
यह आलेख 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' के विश्लेषण का पाँचवाँ भाग है। इस भाग में बताया गया है कि प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए किन युक्तियों का इस्तेमाल करता है और उत्पीड़ित वर्ग को अपनी मुक्ति के लिए किन उपायों का उपयोग करना चाहिए। अगले अंक में पढ़ें अंबेडकर, गांधी और पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन की तुलनात्मक विवेचना।

ब्राज़ील में अनपढ़ों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इस तरह आधी से अधिक आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर थी। उन अनपढ़ मजदूरों को पढ़ाने के लिए पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा प्रदान करने का जो ऐतिहासिक प्रयोग किया, उसने न केवल उन मज़दूरों के जीवन को बदला, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था का भी संतुलन बदल दिया।

पॉलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस भाग में फ्रेरे के द्वारा की गयी चेतना और कर्म की विवेचना और दोनों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

"अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और हाल-चाल पूछा। मैंने उनसे पूछा कि कक्षाएँ ख़ाली क्यों हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि दोनों सत्र के छात्र सेंट अप हो चुके हैं। ...." इसी आलेख से

"जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।" - इसी आलेख से

"भारत की शिक्षा को केवल ‘स्मार्ट क्लास’ नहीं चाहिए, बल्कि मानवीयता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संस्कृति, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है।" - इसी आलेख से

शिक्षा-सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के आधारों पर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अच्छे स्कूल नहीं कहा जा सकता। कैसे? तथ्यों और तर्कों से अवगत होने के लिए पढ़े यह आलेख.

"बच्चों को किताबों और नेट में झोंक दीजिए, फिर तो यंत्र ही बनेंगे और नहीं बन सके तो किसी कुकांड के शिकार होंगे। ऐसे ही बिगड़े बच्चों के मुँह पर ताले नहीं होते।" - इसी आलेख से

"राष्ट्रों की भाषा छीनकर और सभी क्षेत्रों में एक अपारदर्शी एवं पराई भाषा थोपकर उन्हें नष्ट करना एक मानक औपनिवेशिक प्रथा रही है, जिससे मूल निवासियों को उच्च और लाभप्रद शिक्षा, ज्ञान, तकनीक, विरासत, इतिहास, संस्कृति और शक्ति एवं लाभ के स्थानों से बाहर रखा जा सके।" इसी आलेख से