Category जन पत्रकारिता

महिलाएँ पीछे नहीं जाएँगी

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शताब्दियों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त किए थे, वे फिर से कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाएँ कमज़ोर नहीं हो रही हैं। अपने अधिकारों को बनाए रखने और समानता के लिए पूरी दुनिया में महिलाएँ आज भी संघर्ष कर रही हैं। इस आलेख में चिंता और विश्वास दोनों हैं।

इन दिनों : एक मुख्यमंत्री का करुण अवसान

"चार महीने पूर्व भी मैंने लिखा था कि नीतीश कुमार के लिए बढ़िया है कि वे अब सम्मानपूर्वक विदा हो जायें, मगर लिप्सा कम खतरनाक नहीं होती। अंततः उनका कारुणिक अवसान हुआ- मुँह लिपलिपाते और पेट पर हाथ फेरते।‌" इसी आलेख से

इन दिनों : मिसाइलों की चपेट में आदमी के सपने

Four missiles on a launch platform with brick wall background
"हाट से जानवर तक देखभाल कर लेते हैं और जिन्हें देश के नेतृत्व के लिए चुनते हैं, उन्हें कम से कम लापरवाही या भड़काऊ बयानों के आधार पर न चुनें।" इसी आलेख से

इन दिनों : होली के रंग और ज्ञान के संग

people gathering on a concert
"इधर के दिनों में सभी हिन्दू पर्वों की व्याख्या हो रही है। होली की भी। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा में मन प्रह्लाद के पक्ष में रहता था। इधर पता चला कि प्रह्लाद का तो इस्तेमाल किया गया। ......." - इसी आलेख से

इन दिनों : एक अनाड़ी की क्रिकेट-टिप्पणी

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विश्व कप में "मौजूदा टीम सेमीफाइनल में पहुँच गयी है, लेकिन यह टीम बेहतर क्रिकेट नहीं खेल रही है। कैच टपकाना और पिच और ज़रूरत के हिसाब से क्रिकेट नहीं खेलना उनकी आदत बन गई है।" इसी आलेख से

इन दिनों : लोकतंत्र और निरंकुश सत्ता

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"हर तानाशाह के कुछ चमकते नारे होते हैं, जिसमें जनता उलझ-पुलझ कर रहे जाती है। जनता नारों का गुलाम बन कर देश की गुलामी पर दस्तखत कब कर देती है, इसका पता नहीं चलता।" - इसी आलेख से

इन दिनों : राजनीति के दो छद्म चेहरे

"अरविंद केजरीवाल आज आज कैमरे के सामने रो रहे हैं। कैमरे के सामने रोने में नरेंद्र मोदी जी भी अव्वल हैं। दोनों ड्रामा किंग हैं।" - इसी आलेख से

संविधान से समाधान तक

"चाहे लिखित हो या नहीं, हर देश काल में हर समाज के पास एक संविधान रहा है। संविधान ऐसे नियम-क़ानूनों का दस्तावेज है, जो उस समाज की राजनीति की हदों को निर्धारित करती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : वैश्विक कोतवाली के कोतवाल

"किसी की धरती को पिता और किसी की धरती को माँ कहने में कौन सी बुद्धिमानी है? विदेश नीति इससे कहाँ मजबूत हो जाती है?" - इसी आलेख से

इन दिनों : शर्म पर गर्व और गर्व पर शर्म का अमृत काल

"देश में सत्ता की ओर से फैलाई जा रही नफ़रत और हिंसा के शिकार कौन होगा, कहा नहीं जा सकता। इतना भर जरूर कहा जा सकता है कि आसार अच्छे नहीं हैं।" - इसी आलेख से