प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को पिछड़ी जाति का हिस्सा बताते रहे हैं। चुनावी रैलियों में पिछड़ा जाति का होना वोट पाने के लिए प्रयोग सिद्ध रास्ता है। वे अपने को लगातार हिन्दू भी साबित करते रहे हैं। जब-जब लगता है कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, तब-तब वे हिन्दू हो जाते हैं। उनकी आत्ममुग्धता का कोई जोड़ नहीं है। देवताओं का ड्रेस पहन कर गर्व से भर जाना और धार्मिक अवसरों पर चंदन टीका लपेस लेना उनका प्रिय शगल है। वह जानबूझकर बहुसंख्यकों का तुष्टिकरण करने में भिड़ जाते हैं।
पिछले दिनों जिस तरह से डमरू बजा कर और हनुमान जी को पतंग बना कर उड़ा रहे थे, लगता है कि यह देश अंधेरे खाई में जा गिरा है। इससे संविधान आहत होता है या नहीं या इसका भारत के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा – इसका आकलन भविष्य में होगा। फिलहाल प्रधानमंत्री पिछड़ी जाति के भी हैं और हिन्दू भी। उन्होंने कभी जाति खत्म करने की बात नहीं कही। आर एस एस के सर संघचालक मोहन भागवत भी जाति के खिलाफ नहीं बोलते, न उन्होंने जाति खात्मे के लिए अभियान चलाया। जो जाति के खिलाफ बोलते हैं, उन्हें वे आसुरी शक्ति बताते हैं। आर एस एस या बीजेपी के कार्यकर्ताओं को हिन्दू एकता इसलिए चाहिए कि उनकी सत्ता कायम रहे। राम कथा वाचक भी जाति गिनते नजर आते हैं। उन्हें अपने ब्राह्मण होने पर बहुत गर्व है। इन लोगों को हिन्दू राष्ट्र चाहिए। इनके स्वभाव और विचार से ऐसा लगता है कि उन्हें ऐसा हिन्दू राष्ट्र चाहिए जिसमें जाति का वर्चस्व कायम रहे।
मोहन भागवत ब्राह्मण हैं, हिन्दू धर्म के भजनीक रामभद्राचार्य ब्राह्मण हैं, धीरेन्द्र शास्त्री ब्राह्मण हैं। ज्यादातर राम कथा वाचक ब्राह्मण हैं। मजा यह है कि ब्राह्मणों में भी अनेक उप जातियाँ हैं, जो खुद को छोटी-बड़ी बताती रहती हैं। उप जातियों में बँटे ब्राह्मण को दूसरी जातियों का सामना करना हो तो एक हो जाते हैं। लेकिन वे उप जातियों की रेखाओं को नहीं लाँघते। आखिर यह कैसा ज्ञान है, जिसे गैर बराबरी में भरोसा है।
बात यहीं नहीं रूकती।भारत में सैकड़ों जातियाँ और उप जातियाँ हैं। चालाक और धूर्त स्वार्थ पूर्ति के लिए इसका जम कर इस्तेमाल करते हैं। मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी जी का कहना है कि वोट देने के समय हिन्दू हो जाओ और सामाजिक व्यवहारों और रीति-रिवाजों में अलग अलग रहो। ईश्वर ने हिन्दू जरूर बनाया, लेकिन उन्होंने ब्राह्मण और भंगी भी बनाया।
आज भी किसी गाँव में घुसिए तो आपको जातियों के टोले मिलेंगे। यहाँ तक कि शहरों में भी। टोले और टोले में विभेद मिलेगा, घृणा और गर्व का भाव मिलेगा। प्रधानमंत्री पिछड़ा हैं, तब भी डमरू बजा रहे हैं। उन्हें डमरू बजाने की पूरी छूट है, क्योंकि उनके माध्यम से जाति का स्वार्थ सधता है। यही डमरू मंदिरों में चमार और भंगी नहीं बजा सकते। समाज को कैसे स्वाभिमान और शौर्य के नाम पर गड्ढे में धकेला जाता है, इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत। वे जाति को तोड़ कर हिन्दू की एकता नहीं चाहते। उन्हें ऊँच-नीच कायम भी रखना है और हिन्दू राष्ट्र भी बनाना है। वे यह नहीं जानते या जानबूझकर इग्नोर करते हैं कि जातियों और उपजातियों के कारण हिन्दू समाज का स्वाभिमान सदियों से कुचला गया है। क्या हिन्दू समाज के स्वाभिमान कायम करने के लिए जाति का नष्ट होना जरूरी नहीं है? जातियों और उपजातियों के रहते कोई समाज स्वाभिमानी कैसे हो सकता है?
हिन्दू समाज का पिछड़ा प्रधानमंत्री जाति तोड़ने, बेरोजगारी दूर करने, महंगाई नियंत्रित करने, बेहतर और वैज्ञानिक शिक्षा का इंतजाम करने, आत्महत्या करते किसानों को राहत देने, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रुपये का अवमूल्यन होने, राष्ट्रपति ट्रंप को जवाब देने के बजाय वे सोमनाथ मंदिर में स्वाभिमान ढूँढ रहे हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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