भारतीय राजनीति में बगावत कोई नई घटना नहीं है। लेकिन हर दौर की बगावत का अपना चरित्र होता है। कभी यह वैचारिक संघर्ष का परिणाम होती थी, कभी नेतृत्व के टकराव का, तो कभी सामाजिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई का। आज की राजनीति में बगावत का सबसे बड़ा कारण अक्सर सत्ता से दूरी और राजनीतिक भविष्य की असुरक्षा बनता जा रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर उठी ताजा बगावत इसी बदलती राजनीतिक संस्कृति का सबसे ताजा उदाहरण है। दिल्ली में टीएमसी के सांसदों का अलग गुट बनाने की कोशिश, लोकसभा अध्यक्ष से अलग बैठने की माँग, एनडीए को समर्थन का संकेत और बंगाल में नेताओं के लगातार इस्तीफे ये घटनाएँ केवल संसदीय उठापटक नहीं हैं। ये उस गहरे राजनीतिक मनोविज्ञान को उजागर करती हैं, जिसमें सत्ता खत्म होते ही वफ़ादारियाँ बदलने लगती हैं।
राजनीति के जानकार अक्सर कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में दलों की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि चुनाव हारने के बाद होती है। टीएमसी आज उसी दौर से गुजर रही है।
हार के बाद टूटना भारतीय राजनीति का स्थायी पैटर्न
भारत में पिछले तीन दशकों के राजनीतिक इतिहास को देखें, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है— जिन क्षेत्रीय दलों ने लगातार 10 वर्ष या उससे अधिक समय तक सत्ता चलाई, उनमें हार के बाद बड़े पैमाने पर टूट और बगावत देखने को मिली। – 2011 में वाम मोर्चा बंगाल की सत्ता से बाहर हुआ। अगले पाँच वर्षों में वाम दलों के कई जिला स्तरीय नेता और कार्यकर्ता टीएमसी तथा भाजपा में चले गए। – 2014 के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी कमजोर हुई तो 2019 तक दोनों दलों के 40 से अधिक बड़े नेता भाजपा या शिवसेना में शामिल हुए। – उत्तर प्रदेश में 2012 के बाद समाजवादी पार्टी की सरकार गई तो 2017 के बाद पार्टी के कई प्रभावशाली नेता भाजपा में चले गए। – बिहार में 2005 से 2013 के बीच जेडीयू और भाजपा गठबंधन मजबूत रहा, लेकिन गठबंधन टूटते ही विधायकों और नेताओं के पाला बदलने की घटनाएँ तेजी से बढ़ीं।
यानी भारतीय राजनीति में सत्ता केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का सुरक्षा कवच भी बन चुकी है। टीएमसी के मामले में भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के बाद पहले विधायकों की नाराजगी सामने आई, फिर सांसदों का अलग गुट बनाने का प्रयास। यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं, बल्कि उस “पोस्ट-पावर सिंड्रोम” का उदाहरण है, जिसमें नेता भविष्य की राजनीति को देखते हुए नए सत्ता केंद्रों की ओर झुकने लगते हैं।
टीएमसी की ताकत और वर्तमान संकट
1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनी टीएमसी ने बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव किया। 2011 में ममता बनर्जी ने 34 वर्षों के वाम शासन को समाप्त किया। 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं। 2021 में भाजपा की आक्रामक चुनौती के बावजूद पार्टी ने 213 सीटों के साथ सत्ता बरकरार रखी। लेकिन 2026 का चुनाव इस राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। हार केवल सीटों की नहीं थी; यह मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक हार भी थी। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले दलों में अक्सर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि संगठन और नेतृत्व अजेय हैं। यही भ्रम धीरे-धीरे आंतरिक संवाद को खत्म करता है। टीएमसी में भी पिछले कुछ वर्षों में यही स्थिति बनी। पार्टी का पूरा ढाँचा अत्यधिक नेतृत्व-केंद्रित होता गया। जिला स्तर के नेताओं की स्वायत्तता कम हुई। निर्णय प्रक्रिया सीमित होती गई। चुनावी जीतों ने इन कमजोरियों को ढक रखा था, लेकिन हार ने उन्हें उजागर कर दिया।
आखिर क्यों भाजपा में बगावत टिकती नहीं और कांग्रेस में नई पार्टियाँ बन जाती हैं?
