स्टेशन पर कोलाहल रहता है। आज भी है। सभी तरह के मुकदमे तो ख़त्म हो गए हैं। एक चल रहा है, मुंगेर कोर्ट में। यह मुक़दमा 2014 से ही चल रहा है, आचार संहिता उल्लंघन का। किसी ने मेरे नाम से एक बैनर बरियारपुर में लटका दिया था। चुनाव की घोषणा के बाद हटाया न जा सका। पहले वारंट आया। मैने ज़मानत ली और फिर तारीख़ पर तारीख़। मैंने अकारण कई मुकदमे झेले हैं।
मुंगेर के लिए ट्रेन पकड़ी। प्लेटफार्म पर भीड़ अधिक थी। सामान्य श्रेणी का टिकट था। सामान्य यात्रियों में असुरक्षा का भाव अधिक रहता है। सीट मिलेगी या नहीं मिलेगी? उन्हें दूर-दूर जाना भी होता है। ट्रेन गांधीग्राम जाने वाली थी यानी गुजरात। सामान से लदे लोग। उन्हें याद कहाँ रहता कि उनके आगे या पीछे कुछ लोग भी हैं। उनका सामान किसी की नाक से टकरा रहा है या फिर उनके पाँव से किसी के पाँव कुचले जा रहे हैं, इसका ख़याल न के बराबर रहता है। ट्रेन में ही नहीं, लगभग सभी जगह यही हालत है। लोग असुरक्षित महसूस करते हैं। देश के सभी नागरिक हैं, लेकिन नागरिक-बोध सिरे से ग़ायब है। देश की आज़ादी तो सबके लिए थी। मगर यह आज़ादी सीमित लोगों के लिए रह गयी है। जिनके पास सत्ता में दख़ल देने की ताक़त है, वही आज़ादी के भोक्ता हैं ।
मैं मुंगेर पहुँच गया हूँ और बबुआ घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया हूँ। सामने गंगा है और है गंगा में भड़-भड़ाती हुई नाव। सुमित्रानंदन पंत ने कालाकांकर में रह कर जो नौका विहार किया था , वह यहाँ संभव नहीं है। अब नाव पतवारों के सहयोग से कम, डीज़ल इंजन के बूते चलती है। पंत ने कविता यों बुनी थी-
शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल! अपलक अनंत, नीरव भू-तल! सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल, लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल, लहरे उर पर कोमल कुंतल। गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर चंचल अंचल-सा नीलांबर! साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी-विभा से भर, सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर।
मुंगेर में मेरी माँ का घर है और मेरी स्नातक की पढ़ाई आर डी एंड डी जे कॉलेज में हुई है । जब मैं इंटर साइंस का रिज़ल्ट ख़राब कर इधर-उधर बौख रहा था तो डी जे कॉलेज ने ही शरण दी थी। उस समय उपेंद्र वर्मा प्रिंसिपल थे। साहित्यकार कपिलदेव सिंह जा चुके थे। डी जे कॉलेज को प्रतिष्ठित करने में कपिलदेव सिंह का बहुत बड़ा योगदान था। उस वक़्त हिन्दी विभाग भरा-पूरा था।
मुंगेर में घाटों की कोई कमी नहीं है और यहाँ का सबसे चर्चित घाट कष्टहरणी घाट है । रॉबिन शॉ पुष्प मुंगेर के ही थे और उन्होंने मुंगेर पर ज़बर्दस्त संस्मरण हंस पत्रिका में लिखा था। वे बाद में पटना में रहने लगे। कहानीकार अवधेश प्रीत ने उन्हें याद करते हुए लिखा है- “घर का छूटना एक लेखक के लिए महज ईंट-गारों से बनी दीवारों, कमरों और छत का छूटना भर नहीं होता। यह ‘छूटना’ अपनी जड़ों से, अपनी पहचान से भी छूटना होता है। रॉबिन शॉ पुष्प का ‘घर’ भी बार-बार छूटता रहा। वह बार-बार विस्थापित होते रहे। उनके व्यक्तित्व में इस ‘छूटने’ और ‘टूटने’ का इतना गहरा असर था कि वह बार-बार अपनी जड़ों की ओर लौटते और उसी से जीवनी-शक्ति संचित कर अपना रचना-संसार निर्मित करते।”
विस्थापन आज के युग की अनिवार्यता हो गई है। लेखक तो लेखक युवाओं का वृहत्तर समूह का घर छूट चुका है। वे दूसरे के घरों में अपनी जड़ें रोप रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी जड़ त्रासदियों से घिर गई है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







