पौलो फ्रेरे का बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक शिक्षा (भाग 2)

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान या सूचनाओं को याद करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की चेतना को जगाने और उसे आज़ाद करने का एक सशक्त औज़ार है। ब्राजील के महान शिक्षाविद् पॉलो फ्रेरे ने अपनी युगांतकारी पुस्तक ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ (Pedagogy of the Oppressed) में इस बात को बेहद गहराई से रेखांकित किया है। फ्रेरे का मानना है कि पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था अनजाने में दमनकारी ताकतों की मदद करती है, जिसे उन्होंने ‘बैंकिंग शिक्षा प्रणाली’ का नाम दिया। इसके विपरीत, वे एक ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था का प्रस्ताव रखते हैं जो मनुष्य को मानसिक और सामाजिक गुलामी से मुक्त कर सके, जिसे उन्होंने ‘संवादमूलक शिक्षा’ कहा है। किसी भी लोकतांत्रिक और समतावादी समाज के निर्माण के लिए इन दोनों प्रणालियों के बुनियादी अंतर को समझना बेहद ज़रूरी है। यह अंतर केवल पढ़ाने के तौर-तरीकों का नहीं, बल्कि इंसान को देखने और उसकी सोच को गढ़ने के नजरिए का है।

बैंकिंग शिक्षा प्रणाली की विशेषताएँ –

1. ‘उदारता’ का भ्रम (The Myth of Generosity)

बैंकिंग मॉडल शोषक वर्ग को ‘झूठी उदारता’ (False Generosity) दिखाने का मौका देता है। अमीर और शक्तिशाली लोग गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोलते हैं या चैरिटी (दान) देते हैं, लेकिन वे शिक्षा का पाठ्यक्रम (Syllabus) ऐसा रखते हैं, जिससे उनके अपने बिजनेस या सत्ता को कभी नुकसान न पहुँचे। परिणाम यह होता है कि वंचित वर्ग को लगता है कि शोषक उनका “भला” कर रहे हैं। इस तरह, शोषित लोग कभी अपनी वास्तविक गुलामी को समझ ही नहीं पाते और हमेशा शोषकों के कर्जदार बने रहते हैं।

2. खुद को ही दोषी मानना (Self-Depreciation)

जब एक बच्चा बैंकिंग शिक्षा प्रणाली में बार-बार फेल होता है या अच्छे नंबर नहीं ला पाता, तो यह व्यवस्था उसे यह अहसास कराती है कि वह खुद ही ‘बेवकूफ’ या ‘अयोग्य’ है। व्यवस्था यह कभी नहीं मानती कि उसका पाठ्यक्रम, उसकी भाषा या उसकी शिक्षण पद्धति (Method) खराब थी। वह सारा दोष बच्चे के सिर मढ़ देती है। प्रणाम यह होता है कि वंचित वर्ग के लोग यह मानने लगते हैं कि वे अपनी जाति, गरीबी या पृष्ठभूमि के कारण ही पीछे हैं। वे अपनी स्थिति के लिए सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय खुद को और अपनी किस्मत को कोसने लगते हैं।

3. ‘मूक संस्कृति’ का निर्माण (Culture of Silence)

बैंकिंग मॉडल समाज में एक ‘मूक संस्कृति’ यानी चुप रहने की संस्कृति को जन्म देता है। बचपन से ही स्कूल और कॉलेज में सिखाया जाता है कि ‘जो अधिकारी या शिक्षक कह रहा है, वही परम सत्य है।‘ सवाल पूछने वाले को ‘विद्रोही’ या बदतमीज क़रार दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि जब यही बच्चे बड़े होकर नागरिक बनते हैं, तो वे सरकार की गलत नीतियों, तानाशाही, या कार्यस्थल पर होने वाले शोषण के खिलाफ भी आवाज नहीं उठा पाते। वे अनजाने ही एक ‘आज्ञाकारी और डरे हुए’ समाज का हिस्सा बन जाते हैं।

