पॉलो फ्रेरे : प्रभुत्व और मुक्ति की सांस्कृतिक राजनीति (भाग 5)

यह आलेख 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' के विश्लेषण का पाँचवाँ भाग है। इस भाग में बताया गया है कि प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए किन युक्तियों का इस्तेमाल करता है और उत्पीड़ित वर्ग को अपनी मुक्ति के लिए किन उपायों का उपयोग करना चाहिए। अगले अंक में पढ़ें अंबेडकर, गांधी और पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन की तुलनात्मक विवेचना।

पॉलो फ्रेरे के ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ (Pedagogy of the Oppressed) का चौथा अध्याय उनके समूचे शिक्षा-दर्शन का निर्णायक बिंदु है। यदि पुस्तक के पूर्ववर्ती अध्याय शिक्षा, संवाद और आलोचनात्मक चेतना की दार्शनिक आधारभूमि निर्मित करते हैं, तो चौथा अध्याय यह स्पष्ट करता है कि ये अवधारणाएँ सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ में किस प्रकार क्रियाशील होती हैं। इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षा कैसी होनी चाहिए, बल्कि यह बताना है कि प्रभुत्व और मुक्ति की प्रक्रियाएँ संस्कृति, चेतना और सामाजिक संबंधों के स्तर पर किस प्रकार कार्य करती हैं।

चौथे अध्याय की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि फ्रेरे प्रभुत्व और मुक्ति को दो पृथक घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि दो परस्पर विरोधी सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजनाओं (cultural-political projects) के रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रभुत्व की पहली परियोजना जहाँ मनुष्य की चेतना को नियंत्रित कर सामाजिक वर्चस्व को पुनरुत्पादित करती है; वहीं दूसरी परियोजना संवाद, सहभागिता और आलोचनात्मक प्रैक्सिस के माध्यम से मनुष्य को अपनी ऐतिहासिक भूमिका पुनः प्राप्त करने की दिशा में ले जाती है।

इसी वैचारिक संरचना के अंतर्गत फ्रेरे प्रति-संवादात्मक क्रिया (Antidialogical Action) के चार आयाम – विजय (Conquest), विभाजन (Divide and Rule), हेरफेर (Manipulation) और सांस्कृतिक आक्रमण (Cultural Invasion) – तथा संवादात्मक क्रिया (Dialogical Action) के चार प्रतिलोम आयाम – सहयोग (Cooperation), एकजुटता (Unity), संगठन (Organization) और सांस्कृतिक संश्लेषण (Cultural Synthesis) – प्रस्तुत करते हैं। इन आठ अवधारणाओं को अलग-अलग और स्वतंत्र रणनीतियों के रूप में पढ़ना फ्रेरे की मूल तर्क-रचना को खंडित कर देता है। वस्तुतः वे प्रभुत्व और मुक्ति की दो क्रमबद्ध सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजनाओं के परस्पर विरोधी चरण हैं।

इसी दृष्टि से इस आलेख का उद्देश्य इन अवधारणाओं की आंतरिक तर्क-संरचना का विश्लेषण करना है।

फ्रेरे के अनुसार मनुष्य का अस्तित्व मूलतः संवादात्मक है। संवाद उनके लिए केवल विचारों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संसार को सामूहिक रूप से समझने और रूपांतरित करने का माध्यम है। इसी कारण वे संवाद को शिक्षा और लोकतंत्र – दोनों की आधारशिला मानते हैं। उनके अनुसार – “Dialogue cannot exist without humility.” यहाँ ‘मानवता’ का आशय व्यक्तिगत सहानुभूति, करुणा आदि नहीं है। इसका अर्थ है – दूसरे मनुष्य को ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया में समान भागीदार स्वीकार करना। जहाँ कोई व्यक्ति, वर्ग अथवा नेतृत्व स्वयं को सत्य का एकमात्र स्रोत मान लेता है, वहाँ संवाद समाप्त होकर आरोपण आरम्भ हो जाता है। इसी बिंदु से फ्रेरे प्रति-संवादात्मक क्रिया की अवधारणा विकसित करते हैं। यदि संवाद मनुष्य को ऐतिहासिक कर्ता (historical subject) बनाता है, तो प्रति-संवादात्मक क्रिया उसे निर्णय-प्रक्रिया से बाहर कर निष्क्रिय वस्तु (object) में रूपांतरित करती है। इसलिए प्रति-संवादात्मक क्रिया केवल संचार की विफलता नहीं, बल्कि प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का मूल तत्त्व है। इसके विपरीत संवादात्मक क्रिया मुक्ति की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का आधार है। उसका उद्देश्य सत्ता का केवल हस्तांतरण नहीं, बल्कि मनुष्य की आलोचनात्मक चेतना का विकास है, ताकि वह अपनी सामाजिक वास्तविकता को समझने और बदलने में सक्रिय भूमिका निभा सके।

