पॉलो फ्रेरे का समीक्षात्मक चेतना और कर्म का सिद्धांत (भाग 3)

पॉलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस भाग में फ्रेरे के द्वारा की गयी चेतना और कर्म की विवेचना और दोनों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

पौलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी विचार ‘समीक्षात्मक चेतना’ (Critical Consciousness) है, जिसे मूल पुर्तगाली भाषा में ‘कॉन्शियन्टाइजेशन’ (Conscientization) कहा जाता है। यह केवल साक्षर होने या पढ़ने-लिखने की क्षमता नहीं है, बल्कि अपनी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को गहराई से समझने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मानसिक शक्ति है।

नीचे समीक्षात्मक चेतना की अवधारणा, इसके विभिन्न स्तरों और व्यावहारिक उदाहरणों की विवेचना की गयी है –

फ्रेरे के अनुसार, समीक्षात्मक चेतना का अर्थ है: “अपनी स्थिति के पीछे छिपे हुए सामाजिक-राजनीतिक विरोधाभासों और शोषण के कारणों को पहचानना और उस दमनकारी व्यवस्था को बदलने के लिए कदम उठाना।” यह प्रक्रिया दो हिस्सों से मिलकर बनती है (जिसे फ्रेरे ‘प्रैक्सिस’ कहते हैं):

  1. चेतना (Reflection): यह समझना कि समाज में मेरे साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका असली कारण क्या है।
  2. कर्म (Action): केवल कारण को समझकर बैठ न जाना, बल्कि उसे बदलने के लिए समाज में सक्रिय भूमिका निभाना।

चेतना के तीन स्तर होते हैं –

फ्रेरे ने बताया कि एक शोषित समाज या व्यक्ति एक दिन में समीक्षात्मक नहीं बनता। चेतना के विकास के तीन मुख्य चरण होते हैं:

क) जादुई या अचेतन स्तर 

इस स्तर पर शोषित व्यक्ति अपनी गरीबी, बीमारी या दुर्दशा के कारणों को समझने में पूरी तरह असमर्थ होता है। वह अपनी स्थिति के लिए ‘भाग्य’, ‘भगवान की इच्छा’, ‘कर्मों का फल’ या ‘प्रकृति’ को जिम्मेदार मानता है। जैसे, एक गरीब किसान की फसल बाढ़ में बर्बाद हो जाती है या साहूकार उसकी जमीन हड़प लेता है। वह सोचता है, ‘यह तो मेरी किस्मत का दोष है, भगवान मुझसे नाराज हैं।‘ वह व्यवस्था के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर देता है और चुपचाप दुख सहता है।

ख) सहज या सतही स्तर 

इस स्तर पर व्यक्ति को यह तो समझ आने लगता है कि समस्या व्यवस्था में है, लेकिन उसकी समझ बहुत सतही होती है। वह समस्या के मूल कारण तक नहीं पहुँच पाता। वह व्यवस्था की कमियों को व्यक्तियों की कमियों के रूप में देखता है। उसे लगता है कि अगर कोई एक ‘अच्छा नेता’ या ‘अच्छा मालिक’ आ जाए, तो सब ठीक हो जाएगा। इस तरह वह वह शोषक वर्ग की ही नकल करने की कोशिश करता है। उदाहरण के लिए, वही किसान अब सोचता है, ‘साहूकार बुरा आदमी है, इसलिए उसने मेरी जमीन ली। अगर कोई अच्छा साहूकार होता, तो ऐसा नहीं करता।‘ वह पूरी साहूकारी व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय केवल उस एक व्यक्ति को दोष देता है।

ग) समीक्षात्मक चेतना 

यह चेतना का सर्वोच्च स्तर है। यहाँ व्यक्ति सतही बातों से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था के ताने-बाने को समझ जाता है। वह समझता है कि समस्याएँ किसी एक व्यक्ति की वजह से नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यवस्थित शोषण (Systemic Oppression) का हिस्सा है। वह खुद को इतिहास के एक निष्क्रिय ‘पात्र’ (Object) के बजाय इतिहास बदलने वाले ‘कर्ता’ (Subject) के रूप में देखने लगता है। जैसे, वह किसान अब समझता है, ‘जमीन का छिनना मेरी किस्मत नहीं है। यह सरकार की नीतियाँ, साहूकारी कानून और जातिगत भेदभाव का नतीजा है जो मुट्ठी भर अमीरों को फायदा पहुँचाने के लिए बनाए गए हैं। हमें अपनी जमीन वापस पाने और इस व्यवस्था को बदलने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।‘

फ्रेरे ने इस चेतना को जगाने के लिए क्लासरूम या कम्युनिटी में (क) ‘कोडिंग’ (Coding) और (ख) ‘डीकोडिंग’ (Decoding) की पद्धति का उपयोग किया।

(क) कोडिंग (Coding – परिस्थिति): मान लीजिए, निरक्षर मजदूरों की एक कक्षा में शिक्षक उन्हें एक तस्वीर दिखाता है। तस्वीर में एक अमीर जमींदार कार में बैठा है और सड़क पर एक मजदूर सिर पर भारी बोझ उठाए पैदल चल रहा है और पसीना बहा रहा है।

(ख) डीकोडिंग (Decoding – संवाद के जरिए): शिक्षक सीधे कोई भाषण नहीं देता। वह मजदूरों से सवाल पूछता है:

शिक्षक: “मजदूर पैदल क्यों चल रहा है और मालिक कार में क्यों है?”