4. ‘नेता’ और ‘जनता’ का शोषक ढाँचा (The Top-Down Political Model)

फ्रेरे कहते हैं कि जो लोग बैंकिंग मॉडल से पढ़कर निकलते हैं, वे यदि कल को कोई क्रांति या राजनीतिक बदलाव भी करते हैं, तो वे भी शोषक जैसे ही बन जाते हैं। एक आम राजनीतिक दल में नेता खुद को ‘सब कुछ जानने वाला (शिक्षक)’ मानता है और जनता को ‘अज्ञानी (छात्र)’। नेता सोचता है कि जनता के पास अपना कोई दिमाग नहीं है, इसलिए वह जो तय करेगा, जनता को वही मानना होगा। इसका परिणाम यह होता है कि यदि कोई क्रांति या आंदोलन होता भी है तो क्रांति या आंदोलन के बाद भी केवल सत्ता बदलती है, व्यवस्था नहीं। पुराना शोषक हट जाता है और उसकी जगह एक नया शोषक (जो कभी खुद शोषित था) बैठ जाता है।

5. सांस्कृतिक आक्रमण (Cultural Invasion)

बैंकिंग मॉडल के जरिए शोषक वर्ग अपनी भाषा, संस्कृति और जीवनशैली को ‘सर्वश्रेष्ठ’ घोषित कर देता है और वंचितों की संस्कृति को ‘पिछड़ा या गवारू’ साबित करता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपनी मातृभाषा या लोक-अनुभवों का इस्तेमाल करता है, तो उसे हतोत्साहित किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वंचित वर्ग अपनी जड़ों, अपनी लोक-संस्कृति और अपने पारंपरिक ज्ञान (जैसे- खेती, कारीगरी) से नफरत करने लगता है और शोषक वर्ग की नकल करने की अंतहीन दौड़ में शामिल हो जाते हैं।

बैंकिंग शिक्षा के वास्तविक शिक्षा प्रणाली से उदाहरण

  • रटने वाली पारंपरिक कक्षाएँ: एक विज्ञान शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर ‘प्रकाश संश्लेषण’ (Photosynthesis) की परिभाषा लिखता है। छात्र बिना समझे उसे हू-ब-हू अपनी कॉपी में उतारते हैं। परीक्षा में वे वही शब्द दोहराते हैं और पूरे अंक पाते हैं। यहाँ छात्र का विकास केवल एक ‘रिकॉर्डर’ के रूप में होता है।
  • कोचिंग सेंटरों का ढर्रा: प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे IIT या NEET) की तैयारी कराने वाले संस्थान छात्रों को ‘शॉर्टकट ट्रिक्स’ और फॉर्मूले रटाते हैं। उनका उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक तयशुदा ढर्रे पर सही उत्तर टिक करना होता है। यह इंसानी दिमाग को केवल ‘डेटा प्रोसेस’ करने वाली मशीन बनाता है।
  • सवालों पर पाबंदी: जब इतिहास की कक्षा में कोई छात्र किसी ऐतिहासिक घटना या नेता के फैसलों पर सवाल उठाता है, और शिक्षक उसे यह कहकर चुप करा देता है कि “यह परीक्षा में नहीं आएगा, बस जितना किताब में लिखा है उतना ही याद रखो।” यह छात्र की सोचने की क्षमता का दमन है।

बैंकिंग मॉडल का सारांश (Conclusion)

पौलो फ्रेरे का स्पष्ट निष्कर्ष था कि बैंकिंग मॉडल समाज को बदलने के लिए नहीं, बल्कि समाज को ‘नियंत्रित’ रखने के लिए बनाया गया है। यह शिक्षा लोगों के दिमाग को एक ‘कैदखाना’ बना देती है। इसलिए, जब तक शिक्षा का यह ढाँचा नहीं बदलेगा, तब तक समाज से राजनीतिक और आर्थिक असमानता को कभी खत्म नहीं किया जा सकता।

