मंजर आम के वृक्षों में भकभका कर उगा है। यहॉं तक कि जहॉं उसके उगने का कोई चांस नहीं था, वहाँ भी। आम के धड़ों में, जहॉं न कभी टहनियाँ थीं, न पत्ते। उसके सामने ही है कटहल का पेड़, आसमान छूता हुआ, लेकिन कहाँ ख़ुशबू, कहाँ आकर्षण! जबकि उसमें भी फूल लगे हैं।कटहल के फूलों का अहसास भी नहीं होता कि कब उगा, कब फल बना। फल भी हुआ तो रूक्ष, कांटेदार। लोग रुक्षता का गीत क्यों गाये? इसलिए कवियों ने तो उसे त्याग ही दिया है, लोक गायकों ने भी तरजीह नहीं दी। लोगों की उपेक्षा से ही कटहल ने अपने होने के लिए स्थान निर्धारित नहीं किया। वह कहीं भी उग जाता है। यहॉं तक कि धरती के अंदर जड़ों में भी। आम बौरा जाता है, क्योंकि उसकी भीनी सुगंध न केवल नथुनों को, बल्कि कवियों के लिए भी अपूर्व आकर्षण का केंद्र रहा है । कटहल आवेग- मुक्त होता है। उपेक्षा अंदर तक धंसती है। वह मन-मिज़ाज को विकृत कर देती है। आम का बगीचा होता है, कटहल का बगीचा नहीं होता। पच्चीस-पचास आम के बीच एक कटहल होता है। जो भी हो। आम की मंजरियों ने इस बार ग़ज़ब ढाया है। बगीचे में तो मंजरियों की ख़ुशबू फैली ही है, वह घरों में भी फैल गई है। मंजरियों के लिए आम की टहनियाँ लॉंचिंग पैड ही है। हर वर्ष वह मंजरियों को लॉंच करती है और संसार को खूबसूरत बनाती है ।
सत्तर-पचहत्तर वर्ष के लोकतंत्र में भी नेताओं ने संसदीय राजनीति को लॉंचिंग पैड बना दिया है। वे अपने पुत्र-पुत्रियों को लॉंच कर रहे हैं । राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं। उनमें खूबियों की बरसात होती है। घनघोर जातिवादी और चमचावादी उनमें क्रांतिकारी तत्व ढूँढ-ढूँढ कर निकालते हैं। दुनिया के लोगों ने यह कहावत यों ही नहीं रची थी- ‘कमाबे लंगोटिया, खाये लंब धोतिया।’
जो समाज लोभियों से भरा हो, वहॉं ठगों की ही चलती है। राजनीति में नेताओं के पुत्र आयें, लेकिन राजनैतिक कमाई करके आयें। एक सिपाही बनने के लिए कितनी कठोर ट्रेनिंग होती है और किसी को राज्य या देश का विधान मंडल सौंप रहे हैं और उसकी कोई राजनीतिक कमाई नहीं है, न समझ है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीति में ही दाख़िला दिलवाना है तो पहले गाँव-गलियों में रगड़ा खाने दीजिए, पढ़ाइए-लिखाइए, तब राजनीति में प्रवेश कराइए।
परिवारवादियों की अब एक लंबी परंपरा हो गई है । बाप मरे तो बेटा-बेटी को टिकट आम बात है। अब जिनके ख़ानदान में कोई रोनेवाला नहीं है, उसकी बात अलग है, वरना देश ने तो परिवारवादियों को प्रधानमंत्री की कुर्सी भी सौंपीं है। मंत्री-उप मुख्यमंत्री तो आम बात है। राजनीति में गिरावट यों ही नहीं आयी है। लफंदरों से यह भर गयी है। मज़ा यह है कि वे एक दूसरे को परिवारवादी कह कर गलियाते भी हैं। जनता बेचारी जातियों में बँटी है। वह अपने-अपने हिस्से के परिवारवादियों को छाती से चिपकाए रहती है। अगर मामू अपना सगा न हुआ तो कन्ना ही सही। ग़ज़ब का ढंग और ढकोसला है। जैसे गाँव में गायों का सहेर होता है और एक गोरखिया होता है, वैसे ही नेता खुद गोरखिया बन कर अपना बेटा-बेटी, पत्नी, समधी-समधन, दामाद को सहेर बना कर लॉंच कर दिया है। और भाई, हमें तो रोटी से काम, भज लो राम, भजा लो राम।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