इसी वैचारिक द्वंद्व से ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ के चौथे अध्याय का ताना-बाना विकसित होता है।

प्रति-संवादात्मक क्रिया अर्थात् प्रभुत्व का पहला आयाम विजय (Conquest) है। फ्रेरे लिखते हैं – “Every act of conquest implies a conqueror and someone who is conquered.” यह कथन विजय की सामान्य राजनीतिक व्याख्या से कहीं आगे जाता है। फ्रेरे के लिए विजय का अर्थ केवल किसी भूभाग अथवा राज्य पर अधिकार स्थापित करना नहीं है। उसका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य की चेतना पर अधिकार स्थापित करना है।

विजय की प्रक्रिया में उत्पीड़ित व्यक्ति संसार को अपने अनुभवों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रभुत्वशाली समूह के द्वारा प्रदान की गई दृष्टि से देखने लगता है। वह धीरे-धीरे अपने निर्णय, अपने ज्ञान और अपनी ऐतिहासिक भूमिका पर विश्वास खो देता है। इस प्रकार विजय का अंतिम परिणाम बाहरी नियंत्रण नहीं, बल्कि आंतरिक अधीनता है।

इसी कारण फ्रेरे के यहाँ विजय शिक्षा से गहरे रूप में जुड़ जाती है। यदि शिक्षा प्रश्न पूछने के स्थान पर केवल आज्ञापालन सिखाती है, यदि वह विद्यार्थियों को ज्ञान का सह-निर्माता बनाने के बजाय निष्क्रिय ग्रहणकर्ता बना देती है, तो वह अनजाने में विजय की इसी प्रक्रिया का अंग होती है। इसीलिए यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षण-प्रक्रिया विद्यार्थियों को आलोचनात्मक विवेक विकसित करने के अवसर देती है, अथवा उनसे केवल पूर्वनिर्धारित उत्तरों की अपेक्षा करती है। भारतीय समाज के गहरे सामाजिक-आर्थिक वैषम्य को देखते हुए या और अधिक आवश्यक हो जाता है। फ्रेरे की अवधारणा इसी प्रकार के विश्लेषण की ओर संकेत करती है।

विजय की प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह है कि उत्पीड़ित समुदाय स्वयं अपनी ऐतिहासिक क्षमता पर संदेह करने लगता है। प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का यही पहला लक्ष्य है।

सहयोग (Cooperation) : संवाद की सामाजिक अभिव्यक्ति

विजय के प्रतिलोम के रूप में फ्रेरे सहयोग (Cooperation) की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार – “The revolution is made neither by the leaders for the people, nor by the people for the leaders, but by both acting together in unshakable solidarity.” यह कथन सहयोग की फ्रेरेवादी अवधारणा को स्पष्ट करता है। यहाँ सहयोग का अर्थ न तो संरक्षण है और न ही नेतृत्व द्वारा जनता के हित में निर्णय लेना। वास्तविक सहयोग तभी संभव है जब नेतृत्व और जनता दोनों ज्ञान तथा परिवर्तन की प्रक्रिया में समान भागीदार हों। यहीं संवाद अपनी सामाजिक अभिव्यक्ति प्राप्त करता है। सहयोग में कोई भी पक्ष दूसरे के लिए नहीं सोचता; सभी मिलकर वास्तविकता को समझते और बदलते हैं। इसलिए सहयोग केवल नैतिक सद्भाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रैक्सिस का प्रारंभिक रूप है और समुदाय शिक्षा का निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका सक्रिय सह-निर्माता होता है।

फ्रेरे के अनुसार सहयोग का वास्तविक उद्देश्य सहमति उत्पन्न करना नहीं, बल्कि संवाद की ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करना है जिनमें विभिन्न अनुभव और दृष्टिकोण समान गरिमा के साथ उपस्थित हो सकें। यही संवाद आगे चलकर साझा चेतना का आधार बनता है।

विजय और सहयोग का यह पहला वैचारिक युग्म स्पष्ट करता है कि प्रभुत्व और मुक्ति का संघर्ष सबसे पहले मनुष्य की चेतना पर घटित होता है। विजय व्यक्ति को उसकी ऐतिहासिक भूमिका से विस्थापित करती है, जबकि सहयोग उसे पुनः इतिहास का सक्रिय कर्ता बनाता है। इस प्रकार दोनों केवल विरोधी रणनीतियाँ नहीं हैं; वे दो भिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजनाओं के प्रारंभिक चरण हैं। एक चेतना को नियंत्रित करती है, दूसरी उसे संवाद के माध्यम से सक्रिय बनाती है। इसी आधार पर आगे चलकर प्रभुत्व विभाजन का और मुक्ति एकजुटता का रूप ग्रहण करती है।

