ब्राजील के महान शिक्षाविद् और दार्शनिक पौलो फ्रेरे (Paulo Freire) द्वारा 1968 (पुर्तगाली) और 1970 (अंग्रेजी) में प्रकाशित ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ (Pedagogy of the Oppressed) शिक्षा और समाजशास्त्र की सबसे प्रभावशाली कृतियों में शुमार है। पौलो फ्रेरे की यह पुस्तक शिक्षा को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में प्रस्तुत करने वाली एक युगांतरकारी कृति है, जो पारंपरिक शिक्षा को ‘बैंकिंग मॉडल’ के रूप में नकारकर संवाद (Dialogue) और समीक्षात्मक चेतना (Conscientization) के माध्यम से शोषित वर्ग में चिंतन और कर्म (Praxis) को जगाकर उनके अमानवीकरण के विरुद्ध संघर्ष की वकालत करती है। फ्रेरे का मानना है कि सच्ची शिक्षा प्रदाता नहीं, बल्कि सहभागी होती है।
फ्रेरे की यह पुस्तक केवल शिक्षा की पद्धतियों पर बात नहीं करती, बल्कि यह शिक्षा को राजनैतिक और सामाजिक मुक्ति का एक साधन मानती है। शिक्षकों, शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले या उसे समझने की कोशिश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस पुस्तक के मूल दृष्टिकोण और प्रस्थापनाओं से परिचित होना चाहिए।
पौलो फ्रेरे का बुनियादी दृष्टिकोण मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद (Existentialism) और मानववाद (Humanism) के अनूठे मिश्रण पर आधारित है। उनका मानना है कि वर्तमान समाज दो वर्गों में विभाजित है: शोषक (Oppressors) और शोषित/वंचित (Oppressed)। हर मनुष्य की मूल नियति और इच्छा ‘पूर्ण मानव बनना’ (Humanization) है। लेकिन शोषक वर्ग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए शोषितों का ‘अमानवीकरण’ (Dehumanization) करता है। इसलिए यह पुस्तक एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत करती है, जो इस अमानवीकरण के खिलाफ लड़ सके और वंचितों को अपनी गुलामी का अहसास कराकर उन्हें मुक्ति की ओर ले जा सके।
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पुस्तक के चार अध्याय हैं, जिसमें प्रत्येक अध्याय एक विशेष वैचारिक स्थापना को सामने रखता है। प्रथम अध्याय में शोषक-शोषित द्वंद्व और मुक्ति का औचित्य की स्थापना की गयी है। यहाँ फ्रेरे सामाजिक संरचना के भीतर शोषक और शोषित के बीच के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संबंधों का विश्लेषण करते हुए मुख्य रूप से तीन स्थापनाएँ प्रस्तुत करते हैं –
- अमानवीकरण का संकट: शोषितों की स्थिति ऐसी बना दी जाती है कि वे खुद को मनुष्य नहीं, बल्कि वस्तुओं की तरह देखने लगते हैं। वे बोलने की ही नहीं, सोचने-समझने की शक्ति भी खो देते हैं।
- शोषितों का अंतर्निहित भय (Fear of Freedom): फ्रेरे एक बहुत ही अनोखी बात कहते हैं कि शोषित वर्ग स्वतंत्रता से डरता है। क्योंकि उन्होंने हमेशा शोषक की सत्ता देखी है, इसलिए उनके अवचेतन मन में ‘शोषक’ की छवि इस कदर घर कर जाती है कि वे आजाद होने पर खुद भी शोषक जैसा ही व्यवहार करना चाहते हैं। उनके लिए ‘मानव होने’ का मतलब ‘शोषक होना’ बन जाता है।
- वंचितों की शिक्षा कौन लिखेगा?: फ्रेरे का स्पष्ट मत है कि वंचितों की मुक्ति की शिक्षा खुद वंचितों के अनुभवों से ही आ सकती है। शोषक वर्ग कभी भी ऐसी शिक्षा नहीं दे सकता जो शोषितों को मुक्त करे; क्योंकि शोषक की ‘उदारता’ (Generosity) हमेशा झूठी होती है, जो उसकी सत्ता को बनाए रखने के लिए एक मुखौटा मात्र है।
यहीं फ्रेरे ने अद्भुत ढंग से उत्पीड़ितों के दोहरे दायित्व की भी चर्चा की है, जिसे उन्होंने ‘मानवीकरण की दोहरी प्रक्रिया’ (Dual Task of Liberation) कहा है। उनके अनुसार शोषक वर्ग संपत्ति, शक्ति और सत्ता के मद में इतना मदहोश होता है कि वह ख़ुद भी इस मनोवृत्ति से बाहर नहीं निकल पाता। उनके शब्दों में – “शोषक, जो अपनी शक्ति के बल पर दूसरों का दमन और शोषण करते हैं, वे इस शक्ति में न तो उत्पीड़ितों को और न ही स्वयं को मुक्त करने की ताकत पा सकते हैं। यह ऐतिहासिक दायित्व केवल उत्पीड़ितों का है।” शोषण का उच्छेद तब तक नहीं हो पाएगा, जब तक शोषण की मानसिकता बनी रहेगी। इसलिए शोषित वर्ग को खुद को गुलामी, हीनभावना और अमानवीकरण से मुक्त कराने के साथ ही शोषकों को भी उस मानसिक बीमारी (दमन करने की प्रवृत्ति) से मुक्त कराना है, जिसने उनके भीतर के ‘मनुष्य’ को मार दिया है।
