भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है?

"इस दस्तावेज़ में किया गया आकलन उन सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है, जिनका प्रयोग राज भाषाओं के रूप में हो रहा है। जो भारतीय भाषाएँ राजभाषाएँ नहीं हैं, उनकी दुर्दशा के बारे में तो बात न करना ही अच्छा होगा। इनमें से बहुत सी तो आखरी साँस ले रही हैं।"

अंग्रेजों के भारत छोड़ने के  65 वर्ष पश्चात् भी भारत में अभी भी उन मुद्दों पर बहस करनी पड़ रही है, जो मुद्दे स्वतंत्रता आन्दोलन की अगुवाई कर रहे सेनानी स्वतंत्रता से पहले ही निपटा चुके थे और उन पर स्पष्ट नीतियों का ऐलान कर चुके थे। इन नीतियों में से एक क्षेत्रीय भाषा नीति का था। कांग्रेस पार्टी ने 1929 में अपने लाहौर सैशन में ही इस बारे में स्पष्ट एलान किया था कि स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में  मातृ भाषाओं को शिक्षा और प्रशासन का आधार बनाया जाएगा और भारतीय भाषाओं को उच्च स्तरीय कार्यों के लिए सक्षम बनाने हेतु आवश्यक कदम उठाये जाएँगे। शहीद भगत सिंह तो 15 वर्ष की उम्र में ही यह समझ प्राप्त कर चुके थे और लिख चुके थे कि ‘पंजाब में पंजाबी भाषा के बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता’गाँधी जी ने तो 1938 में ही स्पष्ट कहा था कि “क्षेत्रीय भाषाओं को उन का आधिकारिक स्थान देते हुए शिक्षा का माध्यम हर अवस्था में तुरंत बदला जाना चाहिए।” एक और अवसर पर उन्होंने कहा था कि ‘अंग्रेज़ी भाषा के मोह से निजात पाना स्वाधीनता के सब से ज़रूरी उद्देश्यों में से एक है।‘ स्वतंत्रता के पशचात कुछ भारतीय भाषाओं के विकास के लिए कुछ प्रयत्न भी हुए और इस से शिक्षा इत्यादि में अच्छे नतीजे भी प्राप्त हुए। पर 1980 के आस-पास इस सारे रुझान को उल्टी दिशा दी जाने लगी। 1990 के बाद से तो अंग्रेज़ी भाषा ने भारतीय मातृ-भाषाओं को शिक्षा से बाहर ही निकालना शुरू कर दिया। पिछली सदी के खत्म होने तक ऐसी स्थितियाँ पैदा हो गईं कि पंजाबी जैसी पुरातन और विकसित भाषा का अस्तित्व खतरे में पड़ने के बारे में भी चिंता भरे बयान सामने आने लगे। 21वीं सदी के पहले दशक के मध्य ही में समाचारपत्रों में ऐसे बयान आने लगे कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामजिक मामलों से सम्बन्धित एजेन्सी यूनेस्को (UNESCO) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पंजाबी 50 वर्षों में लोप हो जाने वाली है।

यूनेस्को ने पंजाबी के बारे में तो ऐसा कोई बयान नहीं दिया था, पर यूनेस्को ने कुछ ऐसे मानदंड निर्धारित किए थे जिन के आधार पर किसी भाषा के सम्मुख खतरों के बारे में वैज्ञानिक ढंग से निर्णय किया जा सकता हो[ 1 ]। इन मानदंडों के आधार पर ही शायद यह प्रभाव बना था कि पंजाबी भाषा का भविष्य अच्छा नहीं।

ऐसे प्रभावों में से पैदा हुए बयानों के सामने आने के समय से ही पंजाबी के बारे में यह चर्चा लगातार चल रही है कि पंजाबी भाषा का भविष्य क्या है। भले ही यूनेस्को ने पंजाबी के बारे में ऐसा कोई बयान नहीं दिया, पर यह तथ्य अपने-आप में बहुत महत्वपूर्ण है कि पंजाबी के बारे में ऐसा प्रभाव बन सकता है कि पंजाबी को भी यूनेस्को की लोप होने वाली भाषाओं की सूची से जोड़ा जा सकता हो। यह स्थिति केवल पंजाबी भाषा की ही नहीं है, सभी भारतीय भाषाएँ इस स्थिति से गुज़र रही हैं और जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं। इससे भारी शैक्षिक, सांस्कृतिक, और आर्थिक नुकसान हो रहे हैं।

सो, ऐसी स्थिति में यह भारतीयों के सामने लाना ज़रूरी हो जाता है कि किसी भाषा की स्थिति के बारे में निर्णय करने के लिए क्या मानदंड हैं और इन मानदंडों के आधार पर भारतीय भाषाओं  की क्या स्थिति है। इस दस्तावेज़ में किया गया आकलन उन सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है, जिनका प्रयोग राज भाषाओं के रूप में हो रहा है। जो भारतीय भाषाएँ राजभाषाएँ नहीं हैं, उनकी दुर्दशा के बारे में तो बात न करना ही अच्छा होगा। इनमें से बहुत सी तो आखरी साँस ले रही हैं।

