आज 18 मार्च है। बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण दिन। 18 मार्च 1974 को छात्रों ने बिहार विधानसभा का घेराव किया था और तत्कालीन सरकार ने पटने में गोलियाँ चलायीं, जिसमें तीन छात्र मारे गये। फिर तो जनाक्रोश की हवा इतनी तेज़ हुई कि सरकार हिलने लगी। यह हवा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ तीव्रतर होती गयी। लंबी कहानी है। दमन, आपातकाल, लोकतंत्र की बहाली, सरकार का बदलना और फिर जन आकांक्षाओं वाली सरकार का गिरना। पूरे घटनाक्रम में दक्षिणपंथी पार्टी ने अपना स्वरूप बदल लिया। सोशलिस्ट पार्टी लुंजपुंज हो गई। उसकी वैचारिक और संघर्ष की धारा बिखरती चली गई। उधर-उधर टिमटिमाते तारे थे, जिनमें एकता की घोर कमी थी। उनमें व्यक्तिवाद इतना उग्र था कि समाजवाद को मरना ही था। दक्षिणपंथी पार्टी अपने एजेंडे पर काम करती रही और हिंदू जनता की नस सहलाती भी रही और दबाती भी रही। पूँजी और दक्षिणपंथी राजनीति के गठबंधन से वह अपनी धार मज़बूत करती रही।
सोशलिस्टों की धारा जहाँ-तहाँ टिमटिमा रही है, लेकिन अब उसमें न वैचारिक धार है और न लड़ने की क्षमता। अब उसके नेता कुछ करने के बजाय कुछ होना चाहते हैं। उनमें चलताऊ नेताओं और राजनीति की सड़ांध भर गयी है। वे मात्र जीने के लिए अभिशप्त हैं और वैचारिक पार्टी नहीं, अपनी जागीर का संचालन करते हैं। पार्टी अब उनकी बपौती है।
अगर हम आलोचना करते वक़्त अतिरिक्त रूप से सावधान नहीं रहे तो जिसकी आलोचना करते हैं, उनकी प्रवृत्तियों के शिकार हो जाते हैं। सोशलिस्ट पार्टी के बिखरे हुए टुकड़े- समाजवादी पार्टी, राजद, जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हम और आरएलएम इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनके विचार और पार्टी उनकी संतानों और संबंधियों में सिमट गये हैं।
वामपंथी पार्टियों में संतान-मोह नहीं है, लेकिन विचारों की प्रखरता और संघर्ष करने की क्षमता में कमी आई है। वामपंथ वैश्विक संभावना था, लेकिन यह धारा भी संकीर्णता का शिकार हो गई। उनमें भी पूँजीवादी प्रवृतियाँ घुस गईं और अंतर्राष्ट्रीय समानता नहीं, बल्कि अपने-अपने देश तक सीमित रहने लगी। बल्कि कहना चाहिए कि देश के अंदर भी समानता नहीं ला पाई और अब वह पूँजीवादी देशों की तरह ही दूसरे देशों को हड़पने के लिए तत्पर है। देश और विश्व के सामने जो वैचारिक संकट था और है, उसकी व्याख्या वह ढंग से कर नहीं पाई। नतीजा है कि वह अनेक टुकड़ों में विभाजित हो गई और दक्षिणपंथ के सामने हारी हुई नज़र आती है।
दक्षिणपंथी राजनीति लोक-लाज विहीन राजनीति है। वह नैतिकता और अनैतिकता में ज़्यादा भेद नहीं करती। उसे सिर्फ़ लक्ष्य का पता है। वह अपना रूप, रंग और चेहरे बदलती रहती है। इस बहुरंगी चेहरे में लुभाने की अपूर्व क्षमता है। जिन नेताओं में कुछ होने की प्रवृत्ति उछाल मारती रहती है, वे उसकी ओर तीव्र गति से दौड़ जाते हैं। विभिन्न दलों के स्वनामधन्य लोग अपना भविष्य दक्षिणपंथी राजनीति में देखने लगते हैं और रातोंरात बिक जाते हैं। सत्ता भ्रष्ट ही नहीं करती, बल्कि जिसे भ्रष्ट करती है, वह सत्ता को भी नचाने लगता है, क्योंकि वह अनुभव से सत्ता संचालन का हुनर सीख लेता है। मौजूदा हालात में देश में दक्षिणपंथी राजनीति अपनी बहुरंगी छवि, सत्ता की धौंस, दो-गले की बोल और अनास्था को आस्था में बदलने की अभूतपूर्व क्षमता के बूते रथ को दौड़ाती जा रही है। उनकी राह क्रमशः आसान होती जा रही है, जबकि वह अनेक स्तरों पर पूरी तरह विफल है।
नयी राजनीति विकसित होने की संभावना है। गर खतरे उठाने की तैयारी हो, वैचारिक प्रखरता हो और संघर्ष के लिए तत्परता हो तो देश ही नहीं, दुनिया को एक नया मॉडल प्राप्त हो सकता है। अभी का विकास-मॉडल युद्ध तक खींच लाया है। हमें दूसरा मॉडल चाहिए, जिसमें छह अरब लोगों के लिए समतापूर्ण स्पेस हो।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