पौलो फ्रेरे ने शिक्षा के बैंकिंग मॉडल के के तोड़ के रूप में ‘संवाद मॉडल’ की स्थापना की। उनके अनुसार शिक्षाशास्त्र में ‘संवाद’ (Dialogue) केवल बातचीत करने का माध्यम नहीं है। यह समाज को बदलने, शोषितों को जागरूक करने और वास्तविक ज्ञान पैदा करने की एक क्रांतिकारी राजनीतिक क्रिया है। फ्रेरे का मानना था कि संवादहीनता शोषकों का हथियार है, जबकि संवाद शोषितों की मुक्ति का मार्ग है।

नीचे संवाद के सिद्धांतों, उसके व्यावहारिक उदाहरणों और उसके गहरे सामाजिक-राजनैतिक प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है। जिस तरह बैंकिंग मॉडल के पाँच बुनियादी सिद्धांत हैं, उसी तरह संवाद के भी पाँच बुनियादी सिद्धांत होते हैं –

1. संवाद के 5 बुनियादी सिद्धांत (Principles of Dialogue)

फ्रेरे के अनुसार, सच्चा संवाद तब तक संभव नहीं है जब तक कि उसमें निम्नलिखित पाँच मानवीय मूल्य शामिल न हों:

  • प्रेम (Love): संवाद की पहली शर्त दुनिया और मनुष्यों के प्रति गहरा प्रेम है। यदि आप सामने वाले को खुद से छोटा या नफरत के काबिल समझते हैं, तो संवाद नहीं हो सकता। यह प्रेम शोषितों की मुक्ति के लिए प्रतिबद्धता से पैदा होता है।
  • विनम्रता (Humility): शिक्षक या नेता को यह घमंड छोड़ना होगा कि ‘मैं सब कुछ जानता हूँ’। संवाद के लिए यह मानना जरूरी है कि सामने वाले (वंचित व्यक्ति) के पास भी अपने जीवन के समृद्ध अनुभव और ज्ञान हैं, जिससे सीखा जा सकता है।
  • मनुष्यों में आस्था (Faith in Humans): इस बात पर अटूट विश्वास होना कि हर इंसान, चाहे वह कितना ही अनपढ़ या गरीब क्यों न हो, अपनी दुनिया को समझने और उसे बदलने की ताकत रखता है।
  • उम्मीद (Hope): संवाद कभी भी निराशा में नहीं होता। यह इस उम्मीद पर टिका होता है कि आज की बदहाली और अन्यायपूर्ण व्यवस्था को मिलकर बदला जा सकता है।
  • आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking): वास्तविकता को वैसा ही न मान लेना, जैसी वह दिखती है, बल्कि उसके पीछे छिपे कारणों, सत्ता के खेल और असमानता को समझने की कोशिश करना।

2. संवाद का व्यावहारिक उदाहरण (Real-World Example)

इसे भारत के ग्रामीण परिवेश के एक व्यावहारिक उदाहरण से समझते हैं कि पारंपरिक तरीका (संवादहीन) और फ्रेरे का तरीका (संवादात्मक) कैसे काम करता है। एक ऐसे गाँव की कल्पना करें, जहाँ दलित और गरीब मजदूरों के बच्चे कुपोषण, बीमारी और अशिक्षा से ग्रस्त हैं। उनके सशक्तिकरण के दो तरीक़े हो सकते है –

i) संवादहीन तरीका (बैंकिंग मॉडल): स्वास्थ्य अधिकारी या को कार्यकर्ता गाँव में आता है। वह मंच पर खड़ा होकर माइक से भाषण देता है—“आप लोग सफाई नहीं रखते, बच्चों को पौष्टिक खाना नहीं देते, हाथ धोकर खाना नहीं खाते, स्कूल नहीं भेजते। सरकार की इस योजना का लाभ उठाइए और अमुक बीमारी के लिए अमुक गोली खाइए और बच्चों को स्कूल भेजिए।” यहाँ गाँव वाले चुपचाप सुनते हैं (मूक संस्कृति)। अधिकारी या कार्यकर्ता चला जाता है। लेकिन गाँव वालों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता, क्योंकि इस प्रक्रिया में उन्हें लगा कि दोष उन्हीं का है।

