बड़ी मछली छोटी मछली को देखकर लपलपाती है। वह यह नहीं सोचती कि छोटी मछली भी उसी की प्रजाति की है। उसे सिर्फ निगलना आता है, सोचना नहीं । जहाँ सोचना बंद या अवरुद्ध हो जाय, वहाँ जंगलराज शुरू होता है। सत्ता को सोचने वालों से बहुत डर लगता है। जंगल का राजा सिंह होता है। वह भी सोचता कम है और अन्य जानवरों को भी सोचने नहीं देता और भयभीत रखता है। वह उतना ही सोचता है, जितने से उसका स्वार्थ सध जाये। वह यह भी उम्मीद करता है कि जानवर उतना ही सोचें, जितना वह चाहता है। स्वार्थ की अंधी दौड़ जंगलराज की पहचान है। जब कोई किसी को शेर कह कर पुकारता है तो मुझे अजीब लगता है। आदमी शेर होना चाहे, इससे बुरी बात और क्या हो सकती है। शेर का स्वभाव पर विजय प्राप्त कर मानव आदमी बना। शेर का नख-दंत, पंजे और उसकी भीषणता जंगल में कुहराम मचाते हैं। जानवर उससे भयभीत रहते हैं और मारेमारे फिरते हैं। अगर कोई पद डराने लगे तो समझिए कि उस पद में जंगलराज के दुर्गुण भरे पड़े हैं। ये पद कभी भी भयानक रूप धारण कर सकते हैं और सभ्य समाज को जंगल बना सकते हैं। इन पदों के नख-दंत को तोड़ देना चाहिए। यही वजह है कि लोकतंत्र के सभी पदों को नियंत्रित करने के लिए हर वक्त कोशिश करते रहनी चाहिए, वरना ये पद खूंखार और खूनी हो जाते हैं।
शेर में जंगलीपन होता है। वह दूसरे जानवरों के प्रति सहृदय नहीं होता। बावजूद इसके शेर बलात्कार नहीं करता। न शेरनी के साथ और न अन्य जानवरों के साथ। जानवर बलात्कार नहीं करते। इतनी सभ्यता उसे आती है। इस मामले में आदमी बेलगाम है। वह बलात्कार भी करता है और उसे सही भी ठहराने की कोशिश करता है। इसके लिए वह अनेक तरह की तिकड़म करता है। आदमी के पास अतिरिक्त बुद्धि है। बुद्धि की मार दोतरफा होती है। वह सृजन भी कर सकती है और विध्वंस भी। आइंस्टीन के पास अपार बुद्धि थी, उसने परमाणु बम का आविष्कार किया। परमाणु बम की मारक क्षमता से वे ख़ुद परेशान हुए। उन्हें लगा कि गलती हुई है। एक दिन अपने कमरे में लगी न्यूटन की तस्वीर हटा कर गांधी की लगा ली। उन्हें अहसास हुआ। दुनिया बम से नहीं बचेगी। आइंस्टीन गांधी से कभी नहीं मिले, लेकिन गांधी के विचारों और कर्मों की प्रशंसा की। बुद्धि जब बिगड़ती है तो हिटलर पैदा लेता है। हिटलर के पास बुद्धि की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उसकी बुद्धि जंगलराज कायम करती थी। महात्मा बुद्ध हुए। इनकी बुद्धि जोड़ने में ही लगी रही।
मेरे आदरणीय शिक्षक राधाकृष्ण सहाय उन दिनों जर्मनी गये, जब दीवारों के भी कान होते थे। पूरी जर्मनी सहमी रहती थी। वे अपनी पुस्तक ‘फिर मिलेंगे’ में एक वाकये का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं कि एक दिन अंधेरे में लुकते – छिपते एक लड़का आया और कहा कि मुझे महात्मा बुद्ध की किताब चाहिए। बुद्ध ही धरती की रक्षा कर सकते हैं। आजकल तीन-चार देशों के राष्ट्राध्यक्ष बौखते रहते हैं। अमेरिका, रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष। दूसरे देशों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घुस कर उसे तबाह करते रहते हैं। म्यांमार, होंडुरास, अर्जेंटीना, वेनेजुएला, ब्राजील आदि देशों की हालत देखिए। तिब्बत को हड़प कर चीन कैसे मूंछें ऐंठता रहता है। भारत में जब-तब घुसपैठ करता रहता है। देश में असल घुसपैठिए तो चीन ही है, लेकिन वह मजबूत है। कमजोर नेतृत्व अपने से कमजोर पर हमला बोलता है। वह पाकिस्तान के खिलाफ बुदबुदाता है। चीन पर चुप्पी साधे रहता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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