जब संस्थाएँ सत्ता की छाया में सिमटने लगें, तब लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर आ जाती है।
किसी लोकतंत्र की मृत्यु हमेशा संविधान को जलाकर, संसद को बंद करके या नागरिकों के अधिकार छीनकर ही नहीं होती। कभी-कभी उसकी मृत्यु संविधान को अक्षुण्ण रखते हुए भी होती है। चुनाव होते रहते हैं, संसद चलती रहती है, न्यायालय खुले रहते हैं, आयोग अपनी इमारतों में काम करते रहते हैं और सरकारी विज्ञापनों में लोकतंत्र की उपलब्धियों का उत्सव भी मनाया जाता है। लेकिन धीरे-धीरे इन संस्थाओं के भीतर से वह स्वतंत्र विवेक, निष्पक्षता और निर्भीकता गायब होने लगती है, जिसके कारण ही लोकतंत्र केवल शासन की एक व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता की संप्रभुता का माध्यम बनता है।
यह लोकतंत्र का सबसे खतरनाक संक्रमण है। क्योंकि जब कोई संस्था खुले तौर पर समाप्त की जाती है, तब उसका प्रतिरोध किया जा सकता है। लेकिन जब उसकी संवैधानिक संरचना बची रहे और उसकी आत्मा सत्ता के अनुकूल ढलने लगे, तब संकट को पहचानना भी कठिन हो जाता है। भारत आज इसी बुनियादी सवाल से जूझ रहा है। सवाल केवल यह नहीं है कि संवैधानिक संस्थाएँ कितनी प्रभावी हैं, बल्कि यह है कि क्या वे सत्ता से असहमति रखने का नैतिक साहस और संस्थागत सामर्थ्य बचाए हुए हैं? क्या वे सरकार से सवाल पूछ सकती हैं? क्या वे सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच समान दूरी बनाए रख सकती हैं? क्या वे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा तब भी कर सकती हैं, जब ऐसा करना शक्तिशाली सत्ता या चुनिंदा पूँजीपतियों के हितों के विरुद्ध जाता हो? इन सवालों के बीच एक और सवाल खड़ा हो जाता है कि इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला मजदूर वर्ग अपनी ऐतिहासिक भूमिका और लोकतांत्रिक दायित्व को किस तरह समझे?
क्या संस्थाओं का संवैधानिक चरित्र बचा है?
भारतीय संविधान ने सत्ता को निरंकुश होने से रोकने के लिए संस्थाओं की एक ऐसी व्यवस्था निर्मित की थी, जिसमें कोई भी संस्था स्वयं संपूर्ण सत्ता का केंद्र न बन सके। विधायिका कानून बनाए, कार्यपालिका उन्हें लागू करे और न्यायपालिका संविधान की सीमाओं की रक्षा करे। निर्वाचन आयोग चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करे, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सरकारी धन के उपयोग की जाँच करे और संघ लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाएँ सार्वजनिक नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखें। इनके अतिरिक्त सूचना आयोग, मानवाधिकार आयोग, सतर्कता संस्थाएँ और अन्य नियामक निकाय नागरिकों के अधिकारों तथा सार्वजनिक जवाबदेही के लिए बनाए गए। इन संस्थाओं की स्वतंत्रता केवल उनके संवैधानिक या वैधानिक दर्जे से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए तीन चीजें अनिवार्य हैं -नियुक्ति की निष्पक्ष प्रक्रिया, कार्य करने की वास्तविक स्वायत्तता और सत्ता के दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेने का साहस। इनमें से किसी एक का भी क्षरण अंततः पूरी संस्थागत व्यवस्था के क्षरण का कारण बनता है।
आज इस क्षरण को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आ रही हैं। उदाहरण के लिए, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी 2023 के कानून ने चयन समिति की संरचना बदलकर मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया। इससे निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और सत्ता से उसकी दूरी को लेकर प्रश्न उठे हैं। फ्रीडम हाउस की 2025 की भारत संबंधी रिपोर्ट ने भी निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के संबंध में गिरावट दर्ज की और न्यायपालिका के राजनीतिकरण तथा निष्पक्ष प्रक्रिया संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया।
संसद की स्थिति भी इस विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। संसद का काम केवल सरकार के विधेयकों को पारित करना नहीं, बल्कि सरकार से जवाब माँगना, नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना और जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करना है। यदि बहुमत का अर्थ ही यह मान लिया जाए कि सरकार के प्रत्येक निर्णय पर मुहर लगाना विधायिका का दायित्व है, तो संसदीय लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी निगरानी और नियंत्रण की भूमिका खो देता है।