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दूसरा अध्याय पुस्तक का सबसे प्रसिद्ध और केंद्रीय हिस्सा है, जहाँ फ्रेरे पारंपरिक शिक्षा प्रणाली की तीखी आलोचना करते हैं और एक नया विकल्प देते हैं। वह विकल्प है – बैंकिंग शिक्षा प्रणाली बनाम समस्या-प्रस्तुति शिक्षा।
फ्रेरे पारंपरिक शिक्षा को ‘बैंकिंग मॉडल’ कहते हैं। इस मॉडल की विशेषता है कि –
- शिक्षक ‘जमाकर्ता’ (Depositor) हैं और छात्र ‘बैंक खाता’ (Container) हैं।
- शिक्षक के पास ज्ञान का भंडार है, जिसे वह छात्रों के खाली दिमागों में ‘जमा’ (Deposit) करता जाता है।
- छात्र केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता (Passive Receivers) होते हैं, जो बिना सोचे-समझे रटते हैं।
- यह प्रणाली छात्रों को रचनात्मक और आलोचनात्मक रूप से सोचने से रोकती है। यह शोषक वर्ग के अनुकूल है, क्योंकि यह यथास्थिति (Status quo) को बनाए रखती है और आज्ञाकारी नागरिक पैदा करती है।
‘बैंकिंग मॉडल’ के विकल्प के रूप में फ्रेरे ‘समस्या-प्रस्तुति’ शिक्षा का प्रस्ताव रखते हैं। इस मॉडल में –
- शिक्षा संवाद (Dialogue) पर आधारित होती है।
- शिक्षक और छात्र के बीच की दूरी खत्म हो जाती है; वे दोनों सह-अन्वेषक (Co-investigators) बन जाते हैं। शिक्षक भी सीखता है और छात्र भी सिखाता है।
- यहाँ दुनिया को एक स्थिर वास्तविकता के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘समस्या’ के रूप में पेश किया जाता है, जिसे बदला जा सकता है। यह प्रणाली छात्रों के भीतर “समीक्षात्मक चेतना” (Critical Consciousness / Conscientization) जगाती है।
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तीसरा अध्याय संवाद (Dialogue) और मुक्ति की भाषा पर आधारित है। फ्रेरे के लिए ‘संवाद’ केवल बातचीत नहीं है, बल्कि यह मानवीय अस्तित्व की एक अनिवार्य शर्त है। संवाद के बिना सच्ची शिक्षा और मुक्ति असंभव है। सच्चा संवाद स्थापित करने के लिए कुछ बुनियादी मूल्य और कुछ आवश्यक तत्वों का होना जरूरी माना है। फ्रेरे के अनुसार वे अनिवार्य मूल्य पाँच हैं –
- प्रेम (Love): दुनिया और मनुष्यों के प्रति गहरा प्रेम।
- विनम्रता (Humility): यह मानना कि मेरे पास सारा ज्ञान नहीं है और मैं दूसरों से सीख सकता हूँ।
- आस्था (Faith): मनुष्यों की इस क्षमता में अटूट विश्वास कि वे दुनिया को बदल सकते हैं।
- उम्मीद (Hope): एक बेहतर भविष्य की उम्मीद।
- आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking): वास्तविकता को गहराई से देखने का नज़रिया।
मुक्ति की भाषा भी अलग होती है, जिसे वे उत्पादक शब्द (Generative Words) कहते हैं। निरक्षर वयस्कों को पढ़ाते समय फ्रेरे ने उन शब्दों का उपयोग करने की वकालत की, जो उनके दैनिक जीवन, संघर्ष और काम से जुड़े हों (जैसे – ज़मीन, मजदूरी, कुआँ)। इन शब्दों के माध्यम से वे केवल अक्षरों को नहीं सीखते, बल्कि अपनी राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को भी समझते हैं।
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चौथे अध्याय में सांस्कृतिक कार्रवाई के सिद्धांत (सांस्कृतिक वर्चस्व बनाम मुक्ति) प्रस्तुत किए गए हैं। इस अंतिम अध्याय में फ्रेरे सामाजिक परिवर्तन के दो अलग-अलग तरीक़े बताते हैं और उन तरीकों की तुलना भी करते हैं। वे तरीक़े हैं – 1. शोषक वर्ग की ‘संवाद-हीन कार्रवाई’ (Antidialogical Action)और 2. शोषितों की ‘संवादात्मक कार्रवाई’ (Dialogical Action)।
