इन दिनों : सागर होता आदमी

"मनुष्य में संभावनाएँ बहुत हैं। वह बहुत तरल होता है। उसमें संवेदनाएं बहती रहती हैं, इसलिए उसमें बदलाव की अपार संभावनाएँ हैं। वह परिस्थितियों का शिकार भी होता है और उसे बदल भी देता है।" - इसी आलेख से

लहर पर लहर पर लहर पर लहर :
सागर, क्या तुम जानते हो कि तुम
क्या कहना चहाते हो?
टकराहट, टकराहट, टकराहट :

पर तुम
तुम से नहीं टकराते;
कुछ ही तुम से टकराता है
और टूट जाता है जिसे तुम ने नहीं
तोड़ा।

सागर
पर पक्षी ऊपर ही ऊपर उड़ जाते हैं,
सागर
पर मछलियाँ नीचे ही नीचे तैरती हैं,
नावें, जहाज़
पर वे सतह को ही चीरते हुए चले जाते हैं-
वह भी घाट से घाट तक।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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