इसी प्रकार, जाँच एजेंसियों और नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता इस बात से निर्धारित होती है कि वे राजनीतिक पद, आर्थिक प्रभाव और सामाजिक हैसियत से परे जाकर कानून लागू कर सकती हैं या नहीं। किसी विपक्षी नेता के विरुद्ध कार्रवाई अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि समान प्रकृति के मामलों में कार्रवाई का चयन राजनीतिक पहचान के आधार पर होने लगे, तो कानून की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
इस निशाकाल में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करना आशान्वित करता है कि संस्थागत प्रतिरोध की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है। लेकिन लोकतंत्र की चिंता केवल इस बात से नहीं मिट जाती कि कोई संस्था कभी-कभार सत्ता के विरुद्ध फैसला सुना देती है। असली कसौटी यह है कि क्या संस्थागत स्वतंत्रता नियमित, विश्वसनीय और निर्भीक आचरण का हिस्सा बनी हुई है। क्योंकि लोकतंत्र में संस्थाओं की सबसे बड़ी विफलता तब नहीं होती, जब वे कोई गलत निर्णय लेती हैं; बल्कि तब होती है, जब वे सही निर्णय लेने की अपनी स्वतंत्रता खोने लगती हैं।
कॉरपोरेट पूँजी का बढ़ता प्रभाव
संस्थागत स्वतंत्रता के संकट को केवल राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे उस आर्थिक व्यवस्था की भूमिका को भी समझना होगा, जिसमें राज्य और बड़ी कॉरपोरेट पूँजी के बीच निकटता बढ़ती जाती है।
लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि राजनीतिक सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होती है। लेकिन जब आर्थिक संसाधनों का असाधारण संकेंद्रण कुछ कॉरपोरेट घरानों के हाथों में होने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उनका प्रभाव भी बढ़ने लगता है। चुनावों में धन का असमान इस्तेमाल, नीतिगत निर्णयों पर कॉरपोरेट प्रभाव, सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण और श्रम अधिकारों के संकुचन के प्रश्न इसी संदर्भ में देखे जाने चाहिए। चुनावी बॉन्ड विवाद ने इस समस्या को एक ठोस संवैधानिक प्रश्न में बदल दिया था। राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन की पहचान छिपाने की व्यवस्था ने मतदाताओं को यह जानने से वंचित किया कि राजनीतिक वित्तपोषण के पीछे किन आर्थिक हितों की भूमिका है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस अपारदर्शिता को असंवैधानिक ठहराया। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता केवल चुनावी सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों की वास्तविक भागीदारी का प्रश्न है।
इसका व्यापक अर्थ समझना चाहिए। यदि कोई बड़ी कंपनी सरकार की नीतियों से असाधारण लाभ प्राप्त करती है, यदि सार्वजनिक संसाधनों का आवंटन कुछ आर्थिक समूहों के हितों के अनुरूप होता है और यदि श्रम, पर्यावरण तथा उपभोक्ता हितों की रक्षा करने वाली संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, तो लोकतंत्र का आर्थिक आधार भी असमान होता चला जाता है। इस स्थिति में संविधान कागज पर सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, लेकिन वास्तविक जीवन में अधिकारों का उपयोग करने की क्षमता आर्थिक शक्ति के अनुसार विभाजित होने लगती है।
यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक लोकतंत्र और आर्थिक लोकतंत्र के बीच का अंतर सबसे अधिक दिखाई देता है। मतदान का अधिकार सबके पास है, लेकिन नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता सबके पास समान नहीं है। संविधान सबको समानता देता है, लेकिन बाजार में हर व्यक्ति की सौदेबाजी की ताकत समान नहीं होती। कानून सबको न्याय का अधिकार देता है, लेकिन न्याय प्राप्त करने के लिए आवश्यक समय, संसाधन और सामाजिक पहुँच सबके पास समान नहीं होती। जब पूँजी को सत्ता तक पहुँचने के लिए दरवाजे खुलते जाएँ और श्रम को अपने अधिकारों के लिए दरवाजे खटखटाने पड़ें, तब लोकतंत्र की औपचारिक समानता के पीछे छिपी वास्तविक असमानता को पहचानना जरूरी हो जाता है।
इस संकट की सबसे बड़ी कीमत कौन चुकाता है?
संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का प्रश्न किसी संवैधानिक विशेषज्ञ, राजनीतिक दल या संसद तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध उस व्यक्ति के जीवन से है, जो अपने श्रम से समाज का उत्पादन करता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक निर्णयों में उसकी आवाज सबसे कमजोर होती है।
एक मजदूर के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का अर्थ केवल न्यायिक स्वतंत्रता नहीं है। इसका अर्थ है कि यदि उसे बिना उचित कारण काम से निकाल दिया जाए, मजदूरी न मिले, कार्यस्थल पर दुर्घटना हो जाए या उसके संगठन बनाने के अधिकार का उल्लंघन हो, तो उसे न्याय मिल सके। एक खेतिहर मजदूर के लिए निष्पक्ष प्रशासन का अर्थ है कि सरकारी योजनाओं का लाभ बिचौलियों और प्रभावशाली लोगों के बजाय वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचे। एक निर्माण मजदूर के लिए संवैधानिक अधिकारों का अर्थ है कि उसके काम की सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा केवल सरकारी घोषणाओं में नहीं, बल्कि उसके जीवन में भी दिखाई दें। एक असंगठित श्रमिक के लिए लोकतंत्र का अर्थ है कि वह किसी ठेकेदार, मालिक या स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति के भय के बिना अपने अधिकारों की बात कह सके। एक महिला श्रमिक के लिए समानता का अर्थ है कि समान काम के लिए समान वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और सम्मानजनक जीवन उसकी वास्तविकता बने।
इसलिए संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण सबसे पहले उन लोगों को प्रभावित करता है, जिनके पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए निजी संसाधन, राजनीतिक पहुँच और सामाजिक प्रभाव नहीं हैं। धनवान व्यक्ति संस्थागत विफलता के बावजूद निजी अस्पताल, निजी विद्यालय, निजी सुरक्षा और महँगी कानूनी सेवाओं का सहारा ले सकता है। लेकिन मजदूर के लिए सार्वजनिक संस्थाएँ ही अंतिम आश्रय होती हैं। सार्वजनिक अस्पताल कमजोर होगा तो उसका परिवार प्रभावित होगा। सरकारी विद्यालय कमजोर होगा तो उसके बच्चों का भविष्य प्रभावित होगा। श्रम विभाग निष्क्रिय होगा तो उसकी मजदूरी और सुरक्षा प्रभावित होगी। न्यायिक व्यवस्था महँगी और विलंबकारी होगी तो उसका न्याय पाने का अधिकार अर्थहीन हो जाएगा।
इसलिए मजदूर वर्ग के लिए संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सशक्तिकरण कोई अमूर्त राजनीतिक आदर्श नहीं, बल्कि रोटी, रोजगार, सम्मान, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा हुआ जीवन-मरण का प्रश्न है।
मजदूर वर्ग : केवल आर्थिक शोषण का शिकार नहीं, लोकतंत्र का सबसे बड़ा संभावित रक्षक
यहाँ मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक भूमिका को नए सिरे से समझने की जरूरत है। मजदूर को सामान्यतः उत्पादन करने वाला व्यक्ति माना जाता है। उसकी पहचान कारखाने, खेत, निर्माण स्थल, परिवहन, खदान, कार्यालय या किसी सेवा क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के रूप में की जाती है। लेकिन मजदूर वर्ग की सामाजिक भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक है। वह समाज की भौतिक समृद्धि का निर्माता होने के साथ-साथ लोकतांत्रिक परिवर्तन की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है।