किसी भाषा की सबल अथवा कमज़ोर अवस्था का पता लगाने के लिए यूनेस्को के 2003 में छपे दस्तावेज़ (भाषीय प्राणशक्ति और खतरे की अवस्था) में निचले 9 कारक दिये गए हैं, जिन के आधार पर किसी भाषा की ताकत अथवा उस पर छाये संकट को आँका जा सकता है:

  1. पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचार।
  2. बोलने वालों की गिनती।
  3. कुल आबादी में बोलने वालों का अनुपात।
  4. भाषीय प्रयोग के क्षेत्रों में प्रचलन।
  5. नए क्षेत्रों और संचार माध्यमों को स्वीकृति।
  6. भाषीय शिक्षा और साक्षरता के लिए सामग्री उपलब्ध होना।
  7. सरकारों और संस्थानों का भाषा के प्रति रवैया और नीतियाँ (सरकारी रुतबा और प्रयोग सहित)।
  8. भाषीय समूह की ओर से अपनी भाषा के प्रति रवैया।
  9. प्रलेखीकरण (documentation ) की किस्म और गुणवत्ता।

यूनेस्को की सम्बन्धित रिपोर्ट के अनुसार किसी भी भाषा पर खतरे को उपर दिए नौ कारकों के आधार और नीचे दिए छ: दर्जों में बांटा जा सकता है ( देखिए, यूनेस्को 2003:8 ):

  1. लोप होने का कोई खतरा नहीं।
  2. लोप होने का खतरा है।
  3. लोप होने का गंभीर खतरा है।
  4. लोप होने का बहुत गंभीर खतरा है।
  5. लोप होने वाली है।
  6. लोप हो चुकी है।

यूनेस्को की सम्बन्धित रिपोर्ट के अनुसार किसी भी भाषा को पीछे दिये नौ कारकों में से हर कारक के आधार पर उपर दी गई छ: अवस्थाओं में सें एक में रखा जा सकता है। सम्बन्धित कारकों और सम्बन्धित अवस्थाओं की अनुसारता का विवरण आगे दिया गया है और इन आधारों पर भारतीय भाषाओं की स्थिति को आँका गया है।

यूनेस्को की रिपोर्ट (2003:7-8) पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचार कारक के आधार पर किसी भाषा की अवस्था को नीचे दी गयी छ: अवस्थाओं में से एक निर्धारित करती है (यूनेस्को 2003:7-8): 

क्रमांक खतरे का स्तर दर्जा संचार की स्थिति
I.1लोप होने का कोई खतरा नहींकोई भी भाषा खतरे से बाहर है यदि सारी पीढ़ियाँ उस का प्रयोग कर रही हैं और किसी और भाषा का दखल नहीं है।
I.1.1स्थिर पर भारी दबाव मेंयह वह अवस्था है जब सारी पीढ़ियाँ सारे क्षेत्रों में सम्बन्धित भाषा का प्रयोग करतीं हैं पर कोई और भाषा कुछ विशिष्ट क्षेत्रों को हथिया चुकी है।
I.2लोप होने का खतरा है  4 समूह के ज्यादा बच्चे अथवा परिवार सम्बन्धित भाषा पहली भाषा के तौर पर बोलते हैं और कुछ नहीं बोलते, पर यह प्रयोग कुछ विशिष्ट सामाजिक घेरों तक सीमित हो जाता है (जैसे कि परिवार में)।
I.3लोप होने का गंभीर खतरा  3बच्चे घर में अपनी भाषा सीखना बंद कर चुके हैं।सिर्फ माँ-बाप ही अपनी भाषा बोलते हैं पर ज़रूरी नहीं कि बच्चे अपनी भाषा में ही जवाब दें।
I.4        लोप होने का बहुत गंभीर खतरा है  2 दादा-दादी और वृद्ध पीढ़ी ही भाषा बोलती है। माँ-बाप की पीढ़ी अपनी भाषा समझती तो है पर बच्चों से इस में बात नहीं करती।
I.5लोप होने वाली है  1अपनी भाषा का सब से छोटी उम्र की व्यक्ति परदादा-परदादा ही है। उन को अपनी भाषा कुछ याद तो है पर इस का प्रयोग नहीं करते, क्योंकि कोई है ही नहीं, जिस से वह बोल सकें।
I.6लोप हो चुकी है  0एक भी व्यक्ति नहीं है जो अपनी भाषा बोल अथवा समझ पाता है।

भारत में अलग-अलग भौगोलिक भाषीय प्रसंगों में रह रहे भारतीयों को दो वर्गों में बँटा जा सकता है: 

  • सम्बन्धित भाषाई प्रदेश के निवासी;
  • सम्बन्धित भाषाई प्रदेश से बाहर के निवासी।