मजदूर (शुरुआती जवाब): “क्योंकि मालिक अमीर है, उसके पास पैसा है।”

शिक्षक: “मालिक के पास पैसा कहाँ से आया?”

मजदूर: “वह व्यापार करता है, उसके पास बहुत जमीन है।”

शिक्षक: “उस जमीन पर पसीना कौन बहाता है?”

मजदूर (सोचते हुए): “पसीना तो हम बहाते हैं। दिन-रात हम खटते हैं, पर मुनाफा उसे मिलता है।”

परिणाम: इस खुली चर्चा (संवाद) से मजदूरों के भीतर समीक्षात्मक चेतना जागती है। वे अक्षरों को सीखने के साथ-साथ यह भी सीख जाते हैं कि उनके श्रम का शोषण कैसे हो रहा है।

जब किसी समाज में समीक्षात्मक चेतना का जन्म होता है, तो उसके निम्नलिखित परिणाम होते हैं:

  1. भाग्यवादिता का अंत: लोग यह मानना बंद कर देते हैं कि वे हमेशा गुलाम रहने के लिए ही पैदा हुए हैं। ‘किस्मत’ का डर खत्म हो जाता है।
  2. आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का उदय: शोषित लोग खुद को हीन समझना बंद कर देते हैं। उन्हें अपनी ताकत और गरिमा का अहसास होता है।
  3. एकजुटता: लोग व्यक्तिगत स्वार्थों और आपसी भेदभावों (जैसे जाति, धर्म) से ऊपर उठकर एक साझा दुश्मन (शोषक व्यवस्था) के खिलाफ एकजुट होते हैं।
  4. लोकतांत्रिक सहभागिता: ऐसे नागरिक सरकार से सीधे सवाल पूछते हैं, नीतियों का विश्लेषण करते हैं और लोकतंत्र में केवल वोट बैंक बनने के बजाय सक्रिय हिस्सेदार बनते हैं।

पॉलो फ्रेरे ने केवल समीक्षात्मक चेतना का ही जिक्र नहीं किया है, बल्कि कारण को समझकर उसे दूर करने में आने वाले अवरोधों और उसके निदानों की भी चर्चा करते हैं। उन्होंने कर्म को शिक्षाशास्त्र का एक अनिवार्य हिस्सा माना है। उनके अनुसार, बिना कर्म के चेतना केवल खाली विचार बनकर रह जाती है। फ्रेरे इस बात को ‘प्रैक्सिस’ (Praxis) के सिद्धांत से समझाते हैं, जिसका अर्थ है: विचार + कर्म = परिवर्तन

फ्रेरे ने स्पष्ट रूप से बताया है कि समीक्षात्मक चेतना जगने के बाद उसे कर्म में कैसे बदला जाए और इसके कौन-से स्तर होते हैं।

फ्रेरे के अनुसार, दमनकारी व्यवस्था को बदलने के लिए कर्म अचानक नहीं होता, बल्कि यह निम्नलिखित चरणों और स्तरों से गुजरता है:

1. संवाद और सह-अन्वेषण 

कर्म की शुरुआत अकेले नहीं, बल्कि समाज के अन्य उत्पीड़ित लोगों के साथ मिलकर होती है। यह तब संभव होता है, जब लोग एक साथ बैठकर अपनी साझा समस्याओं (जैसे- गरीबी, शोषण) पर संवाद करते हैं। यह संवाद ही कर्म की पहली सीढ़ी है, जहाँ लोग यह समझते हैं कि उनकी स्थिति किस्मत की वजह से नहीं, बल्कि एक गलत व्यवस्था की वजह से है।

2. सांस्कृतिक कर्म 

फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है। व्यवस्था को बदलने से पहले, लोगों को अपने भीतर बैठी ‘दमनकारी सोच’ को निकालना होता है। लेकिन यह आसान नहीं होता है। उत्पीड़ित लोग उत्पीड़न के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि अक्सर दमनकारी की सोच को ही सही मानने लगते हैं। गहराई तक भीतर बैठी इस सोच की समाप्ति सांस्कृतिक उपायों के माध्यम से ही संभव है। फ्रेरे इसे ‘सांस्कृतिक कर्म’ कहते हैं, जहाँ लोग नुक्कड़ नाटक, कला, और कविताओं के जरिए समाज की सोच को चुनौती देते हैं। यह कर्म का वैचारिक स्तर है।

