लौटते-लौटते रात के दस बज चुके थे। सुबह सवा छह में निकला था – पीरपैंती के लिए। लोगों से मिलते और मीटिंग करते देर होती गई। पीरपैंती के कई मुहल्लों में भी गया- सुंदरपुर, कीर्तनियां, किशनीचक आदि जगहों पर गया ही। पीरपैंती की हॉटस्पॉट अडानी एनटीपीसी पर भी गया। वहाँ दसियों जेसीबी चल रहीं थीं। ट्रैक्टर इधर-से-उधर भागदौड़ कर रहे थे। आम के कटे पेड़ों की लकड़ियाँ पड़ी हुई थीं। एक पहाड़ी लगभग तोड़ी जा चुकी थी। सुरक्षा गार्ड खड़ा था।
हम चार लोग भागलपुर से गये थे और फिर स्थानीय लोग भी शामिल हो गये थे। पहाड़िया जाति को मैंने कभी देखा नहीं था। उसका एक मुहल्ला अड़ानी एनटीपीसी की जद में आ गया है। उनकी आधी झोपड़ियाँ उजाड़ी जा चुकी हैं। आधी अभी तक क़ायम हैं। एक पक्का मकान था, जिसका आधा भाग बुलडोज़र से तोड़ा जा चुका था। अड़ानी एनटीपीसी स्थल में ज्योंही हमलोगों ने प्रवेश किया, पहाड़िया जाति के बीसों स्त्री-पुरुष आ गए। ये लोग हताश-निराश हैं। कोई आता है तो उनके अंदर हल्की-सी आशा बंध जाती है। वे कहने लगे कि हमारे लोग मरेंगे तो उसे कहाँ गाड़ेंगे? जो कब्रगाह थी, उसे इन लोगों ने घेर लिया। हम लोग दिशा-मैदान जाते थे। अब जगह बची नहीं।
दरअसल पहाड़िया जाति के लोग सैकड़ों वर्षों से रह रहे थे। ज़्यादातर के पास ज़मीन का काग़ज़ भी नहीं है। क़ानून की दुनिया में उनकी झोपड़ी अवैध है। कल्याणकारी राज्य की दुनिया में वे देश के नागरिक हैं। एक रुपए में हज़ारों एकड़ ज़मीन बिहार सरकार अड़ानी को दे रही है तो इस निर्धन भूमिहीन पहाड़िया जनजाति के लोगों को रहने के लिए तो कुछ ज़मीन का इंतज़ाम कर सकती है। सरकार या अड़ानी के लिए कौन मुश्किल बात है, लेकिन भारत का राजपाट लोगों का नहीं है।
पीरपैंती के वार्ड पार्षद हैं, वार्ड- प्रमुख है, विधायक हैं। विपक्षी पार्टियों के समूह हैं, लेकिन कोई उनके पक्ष में नही बोल रहा, क्योंकि हर पार्टी का चरित्र अब आम लोगों के खिलाफ है। सीपीआई के अंबिका प्रसाद कम से कम छह बार विधायक रहे। उनकी पार्टी भी है, राजद भी है, कांग्रेस भी है और कॉर्पोरेट के चरण-चुंबन करने वाली बीजेपी-जदयू भी है। आजकल समाजसेवियों की भी बाढ़ आयी हुई है। इन्होंने ज़मीन की हेराफेरी में अकूत धन कमाया है। इन लोगों ने आजकल हिन्दुओं के अलग-अलग संघ बना लिया है जो घर की स्त्रियों को भगवे रंग के वस्त्र पहना कर और माथे पर कलश लेकर जुलूस निकाला करते हैं। सभी मौजूद हैं। लेकिन सभी मूक-बधिर हैं। ऐसा एक युग हमारे सामने गुजर रहा है।
लोगों ने सोचा नहीं होगा कि लोकतंत्र इस मुकाम पर पहुँच जाएगा। लोगों के लिए कोई स्पेस नहीं बचेगा और पूँजीपतियों के लिए स्पेस-ही-स्पेस होगा। बिहार सरकार ने किसानों से ज़मीन यह कह कर ली कि एनटीपीसी बनायेगी। उसने किसानों से ज़मीन लेते वक़्त कभी नहीं कहा था कि वह ज़मींन एक रूपए में अड़ानी को बेच देगी। मजा यह है कि ज़मीन की बाउंड्री भी सरकार कर रही है और सरकार और अड़ानी कंपनी से बिजली ख़रीदने का जो करार है, वह भी अद्भुत है। सरकार अड़ानी से सबसे महंगे दर पर बिजली ख़रीदेगी यानी प्रति यूनिट छह रुपये पाँच पैसे की दर से।
देश के विकास की पटकथा अब सरकार नहीं लिखती, बल्कि पूँजीपतियों की कंपनियाँ लिखती हैं। सरकार तो सिर्फ़ ढोल-पार्टी है। देश की औद्योगिकी न केवल पूँजीपरस्त है, बल्कि प्रकृति और जन जीवन का नाश करने वाली है। लोग ऐसे अन्याय के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाते? नशे में विवेक मर जाता है और अगर समाज सामूहिक नशे का शिकार हो जाए तो वह भी ज़िंदा नहीं रहता। क्या दुर्भाग्य है इस समाज का कि जिन चीज़ों ने ग़ुलाम बना रखा है, उसे गले में गर्व से पट्टा लगाये घूम रहा है। धर्म अब आत्मा-परमात्मा की तलाश नहीं है, बल्कि केवल दिखावा, नफ़रत और अतार्किकता है, जिसमें आदमी की स्वतंत्र चेतना घुट कर मर गई है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