सम्बन्धित प्रदेशों में भारतीय भाषाओं का पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचार अच्छा ज़रूर है, पर आदर्श रूप में यहाँ भी नहीं। बहुत क्षेत्र हैं, जहाँ सम्बन्धित भाषा का प्रयोग नहीं हो रहा अथवा कम हो रहा है। इन में सब से बड़ा क्षेत्र स्कूली शिक्षा का है। प्रभुत्वशाली वर्ग के लगभग सारे बच्चे प्रारंभिक स्तर से ही अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में जा रहे हैं। इन विद्यालयों में भारतीय भाषाएँ  विषय के रूप में अधूरे से ढंग से ही पढ़ाई जा रही हैं। जैसे कि लेखक पहले ही अपने एक लेख में दर्ज कर चुका है, इन विद्यालयों में से निकल रहे बच्चों को भारतीय भाषी बच्चे कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद इन बच्चों की भाषीय क्षमता किसी भारतीय भाषा से अंग्रेज़ी भाषा में बेहतर होती है (यह अलग बात है कि वह भी सीमित-सी ही है )।

सो, अगली पीढ़ी में भारतीय भाषाओं का सफल संचार बड़े दबावों में है।

ऐसी कोई निर्धारित गिनती नहीं है, जिस के आधार पर किसी भाषा को ख़त्म होने के खतरे से रिक्त समझा जाए। यह ज़रूर है कि बोलने वालों की बड़ी गिनती किसी भाषा के जीवन का खतरा कम करती है। भारतीय भाषाओं के प्रसंग में देखा जाए तो भारत की राज भाषाएँ दुनिया की बड़ी भाषाओं में है। सो, बोलने वालों की गिनती भारतीय भाषाओं की बहुत बड़ी ताक़त है।

किसी समूह की कुल आबादी में कितने लोग अपनी भाषा बोलते हैं यह किसी भाषा की प्राणशक्ति का बड़ा संकेत देता है।( यूनेस्को2003:9 ): 

खतरे का स्तरदर्जाकुल सम्बन्धित आबादी में बोलने वालों का अनुपात
कोई खतरा नहीं5सभी (all) अपनी भाषा बोलते हैं 
खतरा है4लगभग सभी (nearly all) अपनी भाषा बोलते हैं
गंभीर खतरा है3बहुमत (a majority) अपनी भाषा बोलता है।
बहुत गंभीर खतरा है2अल्पमत (a minority) अपनी भाषा बोलता है।
लोप होने वाली है1बहुत कम (very few) अपनी भाषा बोलते हैं।
लोप हो चुकी है0बोलने वाला कोई भी नहीं रहा।

उपरोक्त पैमाने पर भारतीय राज भाषाओं का दर्जा निश्चित रूप में तो एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद ही अंकित किया जा सकता है, पर प्रभावी रूप से इनकी स्थिति 4 और 3 दर्जे के बीच की लगती है।

यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार यह स्थितियाँ इस तरह की हो सकती हैं ( यूनेस्को 2003:10 ): 

खतरे का स्तरदर्जाभाषीय क्षेत्र और भाषीय कार्य 
सर्वव्यापक प्रयोगभाषा का प्रयोग सभी क्षेत्रों (domains) और सभी कार्यों (functions) के लिए होता है।
बहुभाषी समानताज्यादा (most) सामाजिक क्षेत्रों और ज्यादा कार्यों के लिए एक से अधिक भाषाओं का प्रयोग होता है।
लोप हो रहे क्षेत्रभाषा का प्रयोग पारिवारिक क्षेत्रों और बहुत (mamy) कार्यों के लिए होता है, पर प्रभुत्वशाली भाषा पारिवारिक क्षेत्रों में भी दखल देने लगी है।
सीमित और गैर-औपचारिक क्षेत्र भाषा का प्रयोग बहुत ही सीमित सामाजिक क्षेत्रों और कई (several) कार्यों के लिए होता है।
बहुत ही सीमित क्षेत्रभाषा का प्रयोग बहुत ही सीमित क्षेत्रों में और कुछ ही (very few) कार्यों के ही लिए होता है।
खत्म हो चुकी0भाषा का प्रयोग किसी भी क्षेत्र में और किसी भी कार्य के लिए नहीं होता।

नीचे दी गई सारणी यूनेस्को की रिपोर्ट को रूपमान करती है (यूनेस्को 2003:11)। नये क्षेत्रों से भाव टैलीविज़न, इंटरनैट्ट इत्यादि से है।

खतरे का स्तरदर्जानए क्षेत्रों और संचार माध्यमों में प्रयोग 
विकासशील (dynamic)5भाषा का प्रयोग सभी नए क्षेत्रों में होता है।
 बलवान/सक्रिय (robust/active)4भाषा का प्रयोग लगभग सभी नए क्षेत्रों में होता है।
 ग्रहणशील (receptive)3भाषा का प्रयोग काफी नए क्षेत्रों में होता है।
मुकाबला कर रही है (coping)2भाषा का प्रयोग कुछ नए क्षेत्रों मे होता है।
 बहुत ही कम (minimal)1भाषा का प्रयोग केवल कुछ ही नए क्षेत्रों में होता है।
निष्क्रिय (inactive)0भाषा का प्रयोग किसी भी नए क्षेत्र में नहीं होता।

