Category जन पत्रकारिता

पॉलो फ्रेरे : 45 दिनों का वयस्क साक्षरता मॉडल (भाग 4)

ब्राज़ील में अनपढ़ों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इस तरह आधी से अधिक आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर थी। उन अनपढ़ मजदूरों को पढ़ाने के लिए पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा प्रदान करने का जो ऐतिहासिक प्रयोग किया, उसने न केवल उन मज़दूरों के जीवन को बदला, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था का भी संतुलन बदल दिया।

पॉलो फ्रेरे का समीक्षात्मक चेतना और कर्म का सिद्धांत (भाग 3)

पॉलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस भाग में फ्रेरे के द्वारा की गयी चेतना और कर्म की विवेचना और दोनों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

इन दिनों : ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है 

Close-up of ripe mangoes hanging on a branch surrounded by lush green leaves.
"इस बार मैंने बगीचे को क़रीब से देखा- मंजर लगने से फल टूटने तक। बीच में आँधी आयी। लाखों अमौरियॉं झडीं। बहुत कुछ हुआ।" - इसी आलेख से

दस्तावेज़ों के अनुसार कौन है भारत का नागरिक?

a passport, watch and pen on a table
न पासपोर्ट, न आधार कार्ड, न वोटर आईडी कार्ड - तो राज्य के द्वारा भारतीय नागरिकों को कौन ऐसा दस्तावेज़ उपलब्ध कराया गया है, जो नागरिकता का सर्वमान्य प्रमाणपत्र है?

पौलो फ्रेरे का बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक शिक्षा (भाग 2)

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : वैचारिक उदात्तता और संकीर्णता

a large building with a clock tower on top of it
"अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और हाल-चाल पूछा। मैंने उनसे पूछा कि कक्षाएँ ख़ाली क्यों हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि दोनों सत्र के छात्र सेंट अप हो चुके हैं। ...." इसी आलेख से

हार के बाद क्यों शुरू होता है ‘आंतरिक लोकतंत्र’?

प्रस्तुत आलेख में चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट के बहाने भारत के राजनीतिक परिदृश्य की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : युवाओं का प्रदर्शन: साज़िश, संदेह और उम्मीदें

"ये लोग हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही जैसे शब्दों से शुरू होते हैं और वहीं ख़त्म।" - इसी आलेख से

इन दिनों : हवा के नये झोंके से कुछ सवाल

gray printing paper on white surface
"एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लोगों को अपनी राय स्पष्ट रूप से रख देनी चाहिए।" - इसी आलेख से

इन दिनों : वक्त का तराना

"आज़ादी इसलिए नहीं मिली थी कि जिनके पूर्वजों ने ख़ून बहाया, उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठने लगे। उन्हें 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा जाने लगे। ऐसे ही वक़्त में रणभेरी बजती है।" - इसी आलेख से