भारतीय राजनीति का इतिहास एक दिलचस्प तुलना भी प्रस्तुत करता है। कांग्रेस से निकले नेता:- ममता बनर्जी — टीएमसी बनाकर बंगाल की सत्ता तक पहुँचीं। शरद पवार — एनसीपी बनाकर महाराष्ट्र में निर्णायक शक्ति बने। जगनमोहन रेड्डी — वाईएसआर कांग्रेस बनाकर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। एन. रंगासामी — पुडुचेरी में अलग पार्टी बनाकर सत्ता तक पहुँचे। भाजपा से अलग हुए नेता:- शंकर सिंह वाघेला — पार्टी बनाई, लेकिन कुछ वर्षों में समाप्त। कल्याण सिंह— राष्ट्रीय क्रांति पार्टी केवल 4 सीटों तक सिमटी। उमा भारती— भारतीय जनशक्ति पार्टी प्रभाव नहीं बना सकी। येदियुरप्पा — अलग पार्टी बनाकर भाजपा को नुकसान पहुँचाया, लेकिन अंततः वापसी करनी पड़ी। यह अंतर केवल व्यक्तित्व का नहीं, संगठनात्मक संरचना का भी है।
कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से “छाता दल” रही, जिसमें क्षेत्रीय नेतृत्व विकसित होने की गुंजाइश थी। इसलिए वहाँ से निकले नेताओं के पास अपना सामाजिक आधार लेकर नई राजनीति बनाने का अवसर रहा। दूसरी ओर भाजपा की राजनीति संगठन और वैचारिक ढाँचे पर अधिक आधारित रही, जहाँ व्यक्ति से बड़ा पार्टी ढाँचा माना गया।
यही कारण है कि कांग्रेस में बगावत कई बार “नई पार्टी” बन जाती है, जबकि भाजपा में बगावत अक्सर “राजनीतिक वनवास” में बदल जाती है।
सबसे गंभीर प्रश्न है कि राजनीति में वैचारिकता क्यों घट रही है?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में देशभर में हजारों जनप्रतिनिधियों ने दल बदले। 2016 से 2024 के बीच बड़ी संख्या में विधायक और सांसद चुनाव से ठीक पहले या चुनाव परिणाम के बाद दल बदलते देखे गए। इनमें बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की थी, जिन्होंने अपने पुराने दलों में वर्षों तक मंत्री पद और संगठनात्मक ज़िम्मेदारियाँ संभाली थीं। यह आँकड़ा केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं दिखाता; बल्कि यह बताता है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा का स्थान लगातार कमजोर हुआ है। आज अधिकांश दलों में राजनीतिक विमर्श “नीति” से अधिक “संभावना” पर आधारित दिखाई देता है। नेता उस दल की ओर झुकते हैं, जहाँ भविष्य सुरक्षित दिखे। यही कारण है कि हार के बाद अचानक दलों में लोकतंत्र, पारदर्शिता और नेतृत्व शैली पर बहस शुरू हो जाती है।
टीएमसी के सामने असली चुनौती
टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि संगठनात्मक पुनर्निर्माण है। इतिहास बताता है कि क्षेत्रीय दल चुनावी हार से खत्म नहीं होते; वे तब कमजोर होते हैं, जब नेतृत्व हार से सीखने से इनकार कर देता है। ममता बनर्जी अभी भी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेताओं में हैं। लेकिन यदि पार्टी केवल करिश्माई नेतृत्व पर निर्भर रही और संगठनात्मक संवाद कमजोर होता गया, तो भविष्य में टूट और गहरी हो सकती है। राजनीतिक दल केवल नारों से नहीं चलते; उन्हें संस्थागत संरचना, वैचारिक स्पष्टता और आंतरिक लोकतंत्र की भी जरूरत होती है।
भारतीय राजनीति का सबसे असहज सत्य- टीएमसी की मौजूदा उथल-पुथल भारतीय राजनीति के उस असहज सत्य को सामने लाती है, जिसे अक्सर सार्वजनिक विमर्श में स्वीकार नहीं किया जाता कि भारतीय राजनीति में अधिकांश वफ़ादारियाँ विचारधारा से नहीं, सत्ता की संभावनाओं से तय होती हैं। जब सत्ता होती है, तो असहमति अनुशासन कहलाती है। जब सत्ता चली जाती है, तो वही असहमति लोकतंत्र बन जाती है।
यही कारण है कि राजनीति में मलाईदार सत्ता के दौर में वफादारी सबसे मजबूत दिखाई देती है, लेकिन राजनीतिक वनवास शुरू होते ही बगावतें जन्म लेने लगती हैं।
टीएमसी की वर्तमान स्थिति केवल एक दल का संकट नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर बढ़ते वैचारिक क्षरण, व्यक्तित्व आधारित राजनीति और अवसरवादी गठबंधनों की बड़ी कहानी है और शायद इसी कारण आज भारतीय राजनीति का सबसे सटीक वाक्य यही लगता है— “राजनीति में सिद्धांत स्थायी नहीं होते, सत्ता की दिशा स्थायी दिखाई देती है।”
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







सत्ता से बाहर होने पर सभी पार्टियों में टुट नहीं होती है। तानाशाह की पार्टी तुरंत बिखर जाती है। अत्याचार और अनाचार इसके कारण होते हैं। ममता बनर्जी तानाशाह की प्रतीक थीं।