Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : बदजुबानी की राजनीतिक संस्कृति

"नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो भी किताबें पढ़ते थे और बौद्धिक जनों से जीवंत रिश्ता बनाए रखते थे। आजकल के नेताओं की तरक़्क़ी बदज़ुबानी से होती है, इसलिए वे एक-से-एक बयान देते हैं।" - इसी आलेख से

क्या डीके शिवकुमार बदल पाएंगे सत्ता-विरोधी राजनीति का चार दशक पुराना गणित?

"कर्नाटक का मतदाता आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व विश्वसनीयता—तीनों का संयुक्त मूल्यांकन करता है।" - इसी आलेख से

उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (भाग 1)

ब्राजील के पौलो फ्रेरे का 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' दुनिया की मशहूर किताबों में एक है। यह आलेख-माला इसी पुस्तक पर आधारित है। इसे चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले भाग में पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' का संक्षिप्त परिचय, दूसरे भाग में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक कार्रवाई के परिणाम, तीसरे भाग में सामाजिक चेतना और 'प्रैक्सिस' का सिद्धांत तथा चौथे भाग में गांधी और अंबेडकर के सिद्धांतों के साथ फ्रेरे के सिद्धांतों की तुलना की गई है।

इन दिनों : सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है?

Two pine trees bent by the wind on a grassy coastal dune, under a cloudy sky.
"सत्ता चलाने वाला भ्रष्ट होगा तो उसके अधिकारी कर्मचारी ईमानदार रह ही नहीं सकते। जनता में अगर सांस्कृतिक चेतना सजग नहीं है, तो वह भी देखा-देखी भ्रष्टाचार की मनोवृत्ति का शिकार होगी।" - इसी आलेख से

इन दिनों : खुदा मेहरबान तो अनाड़ी पहलवान

"प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया कि देश में गर्मी काफ़ी है, इससे बचने के लिए खूब पानी पियें। मजा यह था कि यह ख़बर ब्रेक कर गयी और चैनल पर महान एंकरों ने इसे ब्रेकिंग ख़बर बनाया। " - इसी आलेख से

जेन-जी आंदोलन : पैटर्न, परिणाम और सीख 

आलेख में दुनिया के अनेक हिस्सों में हुए जेन-जी के आंदोलनों का अध्ययन करके उनके आंदोलन के पैटर्न को समझने की कोशिश की गयी है। साथ ही उन आंदोलनों के क्या परिणाम हुए और उनसे क्या सीखा जा सकता है, इन बातों की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : चौदह वर्ष के बाद गौ माता की क़ुर्बानी और राजनीतिक मिथ्याचार

A brown cow grazing on a green pasture in Germany, surrounded by trees.
"चौदह वर्ष तक की गाय माता रहेगी और उसके बाद उसे माता के पद से उतार कर उसकी गर्दन रेत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : ‘गैंग ऑफ वासेपुर’ ने डाला आरबीआई में डाका

अहमदाबाद में आरबीआई के पैसों की चोरी से जाहिर होता है कि राजकीय व्यवस्था अपने कर्तव्य-पालन में कितनी सुस्त, मगर विज्ञापन में कितनी चुस्त है।

इन दिनों : नारों का डंका, आग में जले लंका

Diverse group holding protest signs demanding change, highlighted by night lighting.
नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।