यदि प्रति-संवादात्मक क्रिया का पहला चरण विजय (Conquest) है, तो उसका अगला तार्किक चरण विभाजन (Divide and Rule) है। विजय के माध्यम से प्रभुत्व मनुष्य की चेतना को नियंत्रित करता है; किंतु केवल चेतना पर अधिकार स्थापित कर लेना पर्याप्त नहीं है। यदि उत्पीड़ित समुदाय अपनी साझा स्थिति को पहचान ले और सामूहिक रूप से संगठित होने लगे, तो प्रभुत्व की संरचना संकट में पड़ सकती है। इसलिए प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का दूसरा चरण उस सामूहिक चेतना को विकसित होने से रोकना है। फ्रेरे इसी प्रक्रिया को विभाजन कहते हैं। इसके प्रतिलोम के रूप में संवादात्मक क्रिया एकजुटता (Unity) की अवधारणा प्रस्तुत करती है। यह एकजुटता केवल संगठनात्मक या संख्यात्मक शक्ति का प्रश्न नहीं है; यह ऐसी ऐतिहासिक चेतना का निर्माण है, जिसमें लोग अपने साझा अनुभवों, साझा दमन और साझा भविष्य को पहचानते हैं। इस प्रकार विभाजन और एकजुटता चौथे अध्याय में दो विपरीत राजनीतिक रणनीतियाँ नहीं, बल्कि चेतना के दो विरोधी रूप हैं।

विभाजन : प्रभुत्व की अनिवार्य रणनीति

फ्रेरे स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं –“Divide and rule is a fundamental dimension of the theory of oppressive action.” यहाँ ‘fundamental dimension’ पदबंध विशेष ध्यान देने योग्य है। फ्रेरे विभाजन को प्रभुत्व की सहायक रणनीति नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक आवश्यकता मानते हैं। उनका तर्क है कि उत्पीड़ित समुदाय यदि अपनी सामाजिक स्थिति को सामूहिक रूप से समझने लगे, तो प्रभुत्व की वैधता स्वतः प्रश्नांकित होने लगेगी। इसलिए प्रभुत्व की पहली आवश्यकता यह है कि लोग अपने साझा अनुभवों को साझा समस्या के रूप में न देख सकें।

यह विभाजन केवल प्रशासनिक नीति या राजनीतिक तकनीक नहीं है, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जिसमें उत्पीड़ित समुदाय अपने बीच उपस्थित विविधताओं को इस प्रकार देखने लगता है कि वे सहयोग का आधार बनने के बजाय परस्पर दूरी और अविश्वास का कारण बन जाती हैं। परिणामस्वरूप लोग अपनी वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति के बजाय सीमित पहचान-समूहों के भीतर सोचने लगते हैं। फ्रेरे के अनुसार यह प्रक्रिया तभी सफल होती है जब उत्पीड़ित समुदाय प्रभुत्वशाली व्यवस्था की दृष्टि को स्वयं स्वीकार कर ले। इस अर्थ में विभाजन बाहरी आरोपण जितना ही आंतरिक स्वीकृति की प्रक्रिया भी है। प्रभुत्व तभी स्थायी होता है, जब वह उत्पीड़ितों की चेतना में प्रवेश कर उनके पारस्परिक संबंधों को भी प्रभावित करने लगे।

यहीं फ्रेरे की आलोचनात्मक चेतना (Critical Consciousness) की अवधारणा पुनः केंद्रीय हो जाती है। आलोचनात्मक चेतना केवल सामाजिक अन्याय को पहचानना नहीं है; वह उन प्रक्रियाओं को भी समझना है, जिनके माध्यम से मनुष्य अपनी ही विखंडित स्थिति को स्वाभाविक मानने लगता है।

शिक्षा और विभाजन

फ्रेरे शिक्षा को इस प्रक्रिया से पृथक नहीं रखते। उनके अनुसार यदि विद्यालय सहयोगात्मक अधिगम (collaborative learning) के स्थान पर केवल प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें, यदि विद्यार्थियों के विविध अनुभवों को संवाद का आधार बनाने के बजाय उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में सीमित कर दें, तो शिक्षा अनजाने में विभाजित सामाजिक चेतना के पुनरुत्पादन का माध्यम बन सकती है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि फ्रेरे प्रतिस्पर्धा के अस्तित्व का निषेध नहीं करते। उनका प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा विद्यार्थियों को साझा समस्याओं पर विचार करने की क्षमता विकसित करती है, अथवा उन्हें केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित कर देती है। यदि दूसरा पक्ष अनुपस्थित हो, तो लोकतांत्रिक चेतना का विकास बाधित होता है।

भारतीय संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। भारत की सामाजिक, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता अपने-आप में विभाजन का कारण नहीं है। विभाजन की यह समस्या इसलिए उत्पन्न हुई है, क्योंकि विविधता को संवाद और परस्पर सीखने के अवसर के रूप में विकसित करने के बजाय स्थायी सामाजिक दूरी में रूपांतरित कर दिया गया है। फ्रेरे की अवधारणा इसी अंतर को समझने का आग्रह करती है।

