ग़ुलाम कौन होता है? जो किसी के हुक्म की तामील करने को मजबूर हो। वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकता। उसे बस अपने मालिक की इच्छा पूरी करनी है। अब सोचिए आप मालिक हैं। अगर अपने गुलाम से आपने कुछ करवाया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या किसी एक्सीडेंट में कार की गलती होती है? जाहिर है, गलती चालक की होती है। उसी तरह जिम्मेदारी मालिक की हुई।
पिछले एक दशक से देश में एकता की लहर चल रही है। सब कुछ इन्हें एक चाहिए। सब का मालिक एक ही प्रतीत होता है। लोकतंत्र एक आदमी की हुकूमत का नाम नहीं है। पर सोचिए! कोई ग़ुलाम क्यों होता है? क्योंकि आजादी की वह कल्पना नहीं कर पाता। वह सपना नहीं देख पाता। कल कोई समय मात्र नहीं है। कल एक स्थान भी है। जब भी हम कल के बारे में सोचते हैं तो ख़ुद को किसी परिस्थिति में किसी समय में देखते हैं। दिखता तो सबको है, दर्शन किसी-किसी को होता है। फिर कोई मसीहा आता है, मुक्ति के वादे करता है। कहता है अच्छे दिन का दावा है। हम अपना कल उसके नाम गिरवी रख देते हैं। एक दशक से तो देश में ऐसा ही होता आया है।जिसका परिणाम हाल में हुए AI Summit में देखने को मिला। चाइना का कुत्ता अपना बताकर हम टहला रहे थे। किसी ने पहचान लिया, हो गई बेज्जती। ऐसा लगातार क्यों हो रहा है?
हम देखते हैं कि नाले में डूबकर देश का युवराज मर जाता है। देश की राजधानी के दिल हुए छेद में गिरकर एक जवान शहीद हो जाता है। कफ सिरप पीकर बच्चे मर जाते हैं, और सरकार जवाबदेही से इनकार कर देती है। देश का IT Sector कंगाली की कगार पर है। देश की संप्रभुता दांव पर लगी है। और, देश को उत्सव मनाने की नसीहत दी जा रही है। आए दिन देश में दंगे का माहौल बना हुआ है। किसी का घर बुलडोजर से गिराया जा रहा है, तो किसी का महल बनाया जा रहा है।न्याय का राज खतरे में है, साफ़ नज़र आता है। सूचना क्रांति आज वह भ्रम भी तोड़ देती है, कि विकास बड़ी तेज़ी से हो रहा है। जब भी समाज में न्याय का संतुलन बहुमत में बिगड़ता है, तब सिर्फ़ सत्ता नहीं, सिस्टम के परिवर्तन का समय होता है। ऐसी दशा में मेरे पास एक सपना है, जो मैं आपको भी दिखाना चाहता हूँ।
अगर हर व्यापार में कोई समाज असफल हो रहा है, तो उसे समझ लेना चाहिए समस्या उसकी शिक्षा में है। एक उदाहरण से इसे समझते हैं।
इस सदी की शुरुआत में भारत ने वैश्विक पटल पर IT क्षेत्र में तहलका मचा दिया। जब 2010 में मैं एक IT इंजीनियर बनकर निकला तब मेरे पास एक नौकरी भी थी। एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज की हालत और IT कंपनी के अंदर की हालत देखकर मैं समझ गया था कि यहाँ गुंजाइश बहुत कम है। भारत की IT कम्पनियाँ बस देश-विदेश को अपनी सेवा बेच रही थी। किसी भी कंपनी के पास अपना कोई प्रोडक्ट, कोई उत्पाद नहीं था। और ना ही ऐसा करने में किसी की दिलचप्सी थी। मैं कई बार अपने मैनेजर के पास जाता और कहता — सर! आप मुझे सपोर्ट से हटाकर डेवलपमेंट में डाल दीजिए, मैं पूरी ईमानदारी से काम करूँगा। डेढ़ साल में एक बार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट मुझे मिला, उसके लिए मेरी तारीफ़ तो हुई। पर डेवलपमेंट में मुझे डाला नहीं गया।