यह सही है कि भारतीय राज भाषाओं का प्रयोग हर नये क्षेत्र में हो रहा है, पर यहाँ भी दूसरी भाषाएँ (हिंदी भाषी क्षेत्रों में अंग्रेज़ी और गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों) मातृ भाषाओं से अभी ज्यादा प्रयोग में है। इसलिए स्थिति यहाँ भी आदर्श नहीं है।

सम्बन्धित रिपोर्ट के अनुसार भाषीय प्राणशक्ति के लिए उस भाषा के द्वारा शिक्षा का होना आवश्यक है (पृष्ठ 12) भाषीय शिक्षा और साक्षरता के कारक के आधार पर यूनेस्को की रिपोर्ट किसी भाषा की ताकत को आँकने के लिए निम्नलिखित सारणी देता है: 

दर्जालिखित सामग्री की मौजूदगी
भाषा की कोई स्थापित लिपि और साहित्यिक परंपरा है और व्याकरणों, शब्द कोषों, पुस्तकों, साहित्य और दैनिक संचार माध्यम का स्रोत हासिल है। भाषीय लिखावटों का प्रशासन और शिक्षा में प्रयोग हो रहा है।
लिखित सामग्री हासिल है और बच्चे विद्यालयों में भाषा में साक्षरता हासिल कर रहे हैं। प्रशासन में भाषा का प्रयोग नहीं होता।
लिखित सामग्री प्राप्त है और हो सकता है कि बच्चे विद्यालय में भाषा साक्षरता हासिल कर रहे हैं। प्रकाशन माध्यम के द्वारा साक्षरता का विकास नहीं किया जा रहा।
2लिखित सामग्री की मौजूदगी है पर समूह के कुछ सदस्यों के लिए इसका प्रयोग सक्षम नहीं है। दूसरों के लिए इस का अस्तित्व प्रतीक मात्र है। सम्बन्धित भाषा में साक्षरता शिक्षा विद्यालय का हिस्सा नहीं है।

भारतीय भाषाओं की स्थिति दर्जा 5 और 4 के बीच की है, क्योंकि ये न तो सारे विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम है और न ही प्रशासन में मुकम्मल तौर पर इन का प्रयोग हो रहा है।

सरकारी और संस्थागत व्यवहार और नीतियों के आधार पर निम्न सारणी किसी भाषा की जीवनशक्ति का अक्स पेश करती है: 

भारतीय भाषाओं के प्रति सरकारी क्षेत्रों का व्यवहार कोई उत्साहजनक नहीं है। सरकारी कार्यालयों और संस्थाओं में राज भाषाओं के प्रयोग के लिए कानून बन जाने के बावजूद भी इन को ईमानदारी से लागू कराने के कोई प्रयत्न नहीं किये जा रहे। यदि कोई हिलजुल होती भी है तो बस जन दबाव के कारण। पंजाब में घटी एक घृणित घटना (जिसका समाचार पत्रों में विवरण दिया गया था) का ज़िक्र स्थिति को समझने में सहायता करेगा। पिछले दिनों पंजाब विधान सभा में प्रतिद्वंदी पक्ष (कांग्रेस पार्टी) के नेता माननीय सुनील जाखड़ जी ने अंग्रेज़ी में बोलना शुरू किया तो एक माननीय सदस्य ने उन को पंजाबी में बोलने की ताकीद की। श्री सुनील जाखड़ जी का जवाब था कि विधान सभा में बैठे सदस्य अंग्रेज़ी समझ सकते हैं। पंजाब विधान सभा के सारे सदस्यों की अंग्रेज़ी भाषा में क्षमता कितनी ही है, इस सवाल पर जाने की तो हमें आवश्यकता नहीं है, पर श्री सुनील जाखड़ जी को यह पूछना बनता है कि पंजाब विधान सभा की बैठक में बात पंजाबी में बेहतर समझाई जा सकती है अथवा अंग्रेज़ी में (लगता है कि सुनील जाखड़ जी समझ और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का क्रिया-कर्म करके पंजाब विधान सभा के उस समागम में दाखिल हुए थे)। खैर ! यह घटना भारत में भारतीय भाषाओं की तरफ़ पूरे राजनैतिक और सरकारी व्यवहार का सबूत है।

जहाँ तक सरकारी नीतियों का सवाल है, कुछ भारतीय भाषाएँ राज्यों की राज भाषाएँ तो हैं, पर शिक्षा, प्रशासन और और सरकारी क्षेत्रों में अंग्रेज़ी भाषा का दखल तबाह्कुन ढंग से जारी है। ताकतवर वर्ग के सब बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में जा रहे हैं और सरकारी विद्यालयों में शिक्षण का लगभग अन्त हो चुका है। इस प्रकार, निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि भारत के विद्यालयों में भारतीय भाषाओं के उल्लेखनीय प्रशिक्षण का लगभग अन्त हो चुका है। इस चलन के परिणाम लगभग सामने हैं। भारत की वर्तमान युवा पीढ़ी में से भारतीय भाषाओं की उल्लेखनीय निपुणता लगभग खत्म हो चुकी है। इस के शिक्षा, ज्ञान, संस्कृति, साहित्य, संचार तथा और क्षेत्रों के लिए भीषण परिणाम उन को नजर आ रहे हैं, जो देख सकते हैं, और वे विलाप भी कर रहे हैं।

