‘इहलोकतंत्र’ एक किताब का नाम है, जिसमें मैंने अपना अनुभव, अपना ज्ञान, अपना अनुमान लिखा है। इहलोकतंत्र एक सपना है, जहाँ लोकतंत्र अपना हो। अभी तक मैंने इस साहित्य के पाँच खंड लिखे हैं। छठा आपके सामने है। आप इसे मेरा लोकतांत्रिक प्रयोग समझ सकते हैं। आपकी तरह ही मैं भी इस सिस्टम से परेशान हूँ। पहले इंजीनियरिंग की, फिर नौकरी मिली। स्कूल से लेकर कॉलेज तक मैंने पढ़ाई कम, और नौकरी की तैयारी ही ज़्यादा की। नौकरी छोड़ने से लेकर दर्शनशास्त्र में गोल्ड मेडल तक की कहानी आप मेरी किताबों में पढ़ सकते हैं। आइए! मैं आपको अपनी रचना की कहानी सुनाता हूँ।
कहानी शुरू होती है — 6 अप्रैल, 2023 से, जब पिताजी के चुनाव का परिणाम आता है। मेरे पिताजी हिंदी साहित्य के प्रोफेसर रह चुके हैं। तब उन्होंने कोशी निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद से एमएलसी का चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बस सरकारी शिक्षक और प्रोफेसर ही वोट कर सकते थे। मेरे पिताजी की छवि ईमानदार है। लोकतंत्र पर मुझे पूरा भरोसा है। इसके पहले भी पिताजी तीन चुनाव लड़ चुके थे। तीनों में वे हार गए। वे अपने उसूलों पर लड़ते रहे। निर्दलीय लड़े। जाति और पैसे की राजनीति उन्होंने कभी नहीं की। नतीजन वे इस बार भी हार गए। मैंने पिताजी के चुनावी प्रचार में इस क्षेत्र के लगभग सरकारी स्कूल-कॉलेज का दौरा किया। उनकी हालत देखकर मुझे भी यकीन होने लगा था कि अगर पिताजी चुनाव जीत जाते हैं, तो जरूर इनका कुछ भला हो जाएगा। उन्होंने कभी पैसे की हेरा-फेरी नहीं की। जितना वेतन मिलता था, उसी से चुनावी प्रचार से लेकर घर चलता आया है। मुझे पूरा यकीन है, अगर वे चुनाव जीत भी जाते तो हमारे घर पर कोई भ्रष्टाचार नहीं होता।
खैर, मैंने तब लिखना शुरू किया। मैंने चुनावी अनुभव के साथ, जो कुछ भी मैंने तब तक लिखा था, उसे इकट्ठा कर इहलोकतंत्र के पहले भाग में डाला, और दूसरा भाग लिखने बैठ गया। इस समय तक मैं लोक सेवा की परीक्षाओं की तैयारी कर चुका था, दर्शनशास्त्र से मेरा MA पूरा चुका था। मैंने UGC-NET की परीक्षा भी निकाल ली थी। पर बचपन से मैं लेखक बनना चाहता था। पिछले ही साल 2022 में मैंने अपनी पहली किताब Lifeconomics (जीवर्थशास्त्र) लिखी थी। अंग्रेजी में थी, मेरी बात घर वालों तक भी नहीं पहुँच पायी। मेरी पूरी गृहस्थी हिंदी साहित्य पर टिकी हुई है। मेरी माँ भी हिंदी की शिक्षिका थी, अब दोनों सेवा-निवृत हो चुके हैं। मेरी पत्नी भी हिंदी से MA है, पीएचडी पूरा करते-करते रह गई। हम दोनों ने मिलकर इस सिस्टम में पीएचडी करने से इनकार कर दिया। जहाँ हम अपना विषय तक नहीं चुन पा रहे थे। प्रोफेसर अपनी सुविधा हमारा विषय तय करते। मेरी पत्नी बताती थी कि उसके कई सहपाठी तो प्रोफेसरों के घर में डिग्री के लिए झाड़ू-पोछा तक करते थे।
इहलोकतंत्र का दूसरा भाग मेरे अनुभवों और अनुभूतियों का संग्रह है। सात सौ पन्नों में पसरे दो लाख से भी अधिक शब्द आपका इंतेज़ार कर रहे हैं। मैंने इसकी रचना में अपनी कलम और अपने विचार की गति से कदमताल मिलाने की कोशिश की है। अपन अतीत से प्रत्यक्ष को शब्द सेने की कोशिश की है। यह प्रयास थोड़ा बिखरा हुआ लगा। इसलिए, मैं इहलोकतंत्र का तीसरा भाग लिखने बैठ गया। इस बार मेरी मंशा अपने अनुमान को और स्पष्ट करने की थी। मैंने इहलोकतंत्र की अवधारणा पर अपने विचार लिखे। अधिकरण प्रकाशन ने इसे छापा भी, पर मुझे पाठक नहीं मिले।