कॉलेज की बात बताता हूँ। महाराष्ट्र का एक नामी प्राइवेट कॉलेज है। पढ़ाई से ज़्यादा परीक्षा की चिंता में छात्र और शिक्षक दोनों लगे पाए गए। कॉलेज के अंत-अंत तक तो मैंने परीक्षा से उम्मीद तक छोड़ दी थी। पास होने से ज़्यादा पढ़ने की मैंने ज़रूरत तक नहीं समझी। इंटरनल की कॉपियाँ तो ख़ाली छोड़ आता था। वहाँ सबको पता था कि पढ़कर करना क्या है? — नौकरी। मुझे नहीं करनी थी। खैर, मेरी समझ से उस दौर के इंजीनियरिंग कॉलेजों की कमोबेश यही दशा होगी।
हमारी शिक्षा व्यवस्था, जॉब मार्केट की डिमांड पूरी करने के लिए तैयारी का माध्यम मानकर रह चुकी है। आज तो दशा और भी दरिद्र है। आज दुनिया को हमारी सर्विस की जरूरत नहीं बची, और कोई प्रोडक्ट हमारे पास है नहीं। गलगोटिया विश्वविद्यालय कोई अपवाद नहीं है। वह तो उदाहरण बन चुका है।
शिक्षा का निजीकरण छात्रों को बाज़ार का ग़ुलाम बना देता है। शिक्षा को जनहित के लिए होना अनिवार्य है। जब तक किसी की अशिक्षा और बीमारी से मुनाफा होता रहेगा, ना ही कोई शिक्षित होगा, ना ही स्वस्थ। आज एक समाज बीमार पड़ा है। इसकी समस्या सिर्फ सत्ता नहीं है, सिस्टम है। हर सिस्टम समय के साथ जटिल और अप्रासंगिक होता जाता है। लोकतंत्र का यह मॉडल Max Weber की ब्यूरोक्रेसी पर आधारित है। ब्यूरोक्रेसी या नौकरशाही की एक ही समस्या है — आख़िर है, वह नौकर ही। उसे अंततः आदेश का पालन ही करना है। इसलिए, उन्हें लोक-सेवक मना गया। लोकतंत्र के प्रतिनिधि लोक नहीं होते – ना ही वे तंत्र के मालिक होते हैं। यह लोक, यह तंत्र हमारा है। हम जब तक इसका प्रबंधन जीवन के पक्ष में करने को तैयार नहीं होंगे, हमारा कल कभी सुरक्षित नहीं हो सकता। लोकतंत्र में आज नौकरशाही इस द्वंद्व में है कि सेवा किसकी करे – लोक की, या तंत्र की?
मेरे पिता बिहार के प्रसिद्ध अंगप्रदेश की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे। मेरी माँ वहीं देश के सबसे बड़े स्कूल की प्रांचाइज़ में शिक्षिका रही। शिक्षा व्यवस्था को मैंने काफ़ी अंदर से देखा है। अपना बचपन मैंने कॉलेज के प्रांगण में गुजारा है। और अपनी जवानी मैंने प्रोफेसरों की कॉलोनी में। मैंने अंदर से शिक्षा को अपने उद्देश्य से भटकते देखा है। छात्र और विद्यार्थी में अंतर होता है। विद्यार्थी बनने का फैसला हर छात्र के पास होता है। उसी प्रकार शिक्षक और गुरु बनने में भी चुनाव का फ़र्क़ है। शिक्षा जब तक व्यापार का साधन बनी रहेगी, तब तक बाज़ार में बाहर नहीं आएगी।
अब सवाल उठता है कि अगर शिक्षा ना निजी होगी, ना सरकारी, तो होगी कैसी? क्या शिक्षा पब्लिक की नहीं हो सकती?
हर स्कूल कॉलेज की देखभाल करने के लिए एक आर्थिक संस्था का गठन स्थानीय, राजकीय, और राष्ट्रीय स्तर पर हो। इस आर्थिक संस्था के पास हम, भारत के लोगों से लिए गए इनकम टैक्स का हिस्सा नीचे से ऊपर की तरफ़ बहेगा। पहले मुहल्लों, फिर जिलों, फिर राज्यों, और फिर देश की शिक्षा को बेहतर किया जा सकता है। एक बार शिक्षा सुधर गई, तो बाक़ी सब अपने आप सुधर जाएगा। इस आर्थिक इकाई का नाम मैंने पब्लिक पालिका रखा है। आपका क्या ख्याल है, पब्लिक पालिका काम करेगी? आख़िर यह लोकतंत्र चल तो हमारे लिए ही है।
सूचना क्रांति के बाद आज हमें शिक्षा क्रांति की जरूरत है, आख़िर इतनी सारी सूचनाओं से सही और ग़लत की पहचान हमें ज्ञान ही तो दे सकता है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)





