मौसम बदल रहा है। बसंत आने वाला है। लग नहीं रहा। देश की राजधानी दिल्ली की हवा ख़राब है। सिर्फ़ राजधानी ही नहीं, हर महानगर की यही हालत है। हर प्रकार के प्रदूषण से देश परेशान है। दूषित हवा, गंदा पानी, शोर-शराबा, जहाँ देखो वहाँ भ्रष्टाचार ही नजर आयेगा। राशन के दुकानदार से लेकर संसद के चौकीदार तक सब परेशान हैं। Davos में हुए सम्मेलन में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भारत के बारे में कहा कि भारत के लिए अमेरिका के टैरिफ़ से कहीं बड़ी आर्थिक चुनौती प्रदूषण है।
मैं उनकी बातों से सहमत हूँ। जितना खर्च भारत आज प्रदूषण के कारण कर रहा है, वह चिंताजनक है। Down to Earth के आंकड़ों के अनुसार भारत का सालाना स्वास्थ्य बजट करीब 73-108 बिलियन डॉलर है, जीडीपी का 3.8%, जिसमें से $36.8-95 बिलियन, 1.36-3% सिर्फ प्रदूषण के कारण हुआ। अगर इसमें समयपूर्व हुई मृत्यु के कारण हुए उत्पादन में आर्थिक नुकसान को जोड़ें तो यह हमारी जीडीपी का 3-9% तक पहुँच जाता है। लगभग 8 लाख करोड़ हर साल प्रदूषण खर्च करने के बाद भी 17 लाख जानें ले रहा है।
सिर्फ़ यही नहीं, दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक संस्थाएँ अब अपना वर्चस्व खोती जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की अब सुनता भी कौन है? अमेरिका जो NATO से लेकर UNO में अपनी अहम भूमिका निभाता आया है, अब अपनी जिम्मेदारियों से थक गया है। वह ख़ुद ही वर्ल्ड ऑर्डर पर खतरा बन गया है। नोबेल प्राइज का भी क्या मतलब बच गया है, जब कोई भी उसे किसी को भी दान कर सकता है। ऐसी दशा में मेरे पास एक परिकल्पना है, जो संभवतः वैश्विक राजनीति से लेकर स्थानीय प्रशासन की दशा को बेहतर दिशा दे सके।
जीवन की जरूरतों का अनुमान लगाते हुए मैंने तीन त्रयों की कल्पना की है — आवश्यक त्रय, अस्तित्वगत त्रय और शाश्वत त्रय। खाना, संभोग और ख़तरा आवश्यक हैं। शरीर, आत्मा और चेतना मिलकर हमें अस्तित्व देती हैं। आख़िर में सत्य, ईश्वर और जीवन शाश्वत हैं। सत्य, ईश्वर और जीवन में कोई अंतर नहीं। जीवन नहीं, तो सत्य और ईश्वर के बारे में किसे चिंता होगी? क्या पेड़-पौधे, पशु-प्राणी में जीवन नहीं? अगर नहीं होता तो गाय से लेकर तुलसी को पूजा नहीं जा रहा होता? और जो सत्य नहीं, वह ईश्वर कैसे हो सकता है। सनातन दर्शन हमें अद्वैतवाद में यही तो बता रहा है। जीवन के आधार को ही तो आत्मा का नाम दिया गया है। चेतना आत्मा का वर्तमान है, जहाँ मन और शरीर एक साथ होते हैं, वहीं हम भी होते हैं। हम हर दिन क्या कर रहे होते हैं? खाना तलाश रहे होते हैं। संभोग से अमर होने का रास्ता खोज रहे होते हैं। और किसी भी तरह के ख़तरे से ख़ुद को, अपने परिवार को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं। जीवर्थशास्त्र की यह अवधारणा विस्तार से मेरी किताब Lifeconomics में मिल जाएगी।
अब वापस आते हैं प्रदूषण पर। इसके पहले की हम समाधान पर पहुँचे, हमें कारण समझ लेने चाहिए। प्रदूषण के दो मुख्य स्रोत उद्योग और वाहनों से निकल रहा धुँआ है। यह समस्या शहरों और महानगरों में ज़्यादा है, क्योंकि शहरों का विकास ही उद्योगों के कारण हुआ। वहाँ कारीगरों की ज़रूरत बढ़ती है, जिस कारण गाँव से लोग शहरों की तरफ़ पलायन करते हैं। कोई फैक्ट्री या कंपनी क्या करने की कोशिश कर रही है? हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रोडक्ट बना रही है। कोई कपड़ा बना रहा है, कोई हवाई जहाज़। हर उत्पाद, जो बाज़ार में मौजूद है, हमारे आवश्यक त्रय से जुड़ा है। बाज़ार से हर घर सबसे पहले खाना आता है। कपड़े से कॉस्मेटिक, मनोरंजन से लेकर प्रचार में संभोग है। सृजन की बुनियाद ही संभोग पर आधारित है। एक अकेला आदमी क्या बनाता? ना उद्योग होता, ना प्रदूषण। आख़िर में, बीमा से लेकर वकालत का व्यापार ख़तरे पर ही तो आधारित है। खतरा ना होता तो एलआईसी की किश्तें क्यों भर रहे होते हम?
