Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : कुछ ऐसा करें कि पड़ोसी का घर भी महक जाए

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"धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। उपेक्षा टीस मारती है। जीवन को दग्ध करती है, लेकिन सीख भी देती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : सोशलिस्ट, वामपंथी और दक्षिणपंथियों के दौड़ते घोड़े

18 मार्च, 1974 को आंदोलनरत तीन छात्रों से गोलियों से भून दिया गया था। इसलिए आज का दिन राजकीय उत्पीड़न और कुव्यवस्था के विरुद्ध उन आंदोलनरत छात्रों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करने के साथ ही जेपी आंदोलन में शामिल राजनीतिक दलों की वर्तमान प्रवृत्तियों पर भी विचार करने की जरूरत है।

भारतीय भाषाओं को हाशिए पर क्यों और कैसे धकेला गया है?

"राष्ट्रों की भाषा छीनकर और सभी क्षेत्रों में एक अपारदर्शी एवं पराई भाषा थोपकर उन्हें नष्ट करना एक मानक औपनिवेशिक प्रथा रही है, जिससे मूल निवासियों को उच्च और लाभप्रद शिक्षा, ज्ञान, तकनीक, विरासत, इतिहास, संस्कृति और शक्ति एवं लाभ के स्थानों से बाहर रखा जा सके।" इसी आलेख से

इन दिनों : अब तो इस तालाब का पानी बदल दो

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"चुनाव में रोग लगा और अब यह कैंसर का रूप ले रहा है। इसका ठीक से इलाज नहीं हुआ तो लोकतंत्र को राजतंत्र या सैनिक तंत्र में बदलने में देर नहीं लगेगी।" - इसी आलेख से

इन दिनों : नैतिकता और वर्जनाएँ

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दरअसल संसार वह है जो ससर रहा है यानी बदल रहा है। इस बदलाव के झोंके में नैतिकता और वर्जनाओं के दायरे भी बदल रहे हैं। इस बदलाव के संकट भी है। जानने के लिए पढ़ें यह आलेख

निजी विद्यालय संचालन की चुनौतियाँ

केवल सरकारी स्कूल ही नहीं, निजी विद्यालयों की भी व्यथाएँ हैं। प्रस्तुत आलेख में निजी विद्यालयों के संचालन के मार्ग में विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक, आर्थिक और प्रशासनिक कठिनाइयों का विश्लेषण है।

ईरान–अमेरिका टकराव: लोकतंत्र का ढोंग या साम्राज्यवाद की भूख?

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"जिस भूमंडलीकरण के दौर में हमें बताया गया था कि अब दुनिया “मुक्त बाजार” से चलेगी, विश्व में सह-अस्तित्व संभव है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतराष्ट्रीय कानून और UNO के गठन का उद्देश्य भी यही बताया गया था लेकिन वह भ्रम धीरे-धीरे टूट रहा है।" इसी आलेख से

इन दिनों : आधुनिक सभ्यता का स्याह चेहरा

Four missiles on a launch platform with brick wall background
सभ्यता का तक़ाज़ा है कि लोग शांति और सुख की ओर बढ़ें। लेकिन विश्व में हड़पने की होड़ ने हत्याओं और विनाश का अंतहीन दौर चल पड़ा है। हमारी सभ्यता का आज यही चेहरा बन गया है।

इन दिनों : आपदा में अवसर की ‘सुगंध’

"असल में लोकतंत्र पूँजीपतियों और उसके दलालों का शासन है। जनता को सरकार चुनने का भ्रम भले रहे, लेकिन असल लाभ और मजा पूँजीपति और दलाल ही उठाते हैं।" इसी आलेख से