जब बहुत बारिश हुई थी, गलियॉं गीली हो गईं। मौसम पर जो गर्मी चढ़ रही थी, वह ढीली पड़ गयी। पेड़ों के पत्ते धुल गए। पेड़ों और पत्तियों के मध्य गुज़रती हवा ठंडी हो गयी। हज़ारों अमौरियॉं पेड़ों से बिछड़ गईं और धरती पर सूखे पत्तो और कीचड़ से लिपट गई। यों वसंत आकर चला गया, लेकिन कोयल की कूक, हर पेड़-पौधे में नवजात पौधे और चिड़ियों के चहचहाने से लगता है कि वसंत के चपल-चरण अभी ठहरे हैं।
मौसम के साथ हम सब बहते रहते हैं। हम सब क्यों, पूरा ब्रह्मांड बहता रहता है। कबीर कहते हैं- ‘झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद/ खलक चबेना काल का, कुछ मुँह में कुछ गोद।’ काल इतना ताक़तवर है कि दुनिया को ही ग्रास बना लेता है। यह काल की फ़ितरत है। कबीर कहते हैं कि झूठी ख़ुशियों में लोग मस्त रहते हैं और एक दिन काल के वे शिकार हो जाते हैं। यह सच है कि काल की चक्की चल रही है, एक दिन उस चक्की में पिसना ही है, मगर मनुष्य आख़िर सच्ची ख़ुशी कहाँ से लाये? कबीर ने तो काल को जीत लिया। देह उनकी गयी, लेकिन उनका कहा समय को पार करता गया और आज पूरे दम-ख़म के साथ मौजूद है।
मगर उनकी लोई का क्या हुआ? क्या हुआ कमाल और कमाली का? हर वृक्ष के विकास के पीछे अनंत कथाएँ होती हैं। कबीर के माता-पिता का कोई ठिकाना नहीं। किंवदंतियाँ अपने में बहुत कुछ समेटे रहती हैं। झाड़ियों में फेंका एक बच्चा, कुहरता -रोता हुआ। किसने फेंका, क्यों फेंका? कौन माँ थी? उस माँ ने लज्जावश फेंक दिया या फिर जीवन के काले धब्बे मान कर किसी औरत ने उसे फेंक दिया? कहानियों का कोई मुकम्मल सिरा नहीं मिलता। कहा गया कि रामानंद ने एक विधवा को आशीर्वाद दे दिया पुत्रवती होने का। आशीर्वाद ने करिश्मा दिखाया और वह गर्भवती हो गई। आशीर्वाद से बच्चे पैदा होना क़तई संभव नहीं है। कहानियों में चमत्कार-तत्व का भी अपना खेल है।
कृष्ण को जन्म देने वाली माँ देवकी थी, पालने वाली यशोदा। जन्म देने वाली माँ विस्थापित हो गयी, पालनेवाली माँ स्थापित। दुनिया भी अजीब ढर्रे पर चलती है। कई महापुरुषों की जन्म-कथाओं में झोल है। ईसा के पिता का पता नहीं। राम का जन्म खीर खाने से होता है। युधिष्ठिर, भीम , अर्जुन, कर्ण के पिता का अता-पता नहीं। सीता की जन्म-कथा पर भी अँधेरा है। इसलिए मुख्य बात है जन्म का होना और जन्म के बाद उनके कर्म। वैध-अवैध की कसौटी का कोई मतलब नहीं। हर जन्म सृजन है। सृजन आनंद का स्रोत है। मुश्किल यह है कि हम संसार में इतने खोये रहते हैं कि आनंद छूटता चला जाता है और एक दिन पूरी चेतना नकारात्मकता में डूब जाती है। हम बर्बाद हो जाते हैं और मजा यह है कि हम अपनी बर्बादी के गीत गाने लायक़ भी नहीं रहते। जीवन की कथा अकथ है। बहुत कुछ पता नहीं चलता और हम जीवन खो देते हैं-
'अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू, कहाँ ख़तम ये मंज़िलें हैं कौन सी, ना वो समझ सके, ना हम।’
उम्र के साथ यादों का कारवाँ होता है। हम उसमें खोते हैं, तैरते हैं और छटपटा उठते हैं। किताबों के पन्नों से गुज़रते हुए ज़िंदगी की सार्थकता ढूँढते हैं। जिनके साथ होते हैं, उनमें ज़िंदगी की सुगंध ढूँढते हैं। आगे भी तो पसरी हुई ज़िंदगी है, धूप है, छाँव है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