क्योंकि मातृ भाषा के अच्छे प्रशिक्षण और निपुणता के बिना दूसरी अथवा विदेशी भाषा भी सफलता से नहीं सीखी जा सकती, इस लिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि वर्तमान में तैयार की जा रही भारतीय पीढ़ी भाषीय विकलांगों की पीढ़ी कहलाएगी, क्योंकि इसको किसी भाषा में भी उल्लेखनीय निपुणता हासिल नहीं होगी।

जहाँ तक सरकारी व्यवहार और नीतियों को अंक देने का सवाल है, यह कहना बनता है कि सरकारी नीतियों में भारतीय भाषाओं को संरक्षण आदर्श रूप में चाहे हासिल नहीं पर हासिल तो है, पर सरकारी व्यवहार के कारण ये नीतियाँ उचित तरह से चलन में नहीं आ रहीं। इस प्रकार, भारतीय भाषाओं की भारत में भी स्थिति 3 और 4 अंकों के बीच की ही है। 

यहाँ यह भी बात याद रखने वाली है कि उच्च शिक्षा में विज्ञान, तकनीकी विषयों और पेशेवर कोर्सों में भारतीय भाषाओं का माध्यम के तौर पर पूर्ण अभाव है।

भाषा क्योंकि एक मानवीय व्यवहार  है, इसलिए किसी भाषा समूह का अपनी भाषा के प्रति व्यवहार और प्रयत्न उस भाषा का जीवन, क्षमता, ताक़त, प्रसार और विकास में निर्णायक रोल अदा करते हैं। यह कहना सच्चाई से दूर नहीं कि किसी भाषा की बाकी क्षेत्रों में स्थिति के लिए उस भाषा समूह का अपनी भाषा के प्रति व्यवहार फैसलाकुन रोल अदा करता है। किसी भाषा समूह के व्यवहार को यूनेस्को की रिपोर्ट नीचे दिए वर्गों में बँटती है (यूनेस्को 2003:15): 

दर्जाभाषा समूह का भाषा के प्रति व्यवहार
5सारे व्यक्ति अपनी भाषा का आदर करते हैं और इस की उन्नति देखना चाहते हैं।
4ज्यादा व्यक्ति अपनी भाषा बरकरार रखने की हिमायत करते हैं।
3बहुत व्यक्ति अपनी भाषा बरकरार रखने की हिमायत करते हैं; बाक़ी या तो बेपरवाह हैं या अपनी भाषा की समाप्ति तक की हिमायत कर सकते हैं।
2कुछ ही व्यक्ति अपनी भाषा बरकरार रखने की हिमायत करते हैं; बाक़ी या बेपरवाह है या अपनी भाषा की समाप्ति तक की हमायत कर सकते हैं।
1केवल इक्का-दुक्का व्यक्ति ही अपनी भाषा बरकरार रखने की हिमायत करते हैं; बाक़ी या बेपरवाह है या अपनी भाषा की समाप्ति तक ही हिमायत कर सकते हैं।
0कोई भी अपनी भाषा के खत्म होने की परवाह नहीं करता; सभी प्रभुत्वशाली भाषा के प्रयोग को पहल देते हैं।

यह बहुत फिक्र वाली बात है कि उपरोक्त कारक, जो कारक भाषा के जीवन और विकास के लिए सब से महत्वपूर्ण है, उस पक्ष से भी भारतीय भाषाओं की अवस्था उत्साह पैदा करने वाली नहीं है।

भारतीयों के अपनी भाषाओं के प्रति रवैये को देखें तो बड़ी चिंता के  कारण हैं। सत्ता, समाज और आर्थिक ढाँचे में प्रभुत्वशाली वर्ग की भाषा ही प्रभुत्वशाली भाषा होती है और जनसाधारण उसी भाषा को सम्मानित भाषा समझता है। भारत का ताकतवर वर्ग ज्यादा से ज्यादा अंग्रेज़ी और किसी हद तक हिन्दी की तरफ़ खिंचा जा रहा है। अंग्रेज़ी की ओर खिंचे जाने का बड़ा कारण ताकतवर वर्ग का स्वार्थ है जो अंग्रेज़ी भाषा के द्वारा शिक्षा, सत्ता और आर्थिकता के सभी क्षेत्रों में अपनी धौंस कायम रखना चाहता है। चेतना की कमी के कारण जनसाधारण प्रभुत्वशाली वर्ग की सत्ता और समृद्धि का एक कारण अंग्रेज़ी भाषा को समझे बैठा है। प्रभुत्वशाली वर्ग के स्वार्थ के साथ-साथ राजकीय और प्रशासनिक क्षेत्रों में भाषा नीति के प्रति अज्ञानता भी पौष महीने की अमावस की आधी रात के घोर अँधेरे की तरह छाई हुई है। नतीजे के तौर पर भारतीयों का अपनी भाषाओं  के प्रति रवैया, कुछ चैतन्य क्षेत्रों को छोड़ कर, निराशा पैदा करने वाला ही है।

