इन दिनों :अनिर्वचनीयता के बीच सृष्टिखोर

"असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। आदमखोर नहीं, सृष्टिखोर।" - इसी आलेख से

जंगलों की कितनी कहानियाँ होती होंगी! हज़ारों साल से अँधेरा, जानवरों और जीव-जंतुओं का डर, आँधी-तूफ़ान, लाखों पौधों व झाड़ियाँ और असुरक्षित जीवन- सब मिलजुल कर कितने आख्यान गढ़े होंगे, जो काल के साथ तिरोहित हो गये। शहरों के आख्यान लिखे जाते हैं, जंगलों के आख्यान को तो आख्यान भी नहीं माना जाता। वह मन और वह कलम है नहीं, जो इसे दर्ज कर सके। पेड़ों के बीच छायी नीरवता का सौंदर्य कितनी कोमल और मार्मिक है! रात के दस बजे जब घटाटोप अँधेरा हो, जानवर भी इधर-उधर से जाते हों, कुछ दिन पूर्व बाघ रास्ते पर बैठा हो और उस बीच टहलने की इच्छा हो तो बहुत कुछ मन में भाप की तरह उठने लगता है । अज्ञात डर भी, ख़ुशी भी और सतेज चेतना की कंपकंपी भी।

सुबह हुई है तो चिड़ियाँ चुनचुना रही हैं। हज़ारों पेड़ संन्यासी बन अविचल खड़े हैं। किसी पेड़ पर पतझड़ है तो किसी पर वसंत। महुए की गौंछी में सिर्फ़ फूल हैं, जो टपटप गिर रहे हैं। पत्तों का दरेस नहीं; लेकिन दूसरे पेड़ नवजात पत्तों से आच्छादित हैं। बरसों की ही कहानी होगी। एक महुए के पेड़ को एक बरगद ने अपनी बाँहों में समेट लिया है। महुए के मोटे धड़ और उसके चारों तरफ़ लिपटा बरगद! प्रकृति भी खूब कहानी कहती है!

यहाँ नेट चलता नहीं। कभी-कभार आता है। सो दुनिया में क्या चल रहा है, यह मुझे मालूम नहीं। जंगलों में जो रहते हैं, वे तो दुनिया में घट रही घटनाओं से अनजान बने रहते हैं। जंगलों के अंदर-ही-अंदर उन्होंने रास्ता बना लिया है। देश में गैस-संकट है या दुनिया में युद्ध के खतरे हैं या कोई सिरफिरा परमाणु बम कहीं फिंकवा कर कोई तमाशा देखेगा, उन्हें बिलकुल नहीं पता।

आगरे के एक क़िले से वीर कुंवरी ने यमुना में चलती नाव को देखा। उसकी इच्छा हुई कि वह नाव को डूबते हुए देखे। उसने बादशाह से कहा कि उक्त नाव यमुना में डुबोयी जाए। मेरी बलवती इच्छा है। कोई बादशाह जोरू की बलवती इच्छा को कैसे टाल सकता है। बादशाह ने सिपाहियों को आदेश दिया और नाव डुबो दी गई। नाव के नाविक मरे या यात्री- इससे राजा को क्या मतलब! अब न राजा है, न रानी, मगर सत्ता में बैठे लोगों का मिज़ाज राजा वाला है। मनमानापन सिर पर चढ़ कर बोल रहा है। इस धरती पर उसने कुछ नहीं बनाया, लेकिन हर दिन हवा, पानी और मनुष्य-जीव जंतुओं पर आक्रमण कर नष्ट कर रहा है।

जंगलों के जानवर ख़तरनाक जीव नहीं हैं। असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। आदमखोर नहीं, सृष्टिखोर। वे ख़ुद को श्रेष्ठ मानते हैं, लेकिन उनका इतिहास देखिए। उनके दाँतों में कितनी पीढ़ियों के लहू लगे हैं। उनकी जिह्वा ने लहू का स्वाद चख लिया है, इसलिए उन्हें कुछ और नहीं भाता।

जैसी कि बाघों की प्रकृति है, अमूमन बाघ जानवरों के शिकार करता है। लेकिन संयोग या दुर्योग से उसने किसी आदमी का शिकार कर लिया तो वह फिर जानवरों के शिकार नहीं करता, बल्कि आदमी का ही शिकार करता है। ट्रंप, नेतन्याहू आदि को आदत हो गई है। वह भूल गया है कि वह भी साधारण मनुष्य है। उसकी असाधारणता उसके बोध को नष्ट कर दिया है। नतीजा सामने है। वह बलि नहीं है, न बाहुबली है, वह हंता है, कायनात-हंता।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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