मैं रिटायर्ड हुआ तो मेरे पास बहुत – से काम थे। खासकर पढ़ना और लिखना। जब से होश संभाला है, तब से पहले दोस्तों के साथ गप-गोष्ठी, थोड़े बड़े हुए तो राजनैतिक और शैक्षणिक गोष्ठी। गलियों से लेकर सभा सोसायटी तक सिलसिला कभी रुका नहीं। आंदोलनात्मक काम में भी हिस्सा लेता रहा। विश्वविद्यालय में रहते हुए मुझे न कुलपति से डर लगा और न सरकार से। खुल कर लिखा और भाषणों में खुल कर बोला। घर बनाने में जो क़र्ज़ था, उसे रिटायमेंट बेनिफिट से चुका दिया। एक बात कचोटती रही कि छात्रों से जीवंत जुड़ाव नहीं रहा। तब भी मेरे पास बहुत से काम हैं और मुझे फुर्सत नहीं है, लेकिन अपने कई साथियों को देखता हूँ, वे रिटायर्ड होते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं। शिक्षण कार्य में वे बहुत बेहतरीन थे। उन्होंने अपना सर्वस्व शिक्षण कार्य पर ही न्यौछावर कर दिया। जब वे छात्रों से अलग हुए तो जीवन लक्ष्यहीन लगने लगा।
मुझे लगता है कि जो सक्षम हैं, उन्हें काम मिलना चाहिए। पेंशन से आर्थिक जरूरतें पूरी होती हैं, मानसिक क्षुधा की नहीं। फिर देश और समाज को बहुत हानि होती है। अनुभव और प्रतिभा मुफ्त में बर्बाद हो जाती है। अमेरिका और जापान जैसे देशों में एक प्रयोग हो रहा है, जिसमें युवा और बुजुर्ग दोनों साथ-साथ रहते हैं और दोनों एक दूसरे से सीखते हैं, जिसे ‘मिराबेला माडल’ के नाम से पुकारा जा रहा है। न्यूयॉर्क की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ने यह प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग से बुजुर्गो का डिप्रेशन 30 प्रतिशत कम हो जाता है और युवाओं की क्षमता 15 प्रतिशत बढ़ जाती है।
संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग और युवा – बच्चे साथ-साथ रहते थे। संबंधों की प्रगाढ़ता और जीने के तरीके वे सीख लेते थे। अब परिवार एकल हो चला है, जिसमें बीबी और बच्चे के लिए ही स्पेस है। अब वानप्रस्थ आश्रम भी तो नहीं है, जहाँ बुजुर्ग ढंग से साँस ले सकें। पारिवारिक सरंचना बदल गयी है तो बुजुर्गों के लिए भी जगह चाहिए। किसान जीवन भर खेतों में खटता है। उसे अपनी मिट्टी की पहचान हो जाती है। पढ़ाते-पढ़ाते शिक्षक निष्णात हो जाता है। एक डाक्टर रोगी को देखकर रोग की पहचान कर लेता है। बुजुर्ग बहुत कुछ समझने लगता है। अगर युवा नये ज्ञान को शेयर करें और बुजुर्ग अपने अनुभवों को, तो एक नया रास्ता खुल सकता है। अंततः उम्र एक नंबर का ही नाम है। रिटायर्ड लोगों के दिमाग पर कम दबाव रहता है। वह खुले मन से सोच सकता है। राष्ट्र की अकूत क्षमता वाली यह संपत्ति बर्बाद हो जाती है। युवाओं में क्षमता की कोई कमी नहीं रहती। वे जो चाहें कर सकते हैं।
इधर के दिनों में कई देशों में विद्रोह हुए। सत्ता को उखाड़ फेंका गया, लेकिन अंततः हुआ क्या? विद्रोह हो, लेकिन होश के साथ हो। इसका अंदाजा हो कि कहीं उसके कंधे पर बंदूक रख कर कोई और तो चला रहा है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए विकसित देश दूसरे देशों में षड्यंत्र करते हैं। वहाँ की कमजोरियों को पकड़ कर देश के अंदर अराजकता फैलाते हैं।
बुजुर्गों की एक कमी यह होती है कि उनमें बदलने की क्षमता ज्यादा नहीं रहती। उनकी एक तरह की मानसिक ट्रेनिंग हो जाती है। युवाओं के साथ रह कर वे सीख सकते हैं और अपने अर्जित ज्ञान युवाओं तक पहुँचा सकते हैं। मैं अपने अनुभवों से कह सकता हूं कि आज मैं और भी बेहतर ढंग से पढ़ और पढ़ा सकता हूँ। सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने और लिखने में जो आनंद आ रहा है, वह छात्र जीवन में कभी नहीं रहा।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





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