भारतीय भाषाओं की तरक्की की इच्छा रखते हुए भी, भारतीय आबादी अपनी भाषाओं के जीवन और विकास के लिए हिमायती सरगर्मियों में ज्यादा हिस्सा नहीं लेती। इस से भी ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि भारत का जनसाधारण भी अंग्रेज़ी और हिन्दी को मातृ भाषाओं से ज्यादा सम्मानित भाषाएँ होने की अभिकल्पना किये बैठा है और भारत में परिवारों में भी अंग्रेज़ी और हिन्दी बोलने का रिवाज वृद्धि की दिशा में है (हिंदी का ज़िक्र गैर-हिंदी भाषा क्षेत्रों के लिए किया जा रहा है)। अंग्रेज़ी भाषी विद्यालयों में बच्चों को भारतीय भाषाएँ बोलने की इजाज़त न होने का तथ्य तो हर कोई जानता ही है।

सो, भारतीयों का अपनी भाषाओं के प्रति रवैया 3-4 अंकों की मध्यस्थित में ही है।

भाषा के जीवन और विकास के लिए लिखित सामग्री की मात्रा, किस्म और गुणवत्ता बहुत महत्वपूर्ण है। इस आधार पर यूनेस्को की रिपोर्ट भाषाओं की अवस्था को निचले पाँच वर्गों में बाँटती है ( यूनेस्को 2003:16 ): 

और कारकों के मुकाबले प्रलेखीकरण के नज़रिये से भारतीय राज भाषाओं की स्थिति उत्साह देने वाली है। पंजाबी भाषा में बड़ी मात्रा में हवाला सामग्री, पठन-सामग्री और कला सामग्री हासिल है। इन का स्तर चाहे दुनिया की ज्यादा प्रचलित भाषाओं अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन इत्यादि के स्तर का तो नहीं है, पर यह सामग्री भारतीयों की भाषा-प्रयोग की आवश्यकताएँ पूरी कर सकती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी इत्यादि की वरिष्ठ शिक्षा के लिए सामग्री की कमी ज़रूर है, पर यह सामग्री बहुत कम प्रयत्नों से पैदा की जा सकती है, और इस के लिए आधार मौजूद हैं।

सामग्री की मौजूदगी के आधार पर भारतीय भाषाओं की अवस्था 4 और 5 अंकों के दरम्यान रक्खी जा सकती है।

भाषा क्योंकि सामाजिक व्यवहार  है, इसलिए भाषीय मसलों को गणितीय रूप में पेश करना कठिन है। पर नीचे दी गई सारणी भारतीय भाषाओं की स्थित को समझने में ज़रूर मदद कर सकती है (सारे अंक कुल 5 अंकों में से हैं ): 

कारक कारक का नामप्रदेश के अन्दर संभावित अंक प्रदेश से  बाहर संभावित अंक  
I.पीढ़ी दर पीढ़ी संचार42 
2.बोलने वालों की गिनती53 
3.कुल आबादी में बोलने वालों का अनुपात42 
4.भाषीय प्रयोग के क्षेत्रो मे प्रचलन32 
5.नए क्षेत्रों और संचार माध्यमों को स्वीकृति2 
6.भाषीय शिक्षा और साक्षरता के लिए हासिल सामग्री2 
7.सरकारों और संस्थानों का भाषा के प्रतिव्यवहार और नीतियां2 
8.प्रलेखीकरण की किस्म और गुणवत्ता3 
9.भाषीय समूह का भाषीय व्यवहार3 
 जोड़ 9×5=45 में से35½20 

भारतीय भाषाओं को प्यार करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह आँकड़े बहुत डर पैदा करने वाले हैं, क्योंकि पूरी तरह सुरक्षित वही भाषा कही जा सकती है, जो 45 में से 45 अंक प्राप्त करती हो, या इस आँकड़े के करीब हो। 

यहाँ यह सवाल किया जा सकता है कि यदि भारतीय भाषाएँ सदियों से कायम है तो भविष्य में इन्हें इतना बड़ा खतरा क्यों है ? 