एकजुटता : साझा ऐतिहासिक चेतना का निर्माण

यदि विभाजन प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का दूसरा चरण है, तो एकजुटता (Unity) मुक्ति की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना का दूसरा आधार है। फ्रेरे के अनुसार – “The leaders must not only avoid dividing the people; they must work for their unity.” यह कथन नेतृत्व की भूमिका को नई दृष्टि से परिभाषित करता है। फ्रेरे के अनुसार नेतृत्व का कार्य जनता के बदले या उसे दरकिनार कर निर्णय लेना नहीं है। उसका दायित्व उन परिस्थितियों का निर्माण करना है, जिनमें लोग स्वयं अपने साझा ऐतिहासिक अनुभवों को पहचान सकें। इसलिए एकजुटता ऊपर से आरोपित नहीं की जा सकती, वह संवाद की प्रक्रिया से विकसित होती है।

फ्रेरे के यहाँ एकजुटता का अर्थ एकरूपता (uniformity) भी नहीं है। वे कहीं भी यह नहीं कहते कि विभिन्न सामाजिक समूह अपनी विशिष्टताओं का परित्याग कर दें। इसके विपरीत, वे विविधता को मानवीय समाज का स्वाभाविक गुण मानते हैं। उनका आग्रह केवल इतना है कि विविधता संवाद को बाधित न करे, बल्कि उसे समृद्ध बनाए और एक-दूसरे से सीखने का अवसर उपलब्ध कराये। यही कारण है कि फ्रेरे की एकजुटता भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चेतना की उपलब्धि है। जब लोग यह समझने लगते हैं कि उनकी समस्याएँ अलग-अलग दिखाई देने पर भी संरचनात्मक रूप से परस्पर जुड़ी हुई हो सकती हैं, तब सामूहिक ऐतिहासिक चेतना का विकास होता है। यही चेतना एकजुटता का वास्तविक आधार है।

संवाद और एकजुटता

फ्रेरे के अनुसार संवाद के बिना एकजुटता संभव नहीं है। संवाद केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं करता; बल्कि अनुभवों को साझा करने, भिन्न दृष्टिकोणों को समझने और वास्तविकता की सामूहिक व्याख्या करने की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया में व्यक्ति अपनी सीमित सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को समझने लगता है। इस अर्थ में एकजुटता किसी राजनीतिक नारे का परिणाम नहीं, बल्कि संवादात्मक प्रैक्सिस (dialogical praxis) की सामाजिक उपलब्धि है। यह जितनी राजनीतिक प्रक्रिया है, उतनी ही शैक्षिक प्रक्रिया भी है।

विभाजन और एकजुटता का यह दूसरा वैचारिक युग्म स्पष्ट करता है कि प्रभुत्व और मुक्ति दोनों ही सामूहिक चेतना के निर्माण से संबंधित हैं, किंतु उनकी दिशा एक-दूसरे के विपरीत है। विभाजन उत्पीड़ित समुदाय को उसके साझा अस्तित्व-बोध से अलग करता है, एकजुटता उस बोध को पुनः खोजने की प्रक्रिया है; विभाजन सामाजिक विविधता को अविश्वास में बदल देता है, एकजुटता विविधता को संवाद का आधार बनाती है; विभाजन आलोचनात्मक चेतना को विखंडित करता है, एकजुटता उसे सामूहिक ऐतिहासिक शक्ति में रूपांतरित करती है।

इस तरह प्रतिसंवादात्मक क्रिया का पहला चरण विजय चेतना को अधीन बनाती है और दूसरे चरण में विभाजन उस अधीन चेतना को संगठित होने से रोकता है। इसके विपरीत सहयोग संवाद की शुरुआत करता है और एकजुटता उसी संवाद को साझा ऐतिहासिक चेतना में विकसित करती है। किन्तु फ्रेरे के अनुसार संघर्ष यहीं समाप्त नहीं होता। यदि उत्पीड़ित समुदाय संवाद और एकजुटता के माध्यम से सक्रिय होने लगे, तो प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना को स्वयं को नए रूप में पुनर्गठित करना पड़ता है। यही पुनर्गठन अगले चरण में हेरफेर (Manipulation)के रूप में प्रकट होता है, जिसके प्रतिरोध में फ्रेरे संगठन (Organization) की अवधारणा विकसित करते हैं।