इसका ऐतिहासिक कारण है। मजदूर अपने जीवन में सामूहिकता का महत्व प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करता है। एक मजदूर अकेले अपनी मजदूरी नहीं बढ़वा सकता, लेकिन संगठित होकर ऐसा कर सकता है। एक कर्मचारी अकेले असुरक्षित कार्यस्थल की परिस्थितियाँ नहीं बदल सकता, लेकिन सामूहिक संघर्ष से ऐसा संभव हो सकता है। एक अकेला श्रमिक मालिक की मनमानी के सामने असहाय हो सकता है,लेकिन संगठित श्रमिक शक्ति उस मनमानी को चुनौती दे सकती है। यही सामूहिकता लोकतांत्रिक चेतना का आधार बन सकती है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण असंगति भी है कि जिस मजदूर वर्ग में लोकतंत्र की रक्षा की इतनी क्षमता है और जिसे सच्चे लोकतंत्र की सबसे अधिक जरूरत है, वह अपने वास्तविक संघर्ष के लक्ष्य से अनजान और विमुख होकर आज अनेक स्तरों पर विखंडित, असंगठित और राजनीतिक रूप से कमजोर दिखाई देता है। स्थायी और अस्थायी मजदूरों के बीच विभाजन है। संगठित और असंगठित क्षेत्र के बीच दूरी है। ठेका मजदूर, दिहाड़ी मजदूर, प्रवासी श्रमिक, घरेलू कामगार, खेतिहर मजदूर और गिग वर्कर अलग-अलग परिस्थितियों में संघर्ष कर रहे हैं। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक पहचान के आधार पर भी श्रमिकों के बीच विभाजन पैदा किए जाते हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि मजदूर अपनी साझा आर्थिक और लोकतांत्रिक समस्याओं को पहचानने के बजाय कई बार एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। यह केवल मजदूर आंदोलन की कमजोरी नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक शक्ति की कमजोरी है, जो संगठित होकर सत्ता और पूँजी के असंतुलित प्रभाव को चुनौती देने में अक्षम बनाती है। इस तरह यह महान शक्ति स्वयं भी शोषण-उत्पीड़न के तमाम हथकंडों का शिकार होती है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के संरक्षण में भी असमर्थ होती है।
मजदूर वर्ग के सामने नई चुनौती: श्रम अधिकारों से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा
भारत में चार श्रम संहिताओं को 21 नवंबर 2025 से लागू किए जाने के बाद श्रमिक अधिकारों और औद्योगिक संबंधों पर बहस ने नया रूप लिया है। श्रमिक संगठनों और श्रम-अध्येताओं के बीच यह चिंता है कि नए प्रावधानों से सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल और ट्रेड यूनियनों की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज ने भी इन संहिताओं के संदर्भ में ट्रेड यूनियनों की प्रतिरोध क्षमता पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण किया है।
इस बहस का मूल्यांकन लोकतांत्रिक नैतिकता की बुनियादी कसौटी पर होना चाहिए कि क्या श्रमिक की सामूहिक शक्ति, संगठन बनाने की स्वतंत्रता, उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल का अधिकार मजबूत हुआ है या कमजोर? यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि यदि मजदूर अपने कार्यस्थल पर अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठा सकता, तो वह सार्वजनिक जीवन में सत्ता की मनमानी के विरुद्ध कितना प्रभावी प्रतिरोध कर पाएगा?
