जब कोई गाँव में ‘हाँकने’ लगता था तो गाँव वाले कहते थे- ‘कांके जाना है क्या?’ कांके यानी पागलखाना। संसद में जो कुछ हो रहा है, उससे लगता है कि आने वाले दिन में देश ही कांके हो जायेगा। देशवासियों ने ऐसे नौनिहालों को चुना है जो गंदी, झूठी और ओछी बातें बोलने से परहेज़ नहीं कर रहा। जो जीत गया है, उसको लगता है कि संसद उसकी ज़रख़रीद गुलाम है। वह जो चाहे, करेगा। कर भी रहा है। यहाँ लोक-लिहाज़ नाम की कोई चीज नहीं बच गयी है।
बेऊरेब बोलने में निशिकांत दूबे का कोई जोड़ा नहीं है। इधर उन्होंने कहा है कि जब गाँधी मरे थे तो नेहरू एकांत में एडविना के कमरे में थे। कहने का अर्थ यह कि नेहरू रंगरेलियाँ मना रहे थे, जब गाँधी मरे थे। पहली बात गाँधी मरे नहीं थे, उनकी हत्या निशिकांत दूबे के पूर्वज नाथूराम गोडसे ने की थी और दूसरी बात निशिकांत दूबे उस वक़्त जीवित नहीं थे। जो इतिहास में विभिन्न लोगों ने जो राय व्यक्त की है, वही प्रमाण है। वे बतायें कि किस किताब में यह लिखा है? इतना बचकानापन और बेहूदापन एक सांसद कहाँ से ले आता है और ले आता है तो दूसरे लोग रोकते क्यों नहीं हैं?
रोकेगा भी कौन? खुद गृहमंत्री अमित शाह ‘साला, साला’ संसद में उच्चार रहे हैं। एक तरह से संसद की भाषा और मर्यादा निम्न स्तर पर पहुँच गई है। संसद में तथ्यहीन बात करना संसद की अवमानना है, लेकिन आज तो फेंकने वाले को ही बहादुर समझा जा रहा है। उसकी पीठ थपथपाई जा रही है।
गाँव-घर, टोले-मुहल्ले में गैस के लिए हाहाकार मचा है। होटल बंद हो रहे हैं। गैस एजेंसी के दरवाज़े पर सुबह से ही लाइन लगी है। आज मैं टहल कर लौट रहा था तो गैस के लिए लोग स्कूटर-मोटरसाइकिल से आये थे और आ रहे थे। भीड़ क्रमशः बढ़ती जा रही थी, जबकि सुबह के सात भी नहीं बजे थे। बीजेपी प्रवक्ता जनता पर ही आरोप लगा रहे हैं कि जनता गैस की जमाख़ोरी कर रही है। जनता गैस जमा क्या हंडिया-बिरूआ में करेगी? गैस रखने के लिए सिलिंडर चाहिए। आम जनता के पास एक और ज़्यादा से ज़्यादा दो सिलिंडर रहता है। वह जमाख़ोरी कहाँ से करेगी?
हार्मुज समुद्री द्वार को लेकर संग्राम छिड़ा है। यह संकीर्ण समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से गैस से भरे जहाज़ आते-जाते हैं। ईरान पर थोपे गए युद्ध रूक नहीं रहे और वह क्रमशः भयानक होते जा रहे हैं। इस मार्ग से आते-जाते जहाज पर हमले हो रहे हैं और ईरान ने तो यहाँ तक कहा है कि समुद्र का पानी खून से लाल कर देंगे। वे समुद्र का पानी जब लाल करेंगे, तो करेंगे, लेकिन यहाँ तो अनेक देशों के खून सूख रहे हैं। गाँव और जंगली इलाक़ों में तो किसी तरह चूल्हा जल भी जाये, शहरों और महानगरों में तो लाले पड़ने में देर नहीं है। ट्रंप और नेतन्याहू के लोभ और बदतमीज़ी के कारण पूरे विश्व में संकट गहरा रहा है। जो देश इन दोनों के पक्ष में खड़ा है, अप्रत्यक्ष रूप से वे भी वैश्विक संकट के ज़िम्मेदार हैं। अगर जल्द युद्ध बंद नहीं हुआ तो देश के अंदर सड़कों पर एक युद्ध शुरू हो जायेगा। मज़ा यह है कि ट्रंप महोदय कह रहे हैं कि वे संकट के समय अकूत पैसा कमा रहे हैं, जैसे कोरोना के समय देश परेशान था और अड़ानी पैसा हसोत रहा था। रूस भी मज़े में है। दोनों आपदा में अवसर का महाआनंद लूट रहे हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