यदि विजय उत्पीड़ित मनुष्य की चेतना को अधीन बनाती है और विभाजन उसकी सामूहिक शक्ति को विखंडित करता है, तो प्रश्न यह उठता है कि जब उत्पीड़ित समुदाय संवाद और एकजुटता के माध्यम से पुनः सक्रिय होने लगे, तब प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना स्वयं को किस प्रकार बनाए रखती है? फ्रेरे के अनुसार इसी ऐतिहासिक परिस्थिति में हेरफेर (Manipulation) प्रति-संवादात्मक क्रिया का केंद्रीय उपकरण बनकर उभरता है। इसका प्रतिलोम है संगठन (Organization), जो संवादात्मक क्रिया को स्थायी सामाजिक शक्ति में रूपांतरित करता है। यहीं चौथे अध्याय का विश्लेषण अपनी सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश करता है। विजय और विभाजन अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष प्रक्रियाएँ हैं। लेकिन हेरफेर कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि यह प्रतिरोध को दबाने के बजाय उसे नियंत्रित करने का प्रयास करता है। इसी कारण फ्रेरे के यहाँ संगठन मात्र प्रशासनिक संरचना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रैक्सिस (democratic praxis) का ऐतिहासिक रूप है।

हेरफेर : सहभागिता के नियंत्रण की राजनीति

फ्रेरे लिखते हैं – “Manipulation… is one of the principal instruments of domination.” यहाँ domination’ शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। फ्रेरे हेरफेर को व्यक्तिगत छल या नैतिक दुर्बलता के रूप में नहीं, बल्कि प्रभुत्व की संरचनात्मक रणनीति के रूप में देखते हैं। यदि विभाजन उत्पीड़ित समुदाय को एक-दूसरे से अलग रखता है, तो हेरफेर उसे इस प्रकार संचालित करता है कि वह अपनी सक्रियता का उपयोग भी प्रभुतशाली वर्ग द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं के भीतर ही करे। यही कारण है कि हेरफेर प्रत्यक्ष दमन से भिन्न है। प्रत्यक्ष दमन भय उत्पन्न करता है, दमनकारी से दूर भागने या उससे छुटकारा पाने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन हेरफेर सहमति का निर्माण करता है, उत्पीड़ित की भी उसमें सहमति होती है। व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि वह निर्णय-प्रक्रिया में सहभागी है, जबकि निर्णय की वास्तविक दिशा पहले से निर्धारित होती है। इस प्रकार प्रभुत्व अपनी उपस्थिति को अदृश्य बनाकर भी प्रभावी बना रहता है।

फ्रेरे का यह विश्लेषण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वे यह दिखाते हैं कि आधुनिक प्रभुत्व केवल बल प्रयोग से नहीं चलता; वह चेतना, भाषा और सहभागिता की संरचनाओं को भी प्रभावित करता है। इसलिए हेरफेर का लक्ष्य व्यक्ति का व्यवहार नहीं, बल्कि उसकी आलोचनात्मक क्षमता होती है।

हेरफेर और नेतृत्व

फ्रेरे ऐसे नेतृत्व की आलोचना करते हैं, जो जनता के साथ संवाद स्थापित करने के बजाय जनता की ओर से बोलने लगता है। ऐसी स्थिति में नेतृत्व जनता को इतिहास का सक्रिय निर्माता नहीं रहने देता, वह उसे केवल समर्थन देने वाली भीड़ में रूपांतरित कर देता है। यहीं वे लोकलुभावन राजनीति (populism) और संवादात्मक नेतृत्व के बीच अंतर स्थापित करते हैं। लोकलुभावन नेतृत्व जनता की भाषा का उपयोग कर सकता है, परंतु वह जनता के साथ ज्ञान का सह-निर्माण नहीं करता। वह सहभागिता का आभास उत्पन्न करता है, किन्तु आलोचनात्मक सहभागिता को प्रोत्साहित नहीं करता। इस तरह हेरफेर का सबसे प्रभावशाली रूप वह है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र समझते हुए भी उन वैचारिक सीमाओं के भीतर सोचता है, जिन्हें प्रभुत्वशाली व्यवस्था पहले से निर्धारित कर चुकी होती है।

शिक्षा और हेरफेर

फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन की दृष्टि से यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि शिक्षा केवल पूर्वनिर्धारित उत्तरों को स्वीकार करना सिखाती है, यदि विद्यार्थी को प्रश्नकर्ता के बजाय सूचना-ग्राही बनाया जाता है, तो वह आलोचनात्मक चेतना विकसित नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में हेरफेर की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ के पहले तीन अध्याय चौथे अध्याय की पूर्वपीठिका बनते हैं। बैंकिंग मॉडल की शिक्षा, संवाद का अभाव और आलोचनात्मक चेतना का अविकास – ये सभी अंततः हेरफेर के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं। इस दृष्टि से चौथा अध्याय पुस्तक के पूर्ववर्ती अध्यायों का तार्किक विस्तार है।

भारतीय संदर्भ में यदि विद्यालय, विश्वविद्यालय या अन्य सार्वजनिक संस्थाएँ सहभागिता की औपचारिक संरचनाएँ निर्मित करती हैं, किन्तु निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक संवाद और आलोचनात्मक विचार-विमर्श के अवसर सीमित रखती है। फ्रेरे की अवधारणा इस स्थिति के विश्लेषण का एक उपयोगी ढाँचा प्रदान करती है। 

