके अंदर हल्की-सी आशा बंध जाती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : सच्चे बच्चों की चेतना में भूकंप

A mother correcting her teenage daughter's behavior during breakfast, conveying parenting dynamics.
"बच्चों को किताबों और नेट में झोंक दीजिए, फिर तो यंत्र ही बनेंगे और नहीं बन सके तो किसी कुकांड के शिकार होंगे। ऐसे ही बिगड़े बच्चों के मुँह पर ताले नहीं होते।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अँधेरे में लिपटता सत्य

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सोशल मीडिया पर या तो आप एआई की गिरफ्त में हैं या नफ़रत की या विज्ञापनों की। बहुत कम पोस्ट तार्किक और बौद्धिक होते हैं।

संसाधनों के दोहन से बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन : एक विश्लेषण

"प्राकृतिक संतुलन का तात्पर्य उस सामंजस्य से है, जिसमें सभी जैविक और अजैविक घटक एक-दूसरे के साथ संतुलित रूप से क्रियाशील रहते हैं। जब यह संतुलन बना रहता है, तब पृथ्वी पर जीवन सुचारु रूप से चलता है। किंतु ...." - इसी आलेख से

इन दिनों : वक्त ने किया, क्या हँसी सितम…

"सच यह है कि आँधी-तूफ़ान तो यहाँ आया हुआ है, जिसमें देश की बौद्धिक क्षमता चुक गई है और अबौद्धिक मेंढक की तरह टर्रा रहा है।" इसी आलेख से

इन दिनों :अनिर्वचनीयता के बीच सृष्टिखोर

"असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। आदमखोर नहीं, सृष्टिखोर।" - इसी आलेख से

इन दिनों : प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरी ज़िंदगियाँ 

"लोकतंत्र के सिपाही और औपनिवेशिक तंत्र के सिपाही के स्वभाव, बातचीत और लहजे में अंतर तो होना चाहिए। यह हमने सिखाया नहीं और न ज़रूरत महसूस हुई।" - इसी आलेख से