दुनिया में हथियार की खोज में जितनी संपदा की बर्बादी हुई, काश, दुनिया को रचने में उतनी संपदा लगाई गई होती तो दुनिया स्वर्ग हो गई होती। खैर, मौजूदा सरकार युद्ध पर चुप रहे। अमेरिका- इज़राइल से दोस्ती करे या अपनी ग़लतियों के छिपाने के लिए बिल में घुस जाए, लेकिन जनता को सबल होना चाहिए। उसे खुलकर युद्ध का विरोध करना चाहिए। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। लेकिन हमारे देश में ढोंगियों और पाखंडियों की कोई कमी नहीं है। वह मंत्रों के बल पर बच्चा जन्माने का दावा कर सकता है। शासकों का भविष्य बताने और उसे जीतवा या हरवा सकने का दावा पेश कर सकता है। उंगुलियों में अँगूठी पहना कर भविष्य सुधारने का दावा तो आम है। सच्चाई यह है कि इन्हें कुछ भी नहीं आता है। वे ठग हैं और आदमी की कमजोरियों का मुनाफ़ा कमाते हैं। भारत के मानस को कमज़ोर करने में बाबाओं का अन्यतम योगदान है।
रूस-यूक्रेन में सालों से युद्ध चल रहा है। ज़्यादातर लोग मान रहे थे कि रूस दो-चार दिनों में यूक्रेन को कुचल देगा। लेकिन यूक्रेन अड़ा रहा। युद्ध के दौरान ही व्हाइट हाऊस में यूक्रेन के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भिड़ गए। फिर लल्लो-चप्पो का दौर चला। दोनों में समझौते हुए। अमेरिका हथियार का सौदागर है। उसका चाल, चरित्र और चेहरा मुनाफा आधारित है। उसे युद्ध रोकने नहीं, करने-करवाने में फ़ायदा है। हम सब बाहर से अमेरिका की चमक-दमक देखते हैं, लेकिन इसके इतिहास में कालापन भरा हुआ है। जो लोग अपने देश को अमेरिका बनाना चाहते हैं, उसके दिल और दिमाग़ में कालापन छाया हुआ है। एक अमेरिका बनाने के लिए कितने देशों के ख़ून-पसीने लगे हैं, कितनी नीति और नैतिकता का ख़ून हुआ है, इसकी लंबी फ़ेहरिस्त है। डोनाल्ड ट्रंप एक अनैतिक राष्ट्रपति है । एपिस्टीन फाइल में उसका साफ़-साफ़ उल्लेख है। संपत्ति और सेक्स अनैतिकता के दो बड़े स्रोत हैं। ट्रंप दोनों में निष्णात हैं। आज अपने लोभ और लालच में मानव का ख़ून कर रहा है। नेतन्याहू और ट्रंप को अतिरिक्त अभिमान हो गया है। युद्ध में मारी गयी निर्दोष लड़कियों, आम नागरिकों और यहॉं तक कि सैनिकों का वह गुनाहगार है। आधुनिक सभ्यता के दोनों बड़े हत्यारे हैं। ऐसे लोगों से दोस्ती या तो हत्यारा कर सकता है या कायर-डरपोक।
जिस देश का प्रधानमंत्री चंदन-टीका लगाने, धार्मिक अनुष्ठान में हिस्से लेने, मंदिर का उद्घाटन करने और बाबा का कपड़े धारण करने में गर्व महसूस करता हो, उस देश में डरा हुआ मानस ही पैदा हो सकता है। आज प्रधानमंत्री संसद नहीं आ रहे। संसद सर्वोच्च है। प्रधानमंत्री का चुनाव इसलिए होता है कि वे संसद को सुनें, सम्मान दें, बहस में हिस्सा लें और देश का संसद के मुताबिक़ नेतृत्व करें। संसद की अवहेलना करना संविधान का उल्लंघन करना है और अपने दायित्व से भागना है। रात-दिन अमेरिका प्रधानमंत्री के स्वाभिमान पर हमला करता है और वे चुप रहते हैं। इससे उनके स्वाभिमान पर कोई असर पड़ता है या नहीं, मगर भारत का स्वाभिमान आहत होता है।
पूर्व के प्रधानमंत्री इतिहास हैं। इतिहास से मात्र सीखा जा सकता है। वर्तमान के प्रधानमंत्री से इतिहास बनता है। वर्तमान के प्रधानमंत्री से वर्तमान का सवाल होगा और इन सवालों से दूर भागने के लिए अतीत में छुपना यह बताता है कि देश विश्व गुरु नहीं, देश-गुरु भी नहीं बन पा रहा। विश्व गुरु बनने के लिए विश्व के अन्य देशों को चेला बनाना ज़रूरी है। इस तरह का स्वप्न एक दु:स्वप्न है। हमें एक ऐसा देश चाहिए जो स्वाभिमान से जी सके। और यह तब होगा, जब दिनकर की पंक्तियाँ होंगी –
शान्ति नहीं तब तक जब तक सुख-भाग न नर का सम हो नहीं किसी को बहुत अधिक हो नहीं किसी को कम हो।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