संगठन : संवादात्मक प्रैक्सिस का संस्थागत रूप

हेरफेर के प्रतिरोध में फ्रेरे संगठन (Organization) की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। किन्तु उनके यहाँ संगठन का अर्थ केवल संस्थागत व्यवस्था, अनुशासन या प्रशासनिक दक्षता नहीं है। उनके अनुसार संगठन संवादात्मक क्रिया का सामाजिक विस्तार है। वे लिखते हैं – “Organization is not only directly linked to unity, but is a natural development of that unity.” यह कथन चौथे अध्याय की आंतरिक संरचना को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। फ्रेरे संगठन को एकजुटता के बाद रखते हैं, क्योंकि उनके अनुसार वास्तविक संगठन बाहर से आरोपित नहीं किया जा सकता। यदि लोगों के बीच साझा ऐतिहासिक चेतना विकसित नहीं हुई है तो संगठन केवल औपचारिक संरचना बनकर रह जाएगा। इस प्रकार संगठन संवाद का विकल्प नहीं, बल्कि उसका ऐतिहासिक विस्तार है। जहाँ एकजुटता साझा चेतना का निर्माण करती है, वहीं संगठन उस चेतना को स्थायी सामाजिक क्रिया में रूपांतरित करता है।

संगठन और लोकतांत्रिक नेतृत्व

फ्रेरे नेतृत्व का निषेध नहीं करते; वे नेतृत्व की पुनर्व्याख्या करते हैं। उनके अनुसार नेतृत्व की वैधता इस बात से निर्धारित होती है कि वह जनता के साथ संवाद करता है या जनता की ओर से निर्णय करता है। संवादात्मक नेतृत्व स्वयं को ज्ञान का एकमात्र स्रोत या उत्पादक नहीं मानता, बल्कि जनता के अनुभवों, संघर्षों और ज्ञान को परिवर्तनकारी प्रक्रिया का अभिन्न अंग स्वीकार करता है। इसीलिए संगठन केवल कार्य-विभाजन नहीं, बल्कि साझा उत्तरदायित्व का निर्माण है। फ्रेरे के लिए संगठन का उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो स्वयं विचार कर सकें, प्रश्न उठा सकें और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें। यही लोकतांत्रिक प्रैक्सिस का सार है।

भारतीय संदर्भ में सामुदायिक सहभागिता पर आधारित विद्यालय प्रबंधन समितियाँ, स्थानीय शिक्षा समितियाँ अथवा समुदाय-केंद्रित शैक्षिक पहलें इस अवधारणा को समझने के लिए उपयोगी उदाहरण हो सकती हैं, बशर्ते वे केवल औपचारिक संरचना न रहकर वास्तविक संवाद और साझा निर्णय की प्रक्रिया विकसित कर सकें।

हेरफेर और संगठन का परस्पर विरोधी वैचारिक युग्म स्पष्ट करता है कि प्रभुत्व और मुक्ति दोनों ही सहभागिता का उपयोग करते हैं, किन्तु दोनों की सहभागिता की प्रकृति मूलतः भिन्न होती है। हेरफेर सहभागिता का आभास उत्पन्न करता है, जबकि संगठन वास्तविक सहभागिता का निर्माण करता है; हेरफेर आलोचनात्मक चेतना को सीमित करता है, जबकि संगठन उसी चेतना को लोकतांत्रिक प्रैक्सिस में रूपांतरित करता है; हेरफेर जनता की ऊर्जा को नियंत्रित करता है, जबकि संगठन उसे इतिहास-निर्माण की सामूहिक शक्ति में परिवर्तित करता है।

उपर्युक्त तर्क-संरचना से स्पष्ट होता है कि प्रभुत्व की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना चेतना पर अधिकार (विजय), सामूहिक शक्ति के विखंडन (विभाजन) और नियंत्रित सहभागिता (हेरफेर) के माध्यम से स्वयं को पुनरुत्पादित करती है। इसके प्रतिपक्ष में मुक्ति की सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजना संवाद (सहयोग), साझा ऐतिहासिक चेतना (एकजुटता) और लोकतांत्रिक प्रैक्सिस (संगठन) का विकास करती है। किन्तु फ्रेरे के अनुसार दोनों परियोजनाओं का अंतिम संघर्ष राजनीतिक संस्थाओं में नहीं, बल्कि संस्कृति के क्षेत्र में घटित होता है। इसलिए चौथे अध्याय का अंतिम वैचारिक युग्म – सांस्कृतिक आक्रमण और सांस्कृतिक संश्लेषण – पूर्ववर्ती छह अवधारणाओं का केवल विस्तार नहीं, बल्कि उनका सांस्कृतिक परिपाक है।