3. संगठन का निर्माण (Organization)

जब चेतना व्यक्तिगत से सामूहिक बनती है, तब कर्म को एक ढाँचा या संगठन की जरूरत होती है। फ्रेरे का मानना है कि नेताओं को जनता पर अपनी मर्जी नहीं थोपनी चाहिए। बल्कि, नेताओं और जनता को मिलकर संगठन बनाना चाहिए। बिना संगठन के किया गया कर्म बिखर जाता है और कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाता।

4. क्रांतिकारी प्रैक्सिस (Revolutionary Praxis)

यह कर्म का सबसे उच्चतम और व्यावहारिक स्तर है, जहाँ लोग सीधे दमनकारी व्यवस्था या नीतियों को बदलने के लिए जमीन पर उतरते हैं। इसमें शांतिपूर्ण प्रतिरोध, आंदोलनों में भाग लेना, और नई न्यायपूर्ण संस्थाओं का निर्माण करना शामिल है। यहाँ चेतना और कर्म पूरी तरह एक हो जाते हैं। लोग केवल व्यवस्था की आलोचना नहीं करते, बल्कि उसे व्यावहारिक रूप से बदल देते हैं।  

फ्रेरे कहते हैं कि कोई भी कर्म तब तक सच्चा ‘कर्म’ नहीं है, जब तक उसमें ये तीन बातें न हों:

  • यह दमनकारी जैसा नहीं होना चाहिए: उत्पीड़ितों का मकसद खुद दमनकारी बनना नहीं, बल्कि दमन को हमेशा के लिए खत्म करना होना चाहिए।
  • यह संवादहीन नहीं होना चाहिए: कर्म में तानाशाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र और आपसी सहमति होनी चाहिए।
  • यह निरंतर होना चाहिए: समाज बदलने के बाद भी कर्म रुकना नहीं चाहिए, नहीं तो नई व्यवस्था में भी नए दमनकारी पैदा हो जाएँगे।

फ्रेरे के अनुसार, केवल बातें करना या केवल बिना सोचे-समझे आंदोलन करना क्रांति नहीं है। दुनिया को बदलने के लिए चिंतन और कर्म – इन दोनों तत्वों का एक साथ होना अनिवार्य है। यदि इन दोनों में संतुलन न हो, तो शिक्षा और राजनीति दोनों भटक जाते हैं। यह भटकाव दो तरह के होते हैं –

क) पहला भटकाव: केवल चिंतन (शब्दजाल)

जब लोग केवल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, किताबें लिखते हैं, सेमिनार करते हैं, लेकिन जमीन पर उतरकर कोई काम नहीं करते, अर्थात् कर्म-विहीन चिंतन। फ्रेरे इसे ‘खोखला शब्दजाल’ कहते हैं। इससे समाज में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आता। यह केवल बुद्धिजीवियों का मनोरंजन बनकर रह जाता है।

ख) दूसरा भटकाव: केवल कर्म (अंध-क्रियावाद)

बिना सोचे-समझे, बिना किसी वैचारिक समझ या योजना के सीधे सड़कों पर उतर जाना, तोड़-फोड़ करना या आंदोलन शुरू कर देना। फ्रेरे इसे ‘दिशाहीन छटपटाहट’ कहते हैं। बिना चेतना या चिंतन के किया गया आंदोलन या तो बहुत जल्द शोषक वर्ग द्वारा कुचल दिया जाता है, नहीं तो वह खुद एक नए दमनकारी ढाँचे में बदल जाता है।

सच्चा प्रैक्सिस तब होता है जब एक मजदूर या छात्र पहले अपनी स्थिति पर चिंतन करता है (कि मेरा शोषण क्यों हो रहा है?), शोषण और उसके स्वरूप को समझता है; फिर उस शोषण को बदलने के लिए कर्म करता है (आंदोलन या संगठन बनाता है), और कर्म करने के बाद फिर से चिंतन करता है कि हमसे कहाँ चूक हुई और आगे क्या करना है। यह एक निरंतर चलने वाला चक्र (Cyclical Process) है।

फ्रेरे के चेतना और कर्म के सिद्धांत उनके व्यावहारिक संघर्षों की उपज हैं। ये सिद्धांत हमें केवल यह सूचना नहीं देते हैं कि फ्रेरे ने इस तरह काम किया था या उन्होंने गन्ना मजदूरों के साथ काम करते हुए ऐसा सोचा था; बल्कि यह शिक्षा, समाज और राजनीति में परिवर्तन की एक राह प्रस्तुत करता है। इसीलिए यह आज भी तमाम प्रगतिशील शिक्षकों, राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है।

(अगले अंक में “पॉलो फ्रेरे के 45 दिनों का शिक्षा मॉडल और परिणाम”)

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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