किसी भी चैनल को खोलिए। आपको झाँव-झाँव करते हुए एकंर और पार्टियों की प्रवक्ता मिल जायेंगे। उनके झाँव-झाँव सुन कर गली के कुत्ते भी हड़क जाते हैं। मसालची एकंर और मसाला परोसते प्रवक्ता। लगता है कि सबने पौआ चढ़ा लिया है। होश हवास ही नहीं रहता कि क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं? कोई एक दूसरे की बात नहीं सुन रहा। कोई ईर घाट तो कोई वीर घाट। हरेक की बोली तलवार की तरह तनी रहती है। एक दूसरे पर वे दंड प्रहार करते रहते हैं। धन्य है हमारे देश के श्रोता, जो उनकी बातों को सुन और समझ लेते हैं। इस देश ने शून्य का आविष्कार किया है। हमारे श्रोता बकवास में भी अर्थ ढूंढ लेते हैं।
श्रोता के अंदर में तलवारें बैठी हुई है। वह भी हर वक्त मैदान-ए-जंग में ही रहती है। एंकर को तो ऐसा लगता है कि वही देश चला रहा है। वह समर्थन में ऐसी-ऐसी बात बोलता है जो किसी भी राजनेता को नहीं पता। पता नहीं, इन लोगों के अंदर कोई आदमी बैठा है या नहीं? जब नोटबंदी के बाद रंग-बिरंगे दो हजार टकिए जारी हुए तो एंकर ने एक ऐसी चिप्स उसमें ढूँढ निकाली जो रूपए छापने वाले को भी पता नहीं था। एंकर श्वेता सिंह झूठ बोल रही है, इसका पता वित्त मंत्री, आरबीआई, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री सबको था, मगर किसी ने प्रतिवाद नहीं किया। इन्होंने झूठ फैलने दिया, सिर्फ इसलिए कि उन्हें लोग करामाती समझें। वे कितने निपुण हैं और पूर्व के लोग कितने मूर्ख थे, जनता के अंदर यह बात बैठ जाय। आज बाजार से दो हजरिया नोट गायब है। बिना बंदी के वह बंद हो गया। उससे चिपकी चिप्स मृत हो गई। श्वेता सिंह से लेकर प्रधानमंत्री ने इसके लिए कभी अफसोस जाहिर नहीं किया, ना उन्हें शर्म महसूस हुआ।
शुतुरमुर्ग कम-से-कम जानता है कि आँधी आ रही है। उसे रेत में सिर छिपा लेना चाहिए। रेत में छिप जाने से आँधी ख़त्म नहीं होती। लेकिन शुतुरमुर्ग हकीकत जानता है। ये एंकर और पार्टी प्रवक्ता इस दुनिया के नहीं लगते। दो चार स्वतंत्र प्रवक्ता हैं, जिन्हें बोलने तक की तमीज नहीं है, पता नहीं कैसे उन्हें बुला लिया जाता है। गली का कुत्ता कुछ करे, न करे, झाँव-झाँव कर अपने होने का अहसास जरूर कराता है। एंकर समूहों के लोग तो झाँव-झाँव कर अपनी प्रजाति बदल लेते हैं। आदमी हैं तो उम्मीद की जाती है कि एक दूसरे का सम्मान करेंगे, परस्पर की बातें सुनेंगे, तर्क करेंगे, संवेदनशील होंगे, देश और समाज के प्रति जिम्मेदार होंगे। लेकिन नहीं, वे आदमी का गुण खोकर आधे कुत्ते का गुण प्राप्त कर लेते हैं। आदमी को आधे कुत्ते में बदलते हुए देखना चाहते हैं तो चैनल सर्वोत्तम जगह है।
कुत्ता वफादार होता है। वह मालिक के साथ हर हाल में रहता है। आदमी पूरा कुत्ता नहीं हो पाता। वह मालिक की वफादारी तभी तक करता है, जब तक मालिक शक्तिमान है। मालिक की शक्ति गई कि वह उस मालिक के पास पहुँच जाता है, जहाँ शक्ति चली गई है। इनकी वफादारी कुत्ते से भी कम है। मैं तो यह भी देख रहा हूं कि एंकर समूहों के साथ श्रोताओं का भी अद्भुत अनुबंध है। वे भी उनकी धूर्ततापूर्ण वफादारी का हिस्सा बन जाते हैं। यहाँ तक कि जनता का एक समूह भी जो कल तक किसी और पार्टी के तलवे चाटते थे, वे अपने स्वार्थ के लिए दूसरी पार्टी के तलवे चाट रहे हैं।
तलवे चाटने और अपनी वफादारी को गिरवी रखने से ही यह देश बार बार गुलाम हुआ। आज भी यह आदत बदली नहीं है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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