Category जन पत्रकारिता

दस्तावेज़ों के अनुसार कौन है भारत का नागरिक?

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न पासपोर्ट, न आधार कार्ड, न वोटर आईडी कार्ड - तो राज्य के द्वारा भारतीय नागरिकों को कौन ऐसा दस्तावेज़ उपलब्ध कराया गया है, जो नागरिकता का सर्वमान्य प्रमाणपत्र है?

पौलो फ्रेरे का बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक शिक्षा (भाग 2)

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : वैचारिक उदात्तता और संकीर्णता

a large building with a clock tower on top of it
"अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और हाल-चाल पूछा। मैंने उनसे पूछा कि कक्षाएँ ख़ाली क्यों हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि दोनों सत्र के छात्र सेंट अप हो चुके हैं। ...." इसी आलेख से

हार के बाद क्यों शुरू होता है ‘आंतरिक लोकतंत्र’?

प्रस्तुत आलेख में चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट के बहाने भारत के राजनीतिक परिदृश्य की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : युवाओं का प्रदर्शन: साज़िश, संदेह और उम्मीदें

"ये लोग हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही जैसे शब्दों से शुरू होते हैं और वहीं ख़त्म।" - इसी आलेख से

इन दिनों : हवा के नये झोंके से कुछ सवाल

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"एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लोगों को अपनी राय स्पष्ट रूप से रख देनी चाहिए।" - इसी आलेख से

इन दिनों : वक्त का तराना

"आज़ादी इसलिए नहीं मिली थी कि जिनके पूर्वजों ने ख़ून बहाया, उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठने लगे। उन्हें 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा जाने लगे। ऐसे ही वक़्त में रणभेरी बजती है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बदजुबानी की राजनीतिक संस्कृति

"नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो भी किताबें पढ़ते थे और बौद्धिक जनों से जीवंत रिश्ता बनाए रखते थे। आजकल के नेताओं की तरक़्क़ी बदज़ुबानी से होती है, इसलिए वे एक-से-एक बयान देते हैं।" - इसी आलेख से

क्या डीके शिवकुमार बदल पाएंगे सत्ता-विरोधी राजनीति का चार दशक पुराना गणित?

"कर्नाटक का मतदाता आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व विश्वसनीयता—तीनों का संयुक्त मूल्यांकन करता है।" - इसी आलेख से

उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (भाग 1)

ब्राजील के पौलो फ्रेरे का 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' दुनिया की मशहूर किताबों में एक है। यह आलेख-माला इसी पुस्तक पर आधारित है। इसे चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले भाग में पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' का संक्षिप्त परिचय, दूसरे भाग में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक कार्रवाई के परिणाम, तीसरे भाग में सामाजिक चेतना और 'प्रैक्सिस' का सिद्धांत तथा चौथे भाग में गांधी और अंबेडकर के सिद्धांतों के साथ फ्रेरे के सिद्धांतों की तुलना की गई है।