ऐसे सवाल का जवाब इन पंक्तियों का लेखक अपने एक लेख में पहले भी पंजाबी भाषा के संदर्भ में दे चुका है। यहाँ वह जवाब ही दुहराया जा रहा है। भारतीय उप-महाद्वीप की स्वतंत्रता के बाद की भाषिक स्थिति पहले समय से बदल गयी है। शिक्षा, प्रशासन और संचार माध्यमों के सीमित प्रसार के कारण स्वतंत्रता से पहले भारतीय उप-महाद्वीप की लगभग आबादी अपनी मातृ भाषाओं के भाषिक प्रसंग में ही विचरती थी। पर स्वतंत्रता के पश्चात् स्कूली शिक्षा, प्रशासन और संचार माध्यमों का बड़ा प्रसार हुआ है, और इस प्रसार से भारतीय आबादी का गैर-भारतीय भाषाओं से बहुत बड़े स्तर पर पाला पड़ा है। और, बदकिस्मती से, इन दूसरी भाषाओं को सरकार की और से मातृ भाषाओं से कहीं बड़ा संरक्षण हासिल है।

भारत में 80 के दशक तक अवस्था कुछ अच्छी थी। पर 80 के पश्चात् प्रभुत्वशाली वर्ग की अक्ल (और नीयत) भ्रष्ट हो गयी है। मातृ भाषा और शिक्षा के बारे में दुनिया के किसी भी विशेषज्ञ का एक भी शब्द अपने कानों में और आँखों में न पड़ने देने की इस ने कसम खाई हुई लगती है। परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं को शैक्षिक, प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक तथा दूसरे क्षेत्रों से बाहर निकाल फेंकने के लिए यह वर्ग कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ रहा। यह बात बुरी लग सकती है, पर सत्य यही है कि भारतीय उप-महाद्वीप की मातृ भाषाओं को जो दुर्दशा स्वतंत्रता के बाद हुई है, वह पहले कभी भी नहीं हुई थी। विदेशी भाषा अंग्रेज़ी को हर क्षेत्र में ऊँचा दर्जा दिये जाने के कारण जनसाधारण को अपनी भाषाओं की शक्ति पर भी संदिग्धता होने लगी है और भाषाई दिमागी ग़ुलामी स्वतंत्रता से पहले से भी गहरी हो गयी है। जन साधारण  प्रभुत्वशाली वर्ग का ही अनुगामी होता है और प्रभुत्वशाली वर्ग का यह हाल है कि यदि इसका वश चले तो यह शायद अपने पूर्वजों के नाम भी इस प्रकार बदल लें कि वह अंग्रेज लगने लगें। इन बदली हुई अवस्थाओं के कारण ही  भारतीय उप-महाद्वीप की वर्तमान मातृ भाषाएँ पहले तो सदियों से जीवित और पनपती रही हैं, पर अब उन को अंग्रेज़ी (और हिन्दी) के गैस चैंबरों में डाल दिया गया है और इन का लोप हो जाने का खतरा हक़ीकत बन गया है। प्रिय भारतीयो! क्या स्वतंत्रता इसी के लिए थी ? 

यह भी कई बार सुनने को मिलता है कि जिन भाषाओं में महान ग्रन्थ और रचनाएँ विद्यमान हो, या जिनमें ऋषियों-मुनियों का संदेश दर्ज हो वह भाषा कभी नहीं मर सकती। यह आशा अच्छी है, और सहारा बड़ा है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि वेद, उपनिषद और पुराण संस्कृत में रचे गए थे। पर फिर भी संस्कृत केवल किताबों में ही पड़ी मिलती है, जिन को पढ़ भी बहुत ही कम व्यक्ति सकते हैं। बौद्ध ग्रन्थ पाली में लिखे गए थे। पर पाली कहाँ है? बाईबल हिब्रू में रची गई थी। पर हिब्रू को भारी सरकारी प्रयत्नों के बाद ही जिन्दा किया जा सका है। सारे यूरोप की ज्ञान की भाषा लातीनी थी, जिसका ज्यादा लोग तो अब नाम भी नहीं जानते।

विकास दरों का कोई वकील यह सवाल भी कर सकता है कि आखिर मातृ भाषाओं को बचाने का लाभ ही क्या है? वैसे तो यह सवाल ऐसा ही है, जैसे किसी की माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ी हो और पूछा जाए कि आखिर उसे बचाने का क्या आर्थिक लाभ है; पर फिर भी सवाल तो सवाल ही है, चाहे कितना भी बेहूदा क्यों न हो। सो, जवाब देना बनता है। जवाब बहुत सरल भी है। ऐसे प्रश्नकर्ता से मेरा बस अनुरोध है कि अपनी आँखें खोलने की कृपा करे और सारे देशों पर नज़र डाले कि मातृ भाषाओं को माँ मानने वाले देश दूसरों के मुकाबले आगे हैं या पीछे। यदि वास्तव में हिसाब न लगाया जा सके तो भाषा नीति और शिक्षा के किसी विशेषज्ञ के चार अक्षर पढ़ने की कृपा करे। यदि फिर भी संतुष्टि न हो तो दुनिया में अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए इंग्लैंड के संस्थान ब्रिटिश काउन्सिल के किसी कार्यालय में जाए और उन के भाषा विशेषज्ञ से पूछे कि विदेशी भाषा (हमारे लिए अंग्रेजी) पहले कुछ वर्ष मातृ भाषा माध्यम में पढ़ कर अच्छी आती है या सीधे ही विदेशी भाषा के कुएँ में कूद कर। यदि फिर भी मन न माने (‘मैं न मानूं’ वाले के मन को मना भी कौन सकता है) तो जहाँ कहीं भी रेल की पटरी हो, वहाँ पहुँच जाए। उस पर मरना बहुत आसान है। धरती माँ का कुछ भार तो हल्का होगा। हाँ, यह गारंटी नहीं दी जा सकती कि प्रश्नकर्ता के बच्चे अंग्रेज़ी में रोएँगे।