विजय, विभाजन और हेरफेर—ये तीनों प्रति-संवादात्मक क्रिया के स्वतंत्र उपकरण नहीं हैं। इनका अंतिम लक्ष्य संस्कृति के स्तर पर प्रभुत्व को स्थायित्व प्रदान करना है। इसी कारण फ्रेरे प्रति-संवादात्मक क्रिया की अंतिम अभिव्यक्ति के रूप में सांस्कृतिक आक्रमण की चर्चा करते हैं। इसके प्रतिलोम में सहयोग, एकजुटता और संगठन का विकास सांस्कृतिक संश्लेषण में परिणत होता है। इस प्रकार यह अंतिम वैचारिक युग्म पूर्ववर्ती छह अवधारणाओं का केवल विस्तार नहीं, बल्कि उनका सांस्कृतिक निष्कर्ष है।

सांस्कृतिक आक्रमण : संस्कृति के माध्यम से प्रभुत्व का पुनरुत्पादन

फ्रेरे लिखते हैं – “Cultural invasion… serves the ends of conquest.” यह वाक्य फ्रेरे की तर्क-रचना की कुंजी है। वे स्पष्ट कर देते हैं कि सांस्कृतिक आक्रमण कोई अतिरिक्त रणनीति नहीं है, बल्कि वह विजय की निरंतरता है। इसका अर्थ यह है कि विजय यदि प्रभुत्व की आरंभिक राजनीतिक क्रिया है, तो सांस्कृतिक आक्रमण उसका स्थायी सांस्कृतिक रूप है।

यहीं यह भी स्पष्ट होता है कि विभाजन और हेरफेर केवल मध्यवर्ती प्रक्रियाएँ हैं। विजय के माध्यम से चेतना पर अधिकार स्थापित किया जाता है, विभाजन के माध्यम से सामूहिक प्रतिरोध की संभावना को कमजोर किया जाता है, हेरफेर के माध्यम से नियंत्रित सहभागिता का वातावरण निर्मित किया जाता है और इन सबका परिणाम यह होता है कि प्रभुत्वशाली समूह अपनी संस्कृति, अपने ज्ञान, अपने मूल्यों और अपनी विश्व-दृष्टि को सार्वभौमिक सत्य के रूप में स्थापित कर देता है। यही सांस्कृतिक आक्रमण है।

फ्रेरे के अनुसार इस प्रक्रिया का सबसे गंभीर परिणाम यह है कि उत्पीड़ित समुदाय धीरे-धीरे अपनी ही सांस्कृतिक क्षमता पर विश्वास खोने लगता है। वह स्वयं को अपनी दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रभुत्वशाली वर्ग की दृष्टि से देखने लगता है। दूसरे शब्दों में, सांस्कृतिक आक्रमण केवल संस्कृति पर नियंत्रण नहीं है; वह आत्म-बोध (self-perception) का पुनर्गठन है। प्रभुत्व तब सबसे अधिक स्थायी हो जाता है, जब उसे निरंतर बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि उत्पीड़ित स्वयं प्रभुत्व की भाषा, मूल्यों और मानकों को स्वाभाविक मानने लगते हैं। यहीं फ्रेरे का विश्लेषण आर्थिक अथवा राजनीतिक आलोचना से आगे बढ़कर सांस्कृतिक आलोचना का रूप ग्रहण करता है।

शिक्षा और सांस्कृतिक आक्रमण

इस संदर्भ में शिक्षा का प्रश्न निर्णायक बन जाता है। फ्रेरे के अनुसार यदि शिक्षा स्थानीय अनुभवों, लोकज्ञान,मातृभाषाओं और समुदाय की ऐतिहासिक स्मृतियों को ज्ञान के वैध स्रोत के रूप में स्वीकार नहीं करती, तो वह अनजाने में सांस्कृतिक आक्रमण की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकती है। यहाँ सावधानी आवश्यक है। फ्रेरे आधुनिक विज्ञान या सार्वभौमिक ज्ञान का विरोध नहीं करते। उनका आग्रह यह है कि ज्ञान का लोकतंत्रीकरण संवाद के माध्यम से हो, आरोपण के माध्यम से नहीं। आधुनिक ज्ञान और स्थानीय अनुभव के बीच संबंध प्रतिस्थापन (replacement) का नहीं, बल्कि संवाद (dialogue) का होना चाहिए।

भारतीय संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से प्रासंगिक है। बहुभाषिक समाज, आदिवासी ज्ञान-परंपराएँ, लोक इतिहास,स्थानीय पर्यावरणीय अनुभव और समुदाय-आधारित ज्ञान-प्रणालियाँ तभी शैक्षिक संसाधन बन सकती हैं, जब उन्हें शिक्षा की वैध भाषा में स्थान मिले। अन्यथा विद्यार्थी अपनी सामाजिक दुनिया और विद्यालयी ज्ञान के बीच गहरी दूरी अनुभव करने लगते हैं। फ्रेरे इसी दूरी को सांस्कृतिक आक्रमण की मनोवैज्ञानिक भूमि के रूप में देखते हैं।