संवादहीन कार्रवाई शोषक वर्ग द्वारा संचालित की जाती है। वह अपनी रणनीति के तहत इस संवाद-हीन कार्रवाई के चार औजार का उपयोग करता है –
- विजय (Conquest): शोषितों को मानसिक और शारीरिक रूप से जीतना और उन्हें वश में रखना।
- विभाजन (Divide and Rule): वंचितों को आपस में लड़ाकर रखना ताकि वे एकजुट होकर शोषक के खिलाफ खड़े न हो सकें।
- हेरफेर (Manipulation): सांस्कृतिक माध्यमों, मिथकों और झूठ के द्वारा वंचितों के दिमाग को इस तरह नियंत्रित करना कि वे अपनी बदहाली को अपनी किस्मत मान लें।
- सांस्कृतिक आक्रमण (Cultural Invasion): शोषक वर्ग अपनी संस्कृति, भाषा और मूल्यों को शोषितों पर थोप देता है, जिससे शोषित अपनी ही संस्कृति को हीन समझने लगते हैं।
जिस तरह शोषक वर्ग संवाद-हीन कार्रवाई के लिए चार औजारों का उपयोग करता है, उसी तरह क्रांतिकारी मुक्ति की रणनीति के लिए भी संवादात्मक कार्रवाई के चार सिद्धांत (हथियार) हैं। वे सिद्धांत हैं –
- सहयोग (Cooperation): नेताओं और जनता के बीच किसी ऊँच-नीच के बिना आपसी सहयोग।
- मुक्ति के लिए एकता (Unity for Liberation): शोषितों को यह समझाना कि उनकी समस्याएँ अलग नहीं हैं, वे सब एक ही व्यवस्था के शिकार हैं, इसलिए उन्हें एकजुट होना होगा।
- संगठन (Organization): नेताओं द्वारा जनता के साथ मिलकर अनुशासनबद्ध संगठन का निर्माण करना।
- सांस्कृतिक संश्लेषण (Cultural Synthesis): शोषकों के सांस्कृतिक आक्रमण के विपरीत, यहाँ क्रांतिकारी कार्यकर्ता जनता की संस्कृति में रच-बस जाते हैं और मिलकर एक नई चेतना का निर्माण करते हैं।
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पौलो फ्रेरे ने इस पुस्तक के माध्यम से कई ऐसी बातें स्थापित कीं, जिन्होंने पारंपरिक शिक्षाशास्त्र की चूलें हिला दीं। जैसे,
- शिक्षा कभी भी तटस्थ (Neutral) नहीं होती: शिक्षा या तो शोषक व्यवस्था के टूल के रूप में काम करती है (ताकि लोग चुपचाप व्यवस्था को स्वीकार कर लें), या फिर यह ‘मुक्ति का अभ्यास’ (Practice of Freedom) बनती है, जिससे लोग अपनी दुनिया को बदलना सीखते हैं।
- कर्म और चिंतन का मेल (Praxis): फ्रेरे केवल वैचारिक बहस या केवल अंधाधुंध आंदोलन के खिलाफ थे। उन्होंने ‘प्रैक्सिस’ का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है: “दुनिया को बदलने के लिए चिंतन (Reflection) और कर्म (Action) का एक साथ होना”। बिना चिंतन के कर्म केवल दिशाहीन छटपटाहट है, और बिना कर्म के चिंतन केवल खोखला शब्दजाल (Verbiage) है।
- मुक्ति सह-भागिता से होती है, दान से नहीं: शोषितों की मुक्ति उनके लिए किसी ‘मसीहा’ द्वारा नहीं लाई जा सकती और न ही शोषकों के दान से मिल सकती है। मुक्ति एक सामूहिक प्रक्रिया है – मनुष्य एक दूसरे के सहयोग से मुक्त होते हैं।
आज के दौर में भी पौलो फ्रेरे का ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह 1970 के दशक में था। समाज-परिवर्तन की शिक्षाशास्त्रीय आवश्यकता के रूप में यह किताब हमारे सामने आती है। इसलिए यह स्कूल-कॉलेज की शिक्षा के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही सामाजिक शिक्षा के लिए भी। आज भले ही शोषक और शोषित के रूप बदल गए हों (जैसे कॉर्पोरेट वर्चस्व, डिजिटल विभाजन या तकनीकी नियंत्रण), लेकिन शिक्षा का ‘बैंकिंग मॉडल’ आज भी हावी है, जहाँ छात्रों को केवल नौकरियों के लिए “उत्पाद” (Product) या “मशीन” बनाया जा रहा है, न कि एक संवेदनशील और जागरूक मनुष्य। यह क्लासिक दस्तावेज़ हमें बताता है कि सच्ची शिक्षा वही है, जो हमारे भीतर के डर को खत्म करे, हमें सवाल पूछना सिखाए, समाज की असमानताओं को देखने के लिए तीसरी आँख दे और हमें एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करे। यह शिक्षकों, समाजशास्त्रियों और हर उस व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है, जो सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।








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