ii) संवादात्मक तरीका (फ्रेरे का मॉडल): इस मॉडल में फ्रेरे ने उदाहरण दिया है कि उपर्युक्त गाँव की परिस्थिति में कार्यकर्ता गाँव वालों के बीच जमीन पर बैठता है। वह भाषण नहीं देता, बल्कि एक पोस्टर या चित्र दिखाता है, जिसमें एक कमजोर बच्चा और एक तरफ लहलहाती फसल है। कार्यकर्ता सवाल पूछता है: “इस चित्र में आपको क्या दिख रहा है?” मजदूर: “बच्चा बहुत बीमार है, लेकिन खेत में फसल बहुत अच्छी है।” कार्यकर्ता: “ऐसा क्यों है कि फसल इतनी अच्छी है, पर खेत में काम करने वाले का बच्चा इतना कमजोर है?” मजदूर (सोचते हुए): “क्योंकि फसल जमीन मालिक की है। हमें तो इतनी कम मजदूरी मिलती है कि हम बच्चों के लिए दूध या अच्छी सब्जियाँ खरीद ही नहीं पाते।” संवाद आगे बढ़ता है: यहाँ से चर्चा बीमारी से हटकर कम मजदूरी, सामाजिक शोषण और उनके अधिकारों पर मुड़ जाती है। अब गाँव वाले खुद समस्या का कारण समझ रहे हैं। वे मिलकर तय करते हैं कि उन्हें जमींदार से उचित मजदूरी की माँग करनी होगी।

3. संवाद के प्रभाव और परिणाम (Impact and Outcomes)

    जब समाज या शिक्षा में इस संवादात्मक पद्धति को लागू किया जाता है, तो इसके निम्नलिखित गहरे परिणाम सामने आते हैं:

    क) ‘समीक्षात्मक चेतना’ का उदय (Awakening of Conscientization)

    संवाद का सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि शोषित वर्ग अपनी स्थिति को ‘किस्मत का खेल’ या ‘भगवान की मर्जी’ मानना बंद कर देता है। वे समझने लगते हैं कि उनकी गरीबी या लाचारी के पीछे प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि इंसानों द्वारा बनाई गई गलत सामाजिक और आर्थिक नीतियाँ (जैसे- जातिवाद, पूँजीवाद आदि) हैं। इसे ही फ्रेरे ‘चेतना का उभार’ कहते हैं।

    ख) ‘मूक संस्कृति’ का अंत (End of the Culture of Silence)

    इसका परिणाम होता है कि जो लोग सदियों से सिर झुकाकर शोषकों की बातें सुन रहे थे, वे अपनी आवाज पा लेते हैं। इस तरह क्लासरूम में छात्र शिक्षक से और समाज में नागरिक सरकार या शोषक जमींदार/मालिक की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछना शुरू कर देते हैं। समाज में एक लोकतांत्रिक और मुखर संस्कृति का जन्म होता है।

    ग) सह-अन्वेषक के रूप में शिक्षक और छात्र (Teacher-Student Co-intentionality)

    इससे शिक्षा में ऊँच-नीच का भेदभाव खत्म हो जाता है। शिक्षक अब ‘तानाशाह’ नहीं रहता, बल्कि छात्रों का साथी बन जाता है। छात्र भी कक्षा में अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र महसूस करते हैं, जिससे ज्ञान का रट्टा नहीं मारा जाता, बल्कि वास्तविक ज्ञान का निर्माण (Co-creation of knowledge) होता है।

    घ) वास्तविक क्रांति और सच्ची मुक्ति (True Liberation)