सांस्कृतिक संश्लेषण : संवाद के माध्यम से नई सांस्कृतिक चेतना

सांस्कृतिक आक्रमण के प्रतिपक्ष में फ्रेरे सांस्कृतिक संश्लेषण की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। वे लिखते हैं – “In cultural synthesis, the actors become integrated with the people…” यहाँ ‘integrated with the people’ पदबंध विशेष महत्त्व रखता है। फ्रेरे के अनुसार परिवर्तनकारी नेतृत्व जनता के लिए संस्कृति का निर्माण नहीं करता, बल्कि वह जनता के साथ मिलकर संस्कृति का पुनर्सृजन करता है। इसलिए सांस्कृतिक संश्लेषण में कोई भी पक्ष दूसरे पर अपनी दृष्टि आरोपित नहीं करता। यहाँ संवादात्मक क्रिया अपनी सर्वोच्च अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। यदि सहयोग संवाद का आरंभ था, एकजुटता साझा ऐतिहासिक चेतना का विकास थी और संगठन उस चेतना की लोकतांत्रिक संरचना था, तो सांस्कृतिक संश्लेषण इन तीनों प्रक्रियाओं का सांस्कृतिक रूपांतरण है। यहाँ संस्कृति किसी वर्ग की संपत्ति नहीं रहती; वह सह-निर्मित (co-created) सामाजिक यथार्थ बन जाती है।

फ्रेरे सांस्कृतिक संश्लेषण को लोकसंस्कृति के रूमानी महिमामंडन में परिवर्तित नहीं करते। उनके लिए यह अतीत की पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से नई मानवीय संस्कृति का निर्माण है। इसमें आधुनिक ज्ञान और लोकानुभव, दोनों आलोचनात्मक विवेक के साथ एक-दूसरे से सीखते हैं।

प्रति-संवादात्मक क्रिया की शृंखला इस प्रकार विकसित होती है – विजय  विभाजन  हेरफेर  सांस्कृतिक आक्रमण यह क्रम आकस्मिक नहीं है। प्रत्येक चरण अगले चरण की शर्त तैयार करता है। विजय के बिना विभाजन प्रभावी नहीं हो सकता, विभाजन के बिना हेरफेर स्थायी नहीं हो सकता और इन तीनों के बिना सांस्कृतिक आक्रमण संभव नहीं है। इसी प्रकार संवादात्मक क्रिया भी क्रमिक रूप से विकसित होती है – सहयोग  एकजुटता  संगठन  सांस्कृतिक संश्लेषण। सहयोग संवाद की संभावना उत्पन्न करता है, एकजुटता उस संवाद को साझा ऐतिहासिक चेतना में बदलती है, संगठन उस चेतना को लोकतांत्रिक प्रैक्सिस में रूपांतरित करता है और सांस्कृतिक संश्लेषण उस प्रैक्सिस को नई सांस्कृतिक सृष्टि तक पहुँचाता है। इस प्रकार ये आठों अवधारणाएँ पृथक-पृथक नैतिक आदर्श नहीं हैं। वे दो विरोधी सांस्कृतिक-राजनीतिक परियोजनाओं के क्रमिक चरण हैं। फ्रेरे की मौलिकता इसी तर्क-संगति में निहित है।

इन आठों अवधारणाओं को अलग-अलग पढ़ने से उसकी वैचारिक एकता भंग हो जाती है। वास्तव में पूरा अध्याय दो समानांतर, परस्पर विरोधी और क्रमिक परियोजनाओं का विश्लेषण है। पहली परियोजना मनुष्य की चेतना, उसके सामाजिक संबंधों और उसकी संस्कृति को नियंत्रित कर प्रभुत्व को स्थायित्व प्रदान करती है। दूसरी परियोजना संवाद, आलोचनात्मक चेतना, लोकतांत्रिक संगठन और सांस्कृतिक सह-निर्माण के माध्यम से मनुष्य को पुनः इतिहास का सक्रिय कर्ता बनाती है। अपने विश्लेषण में फ्रेरे महज राजनीतिक प्रतिरोध का सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करते हैं, बल्कि लोकतांत्रिक शिक्षा की दार्शनिक आधारभूमि गढ़ते हैं। यही फ्रेरे के विश्लेषण की आन्तरिक वास्तुकला है।

(यह लेखक का निजी दृष्टिकोण है।)

संदर्भ-स्रोत :

उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र, पॉलो फ्रेरे, अनुवाद – रमेश उपाध्याय 

Gramsci, Freire and Adult Education: Possibilities for Transformative Action, Mayo

Che Guevara, Paulo Freire, and the Pedagogy of Revolution, McLaren

Education, Literacy, and Humanization: Exploring the Work of Paulo Freire, Roberts

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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