जाते-जाते कुछ तथ्य और। इस लेख में यूनेस्को की ऐसी रिपोर्ट को आकलन का आधार बनाया गया है, जो भाषाओं के लोप होने के खतरे के लक्षणों का लेखा-जोखा करती है। भारतीय भाषाओं जैसी बड़ी समृद्ध भाषाओं के वारिसों को तो इस सवाल पर चर्चा करने की आवश्यकता पड़ जाने पर भी उदासी होनी चाहिए। भारतीय भाषाओं जैसी महान भाषाओं के वारिसों के लिए तो आवश्यकता इस सवाल पर चर्चा करने की होनी चाहिए कि भारतीय भाषाओं को अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, जर्मन, चीनी, अरबी, स्पेनी जैसी ज्यादा चर्चित भाषाओं के बराबर का रुतबा वर्तमान में कैसे दिलवाया जाए। यह बहुत थोड़े सामूहिक प्रयत्नों से संभव है। आवश्यकता बस इस के लिए कायल होने की है। इंटरनेट और कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी ने हर भाषा के बोलने वालों के हाथ में ऐसा हथियार दे दिया है कि किसी भी भाषा को पहले से कहीं कम प्रयत्नों से ऊँचाई पर पहुँचाया जा सकता है। यहाँ हिब्रू भाषा की मिसाल उत्साह देने वाली है। बाईबल की भाषा हिब्रू बोल-चाल में से लोप हो चुकी भाषा थी। पर यहूदी समूह ने विद्यालयों में अपने साधारण से प्रयत्नो से इस को जीवंत भाषा बना दिया है। ऐसे ही यूनेस्को ने अपने प्रयत्नो से कई और भाषाओं को लोप होने से बचाकर विकास के मार्ग पर ला दिया है। मेघालय की एक भाषा खासी, जो एक समय यूनेस्को की खतरे में भाषाओं की सूची में शामिल थी, अब उस सूची में से निकाल दी गयी है। इसका बड़ा कारण मेघालय सरकार की ओर से खासी को सरकारी काम-काज की भाषाओं में शामिल करने के कारण हुआ है। इस के  परिणाम स्वरूप खासी का प्रयोग भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (जैसे स्कूली शिक्षा, रेडियो, टैलीविज़न इत्यादि) में होने लगा है और यह जीवंत भाषा बन गयी है।

इस दस्तावेज़ का मकसद दूसरी भाषाओं के महत्व को कम करना नहीं है। आज के युग में एक भाषी होना बहुत बड़ी कमजोरी है। पर दूसरी भाषाओं को मातृ भाषा का स्थान देना भारी शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नुकसानों का कारण बनता है। इस विषय पर विस्तार से चर्चा मेरी कुछ रचनाओं (जोगा सिंह, 2003, 2013) में की गई है। यहाँ सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि मातृ भाषा माध्यम में शिक्षा के बिना तो विदेशी भाषा भी ठीक से नहीं सीखी जा सकती। यूनेस्को की पुस्तक (यूनेस्को, 2008:12) से निम्न उक्ति इसका पर्याप्त प्रमाण होना चाहिए:

जय माँ बोली 

हवाले और टिप्पणियाँ:

१. Unesco. 2003.Language Vitality and Endangerment. Paris: Unesco.

२. Unesco. 2008. Improvement in the Quality of Mother Tongue-Based Literacy and Learning. Bankok: Unesco.

३. सिंह, जोगा. २००१. मात भाषा दा महत्व (पंजाबी में). समदर्शी. दिल्ली: पंजाबी अकादमी.

४. सिंह, जोगा. २०१३. भाषा नीति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय खोज: मातृ भाषा खोलती है शिक्षा, ज्ञान, और अंग्रेज़ी सीखने के दरवाज़े.दिल्ली: लोकमित्र.

५. इस निबन्ध में यूनेस्को (२००३) से बड़ी सहायता और उक्तियाँ ली गई हैं. सभी सारणी यूनेस्को की इसी रिपोर्ट से हैं. इस सब के लिए मैं यूनेस्को का हार्दिक आभारी हूँ.

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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पूर्व प्रमुख, भाषाविज्ञान और पंजाबी लेक्सोग्राफी विभाग; पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर डायस्पोरा स्टडीज, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला
प्रो. जोगा सिंह एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद हैं, जिनके शोध और शिक्षण ने भाषाविज्ञान और प्रवासी अध्ययन के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

Joga Singh
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पूर्व प्रमुख, भाषाविज्ञान और पंजाबी लेक्सोग्राफी विभाग; पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर डायस्पोरा स्टडीज, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला
प्रो. जोगा सिंह एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद हैं, जिनके शोध और शिक्षण ने भाषाविज्ञान और प्रवासी अध्ययन के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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