    फ्रेरे का मानना था कि बिना संवाद के की गई क्रांति अक्सर तानाशाही में बदल जाती है। जब नेता और जनता संवाद के जरिए एकजुट होते हैं, तो वे एक ऐसी नई व्यवस्था बनाते हैं, जहाँ कोई किसी का शोषण नहीं करता। इससे केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं होता (कि एक राजा हटा और दूसरा बैठ गया), बल्कि पूरे समाज का मानवीकरण (Humanization) होता है।

    संवादमूलक शिक्षा के वास्तविक जीवन से उदाहरण

    • समस्या-प्रस्तुति (Problem-posing) आधारित पढ़ाई: एक शिक्षक पर्यावरण प्रदूषण पढ़ाने के लिए किताब खोलने के बजाय छात्रों से पूछता है, “हमारे स्कूल के बाहर जो कचरे का ढेर है, उससे हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है?” इसके बाद छात्र और शिक्षक मिलकर उस कचरे के कारणों, बीमारी के खतरों और उसके समाधान पर चर्चा करते हैं। यहाँ ज्ञान सीधे उनके जीवन से जुड़ता है।
    • सामुदायिक साक्षरता (जैसे खुद फ्रेरे का काम): पॉलो फ्रेरे ने ब्राजील के अनपढ़ गन्ना किसानों को पढ़ाते समय ‘A, B, C, D’ से शुरुआत नहीं की। उन्होंने ‘काम’, ‘जमीन’, ‘मज़दूरी’ और ‘अधिकार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। किसान इन शब्दों पर चर्चा करते हुए न केवल अक्षर सीख रहे थे, बल्कि यह भी समझ रहे थे कि उनका शोषण कैसे हो रहा है। मारिया मोंटेसरी भी अपनी कक्षा में बच्चों को सीधे अक्षरज्ञान कराने के बदले ध्वनि और शब्दों को सिखाती थीं।
    • प्रोजेक्ट आधारित और सहयोगात्मक सीख: एक सामाजिक विज्ञान की कक्षा में छात्र किसी गाँव या बस्ती का दौरा करते हैं। वे वहाँ के लोगों की पानी की समस्या पर एक सर्वे करते हैं। इसके बाद कक्षा में लौटकर वे शिक्षक के साथ बैठकर इसके सामाजिक और राजनीतिक कारणों पर बहस करते हैं। इस तरह छात्र खुद ज्ञान के निर्माता बनते हैं।

    निष्कर्षतः, पॉलो फ्रेरे द्वारा प्रतिपादित बैंकिंग और संवादमूलक शिक्षा का अंतर यह तय करता है कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या बनाना चाहते हैं—मौजूदा व्यवस्था के सामने सिर झुकाने वाला एक ‘रोबोट’ या समाज को बदलने का हौसला रखने वाला एक ‘सचेत नागरिक’। बैंकिंग शिक्षा छात्रों को केवल एक निष्क्रिय वस्तु (Object) मानकर उनकी रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच का गला घोंट देती है। वहीं दूसरी ओर, संवादमूलक शिक्षा उन्हें अपने जीवन के सक्रिय कर्ता (Subject) बनने का अवसर देती है। आज के तकनीकी और व्यावसायिक दौर में, जहाँ शिक्षा केवल डिग्री और नौकरी पाने का माध्यम बनती जा रही है, फ्रेरे के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। सच्ची शिक्षा वही है जो कक्षा की दीवारों को तोड़कर समाज में बदलाव का रास्ता दिखाए। जब तक शिक्षा में संवाद, समानता और सवाल पूछने की आज़ादी नहीं होगी, तब तक एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की कल्पना अधूरी है।

    (यह आलेख विभिन्न स्रोतों का आधार लेकर लिखा गया है। लेखक उन सबके प्रति आभार व्यक्त करता है।)

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    कार्यकर्ता और लेखक
    डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

    Dr. Anil Kumar Roy
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    कार्यकर्ता और लेखक
    डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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    2 Comments

    1. The work reflects the author’s deep analytical insight and practical understanding of the issues discussed.

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