आवश्यक त्रय की जरूरतें तो बाजार से पूरी हो जाती है। पर शरीर, आत्मा और चेतना को बाज़ार से कुछ ज़्यादा चाहिए। शरीर को स्वास्थ्य चाहिए, जो सिर्फ़ जिमखाने या हॉस्पिटल में नहीं मिलता। उसे ध्यान चाहिए, यहाँ चेतना का काम शुरू होता है। ध्यान तो सब दे रहे हैं। पर ध्यान है कहाँ, यह ज़्यादा ज़रूरी है। अस्तित्वगत त्रयों की जरूरतें व्यक्ति और समाज के संबंध को आकार देती हैं। शरीर को कसरत चाहिए, चेतना को ज्ञान, और आत्मा को आनंद। इनमें से कोई भी चीज हमें बाज़ार में नहीं मिलती। व्यक्ति की इच्छा और समाज की संरचना पर अस्तित्व की समग्रता और समृद्धि निर्भर करती है। आनंद का भोगी व्यक्ति ख़ुद है। पर, शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यक्ति समाज पर निर्भर करता है। इसका निजीकरण अर्थ की बर्बादी है। आज धर्म के बाद सबसे बड़ा धंधा शिक्षा बन चुकी है। सत्य, ईश्वर, और जीवन का केंद्र व्यक्ति ख़ुद होता है। समाज बस उसके व्यक्तित्व का आईना है, जो साहित्य हमें दिखाता है। जिस देश-काल का साहित्य अच्छा होगा, वहाँ की आर्थिक स्थिति भी आपको अच्छी मिलेगी।
जितनी दुनिया को हम जानते हैं, बस उतनी ही अपनी है। हम जितना सोच सकते हैं, बस उतनी ही हमारी पहचान है। आप ख़ुद सोचकर देखिए, इच्छा कहाँ से आती है? स्वतंत्रता से। सोचने के लिए, सपने देखने के लिए हम आजाद हैं — अच्छा भी, बुरा भी। क्या अंतर है अच्छाई और बुराई में? जीवन। जो जीवन के पक्ष में है अच्छा है।
जीवर्थशास्त्र के चश्मे से देखें तो प्रदूषण का मुख्य कारण आर्थिक है। कोई भी समस्या हो, आर्थिक ही होती है। शहरों में सिर्फ़ सुख का सपना देखकर ही अपना गाँव छोड़ लोग नहीं जा रहे। आवश्यक त्रय से जुड़ी आपूर्ति के लिए भी पलायन हो रहा है। ख़ून-पसीना बहाकर एक किसान अपने घुटने का इलाज नहीं करवा पा रहा। कर्ज में डूबा है। सरकारी शिक्षक सिर्फ पढ़ा नहीं रहे, नेता के आवभगत से लेकर जनता का वोटर कार्ड बनवा रहे हैं। महीनों से वेतन का ठिकाना नहीं, बेचारे चाहकर भी बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे। निजी स्कूलों में भी शिक्षकों का कम शोषण नहीं हो रहा। किसी फैक्ट्री की तरह ये संस्थान काम करते हैं। मुनाफा कमाना ही इनका मकसद बन चुका है। ऐसी दशा में पब्लिक पालिका अस्तित्वगत त्रय की जरूरतें को बाजार से आजाद कर सकती है।
आज की अर्थव्यवस्था में एक छोटा सा बदलाव करने से प्रदूषण का भी समाधान मिल सकता है। आइए! देखते हैं कैसे?
जितना टैक्स हम, भारत के लोग भरते हैं, वह मुख्यतः सीधा केंद्र और राज्य सरकार को जाता है। केंद्र के पास लगभग 40-45% हिस्सा जाता है, 55-60% राज्य सरकारों के पास पहुँचता है। जिसमें से 26.8% सिर्फ़ इनकम टैक्स का होता है, जो सीधा केंद्र सरकार को जाता है। अगर हम, भारत के लोगों को अपनी कमाई का सिर्फ़ 20% हिस्सा भी मिल जाए तो हम अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर व्यवस्था कर सकते हैं। हर गाँव, हर शहर में जब बुनियादी जरूरतें पूरी होने लगेंगी तो पलायन रुकेगा। पलायन के कम होने से शहरों पर दबाव घटेगा। जब स्कूल जाने के लिए बच्चों को शहर के एक कोने से दूसरे कोने नहीं जाना होगा, तो वाहनों की जरूरत कम पड़ेगी। जबरदस्ती शहरों में खुल रहे उद्योगों की जरूरत कम होगी। इस तरह प्रदूषण पर नियंत्रण संभव हो सकता है। यही नहीं, जब लोग अपने घर, आस पड़ोस में सुरक्षित होंगे तो दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध को क्यों लालायित होगी?
टैक्स की इस नई संरचना में पब्लिक पालिका एक महत्वपूर्ण इकाई है। इसके बारे में हम अगले अध्याय में चर्चा करेंगे।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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