हिंदी में प्रोफेसर बनना आसान है, पर लेखक बनना नहीं। मेरी समझ नहीं आ रहा था — आगे क्या? मैंने पिताजी से इजाज़त ली, और एक लंबी सड़क यात्रा पर निकल गया। बिहार के भागलपुर से अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक, चीन की सीमा तक गाड़ी हाँकता मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ निकल पड़ा। इहलोकतंत्र का चौथा भाग इस यात्रा का वृतांत है। पांचवा भाग शिक्षा पर किए एक प्रयोग का वर्णन है। इन पाँच भागों में एक मिलियन शब्दों से ज़्यादा लग गए मुझे अपनी बात रखने में, फिर भी ये विचार आज भी सन्नाटे में मेरे साथ ही गूंज रहे हैं।
इहलोकतंत्र का यह छठा भाग उन विचारों को प्रसारित करने का एक प्रयास है। क्यूंकि मुझे लगता है, लोकतंत्र में परलोक, या पाताललोक की बातें नहीं होनी चाहिए। हमारी समस्या इस दुनिया से जुड़ी है, कोई मसीहा हमारी इन मुसीबतों से हमें मुक्त करने नहीं आने वाले। दर्शन के अध्ययन के दौरान मुझे एक बात लगभग हर दर्शन में एक समान मिली — अज्ञानता ही हमारे दुखों का कारण है।
आप ख़ुद ही सोचिए — अज्ञानता कम करने की जिम्मेदारी किसकी है? अगर शिक्षा व्यवस्था की नहीं है तो?
इन सालों में प्रयोग और अनुमान के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि किसी भी लोकतंत्र को समृद्ध होने के लिए हमें शिक्षित होना जरूरी है। यहाँ तक पहुँचने वाला ना मैं पहला हूँ, ना ही आख़िरी। देश की राजनीति और अर्थनीति के अनुसार मैंने एक सामाजिक और राजनैतिक दर्शन पर काम करना शुरू किया। उस परियोजना का नाम मैंने पब्लिक पालिका रखा। इसका मैनिफेस्टो और इससे जुड़ी सामग्री मैंने एक वेबसाइट बनाकर अपने इहलोक के साथ साझा भी किया। आज भी मैं इस परियोजना पर काम कर रहा हूँ। हर दिन इसे बेहतर बनाने के प्रयास ही आज हमारे संवाद का साधन बना है।
पब्लिक पालिका की अवधारणा जीवर्थशास्त्र पर आधारित है। यहाँ मैंने जीवन की जरूरतों को तीन त्रयों में बांटा है — आवश्यक, अस्तित्वगत, और शाश्वत। मेरी समझ से आवश्यक त्रय को बाजार से मुक्त कर देना चाहिए, तभी हम एक ऐसा लोकतंत्र स्थापित कर पाएंगे, जिसका सपना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हम, भारत के लोगों ने देखा था। स्वराज का सपना। “स्वराज” एक राजनैतिक अवस्था ही नहीं है, यह एक दार्शनिक चित्रण है जो हमारे चरित्र में प्रतिबिंबित होना चाहिए। स्वराज सिर्फ एक विचार ही नहीं, व्यवहार है। आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था में स्वराज की राजनैतिक कापना का नाम ही इहलोकतंत्र है। जहाँ लोकतंत्र चुनाव तक सीमित ना हो, बल्कि हमारे दिनचर्या का हिस्सा बने। हर घर लोकतंत्र हो, अभिव्यक्ति की आजादी हर घर-आँगन में हो। इहलोकतंत्र एक घरेलू लोकतंत्र की परिकल्पना है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








