भारत में ज्ञान प्राप्त करने के कई रास्ते हैं। आप आरण्यक में जाकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। उपनिषद में आरण्यक ज्ञान ही है। आप गलियों में भी ज्ञान हंसोत सकते हैं। आप चाहें तो भीड़ में या फिर शिक्षण संस्थाओं के सहयोग से ज्ञानी बनने के गुण हासिल कर सकते हैं। आप काम करते या बेकाम के काम करते हुए भी ज्ञान पर कब्जा जमा सकते हैं।
आप ज्ञान से स्थिर बुद्धि प्राप्त कर जी नहीं सकते, बल्कि दुनिया में जीने के लिए चंचल बुद्धि चाहिए। चंचल बुद्धि यानी मौकापरस्त बुद्धि। जीना है, कलेजे पर गोली नहीं खानी है। भगत सिंह फाँसी पर झूल गए या गांधी के सीने में तीन गोली उतार दी गईं। दोनों तो चले गए और जो रह गये, उनकी पौ बारह है। मंदिर में घंटा डुला कर नया इतिहास लिख रहे हैं। इतिहास में जो घटनाएँ नहीं घटी, उसकी पुनर्रचना कर रहे हैं। वे नयी-नयी कल्पनाएँ कर रहे हैं। कल्पना भी परेशान है कि किसके चक्कर में पड़ गए हैं। वे जोर से चिग्घाड़ रहे हैं कि गांधी के सीने पर तीन नहीं चार गोलियां लगी थीं। फिर वे ढीठ होकर पूछते हैं कि नाथूराम गोडसे ने तीन गोलियाँ मारी तो फिर चौथी किसकी थी? ज्ञानियों की एक जमात की हालत साँप-छुंछदर वाली है। जीना है तो सत्ता के चरण पखारने हैं। नतीजा है कि वे अपनी चंचल बुद्धि के बदौलत जैसे-जैसे सत्ता बदलती है, वे भी बदल जाते हैं। दल बदलू नेताओं की कोई कमी इस भारतभूमि पर पहले भी नहीं थी, अब विचार – बदलू नेताओं की कोई कमी नहीं है।
महाभारत का एक पात्र है- शल्य। वह मद्रदेश का राजा है। उसकी बहन माद्री से पांडु की शादी हुई है। माद्री के दो पुत्र हैं – नकुल और सहदेव। नाते रिश्तों के लिहाज से शल्य नकुल और सहदेव के मामा हैं। महाभारत युद्ध में शल्य को युधिष्ठिर के साथ होना चाहिए, लेकिन वे दुर्योधन के साथ चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें और उनके बेटे रूक्म और रूक्मथ को लगता है कि कंगले युधिष्ठिर महाभारत नहीं जीत पायेंगे। ऐसी दशा में मुफ्त में वे महाभारत के बाद दुर्योधन के कोपभाजन बनेंगे।
कोपभाजन बहुत बड़ी चीज है। कोई भी सत्ता का कोपभाजन बनना नहीं चाहता। अखबारों में नियमित लेख लिखने वाले की हालत देखिए। बदलने में वे गिरगिट से भी तेज रफ्तार से चलते हैं। सत्ता की आँख-से-आँख मिलाने वाले कई लोग जेल में हैं। कई संसार से विदा ले चुके हैं। बुद्धिजीवी भला क्यों जेल में सड़े या संसार से असमय विदा ले। सो वे तेजी से करवट बदल रहे हैं। कई ऐसे भी हैं, जब तक वे नौकरी में रहते हैं तो उनकी बुद्धि भोथरी रहती है। सेवानिवृत्त होते ही बुद्धि की बाढ़ आ जाती हैं। जज कुर्सी पर मौजूद रहे और बिना डरे या झुके – सत्य के पक्ष में फैसला सुनाता रहे तो उनकी प्रार्थना करनी चाहिए। वैसे जजों की कोई कीमत नहीं रहती जो जज रहते हुए तो डंडीमार फैसला देते रहे और सेवानिवृत्ति के बाद लंबी डींगें हाँकते हैं। आजकल सेवानिवृत्त आई जी, डीआईजी, चुनाव आयोग के सदस्य, अफसर चैनल पर प्रवचन देते हैं। ऐसे प्रवचन नहीं सुहाते, जो रंगहीन और वर्णहीन हैं। वैसे अपवाद सब जगह है। बुद्धि का अजीर्ण बहुतों को परेशान करता है। ऐसे लोगों की हालत आज के हनुमान की तरह है।
बेचारे हनुमान, कभी लक्ष्मण की जान बचाने के लिए पर्वत उखाड़ लाये थे। अब उन्हें डोरे में बाँध कर हवा में उड़ाया जा रहा है। हवा में उड़ते हनुमान पता नहीं क्या सोचते होंगे!

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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Best journalism
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