इसलिए आज मजदूर आंदोलन को अपने संघर्ष का दायरा विस्तृत करना होगा। उसे केवल वेतन वृद्धि, बोनस, महँगाई भत्ता, पेंशन और सेवा शर्तों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन मुद्दों का महत्व कम नहीं है, लेकिन अब लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता भी मजदूर आंदोलन के एजेंडे का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए।
मजदूर आंदोलन को अपनी राजनीति भी बदलनी होगी
यह कहना आसान है कि मजदूरों को एकजुट होना चाहिए। लेकिन वास्तविक सवाल है कि यह एकजुटता बनेगी कैसे? इसके लिए सबसे पहले मजदूर आंदोलन को अपनी राजनीतिक सीमाओं और कमजोरियों की आत्मालोचना करनी होगी। भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक दलों से संबद्ध रहा है। इस संबद्धता ने कई अवसरों पर श्रमिकों को राजनीतिक शक्ति प्रदान की, लेकिन इसके कारण मजदूर संगठनों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता भी प्रभावित हुई है। कई बार मजदूरों के वास्तविक हित राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं के पीछे चले जाते हैं। सत्ता पक्ष से संबद्ध संगठन सत्ता की आलोचना करने में संकोच करते हैं और विपक्ष से जुड़े संगठन हर मुद्दे को केवल सरकार-विरोधी राजनीति में सीमित कर देते हैं। इस स्थिति में मजदूर वर्ग का अपना स्वतंत्र वर्गीय विवेक कमजोर पड़ता है। उनकी पहली निष्ठा मजदूरों के अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के प्रति होनी चाहिए।
दूसरी चुनौती जाति और सांप्रदायिक विभाजन की है। भारत में मजदूर केवल मजदूर नहीं है; वह किसी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है। इन पहचानों को मिटाकर वर्गीय एकता स्थापित करने की कल्पना दुष्कर है। मजदूर आंदोलन को अपने भीतर जातिगत उत्पीड़न, धार्मिक भेदभाव, लैंगिक असमानता और क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों के विरुद्ध स्पष्ट रुख अपनाना होगा। क्योंकि जो संगठन अपने भीतर समानता और सम्मान स्थापित नहीं कर सकता, वह समाज में समानता और सम्मान की लड़ाई का प्रभावी नेतृत्व भी नहीं कर सकता।
तीसरी चुनौती नए श्रम संसार की है। आज मजदूर केवल कारखानों में काम नहीं करता। वह ऐप आधारित सेवाओं में काम करता है, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से रोजगार प्राप्त करता है, घरों में काम करता है, छोटे प्रतिष्ठानों में अस्थायी कर्मचारी है और अलग-अलग राज्यों में प्रवासी श्रमिक के रूप में जीवन बिताता है। मजदूर आंदोलन को इन सभी श्रमिकों को अपने संगठनात्मक दायरे में लाना होगा। यूनियन की सदस्यता और सामूहिक सौदेबाजी के पारंपरिक ढाँचे से आगे बढ़कर नए प्रकार के श्रमिक संगठनों, डिजिटल नेटवर्क और साझा अधिकार मंचों का निर्माण करना होगा।
मजदूर आंदोलन का भविष्य इस बात से तय होगा कि वह केवल पुराने औद्योगिक मजदूरों की रक्षा करता रहेगा या बदलती अर्थव्यवस्था में पैदा हुए नए श्रमिक वर्ग को भी अपनी सामूहिक शक्ति का हिस्सा बना पाएगा।
इतिहास की दस्तक : चुप्पी भी एक राजनीतिक निर्णय है
इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ धीरे-धीरे कमजोर हुईं और समाज का बड़ा हिस्सा तब तक निष्क्रिय बना रहा, जब तक संकट उसके अपने जीवन को प्रभावित करने नहीं लगा। संस्थाएँ अपने आप स्वतंत्र नहीं रहतीं। उनकी स्वतंत्रता के पीछे सक्रिय नागरिक चेतना, जनसंगठन और लोकतांत्रिक संस्कृति होती है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति उदासीन हो जाते हैं, जब राजनीतिक निष्ठा संवैधानिक निष्ठा से भटक जाती है और जब समाज अन्याय को अपनी रोजमर्रा की नियति मानने लगता है, तब संस्थाओं का क्षरण आसान हो जाता है।
यहाँ मजदूर वर्ग के सामने सबसे बड़ा खतरा केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का क्षरण है। जब किसी मजदूर को यह समझाया जाने लगे कि उसकी गरीबी का कारण दूसरे धर्म का व्यक्ति है, बेरोजगारी का कारण दूसरे राज्य से आया मजदूर है, महँगाई का कारण कोई विशेष समुदाय है और उसके जीवन की समस्याओं का समाधान केवल किसी नेता की महानता में छिपा है, तब उसके वास्तविक शोषण के स्रोत पर्दे के पीछे चले जाते हैं। और, जब वह इन झाँसों में उलझाकर अपनी मजदूरी, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवालों से विमुख हो जाता है, तब वह अपनी सामूहिक राजनीतिक शक्ति भी खोने लगता है।
मजदूर वर्ग को यह तय करना होगा कि वह इतिहास में केवल परिस्थितियों का शिकार बनकर रहना चाहता है या उन परिस्थितियों को बदलने वाली शक्ति बनना चाहता है। उसे यह भी समझना होगा कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा केवल न्यायाधीशों, चुनाव आयुक्तों, पत्रकारों या राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है। यह उस नागरिक की भी जिम्मेदारी है, जो अपने श्रम से देश की अर्थव्यवस्था चलाता है और जिसके नाम पर लोकतंत्र की संप्रभुता स्थापित की गई है। संविधान की रक्षा केवल संविधान की प्रतियाँ हाथ में लेकर नारे लगाने से नहीं होगी। उसकी रक्षा तब होगी, जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी अपने अधिकार के लिए बिना भय के खड़ा हो सके। इसी संदर्भ में मजदूर वर्ग के सामने आज का सबसे बड़ा ऐतिहासिक आह्वान है कि जिस हाथ ने कारखाने बनाए, खेतों में अन्न उगाया, सड़कों और पुलों का निर्माण किया और शहरों को खड़ा किया; अब उसी हाथ को लोकतंत्र की नींव भी मजबूत करनी होगी। जिस वर्ग ने उत्पादन की शक्ति को सामूहिक बनाया है, उसे राजनीतिक सत्ता को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की शक्ति अर्जित करनी होगी। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में मजदूर वर्ग दर्शक नहीं रह सकता। उसे इतिहास का सक्रिय पक्षकार बनना होगा।
आलेख के तथ्यात्मक और वैचारिक आधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण स्रोत :
भारत का संविधान, विशेष रूप से प्रस्तावना, अनुच्छेद 14, 19, 21, 23, 24, 32, 324 तथा CAG से संबंधित अनुच्छेद 148–151।
Freedom House – Freedom in the World 2025: India. रिपोर्ट देखें।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय – चुनावी बॉन्ड पर 15 फरवरी 2024 का ऐतिहासिक निर्णय। निर्णय देखें।
Comptroller and Auditor General of India – संवैधानिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही। संस्थागत भूमिका देखें।
Institute of South Asian Studies, National University of Singapore – भारत की नई श्रम संहिताओं और ट्रेड यूनियन प्रभाव पर अध्ययन, नवंबर 2025। अध्ययन देखें।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







