फ़ेसबुक पर जो कुछ क़िस्से-कहानियाँ पढ़ता हूँ, इससे मन विचलित होता है। यों फ़ेसबुक पर लिखना मैंने बहुत पहले बंद कर दिया। कभी-कभार उसे उल्टा-पुल्टा लेता हूँ। सिर्फ़ इसलिए कि यह जान सकूँ कि दुनिया कहाँ तक पहुँची है। ज़्यादातर व्यक्ति एक तलवार लिए रहता है और दूसरे की गर्दन काटता रहता है। वह अपने को विशुद्ध और दूसरे को अशुद्ध मान कर चलता है।
फ़ेसबुक पर दो-तीन प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। एक – जो आप पसंद करते हैं, उसे एआई समझ लेता है और वैसे ही पोस्ट आपके सामने हाजिर करता है। यानी एआई आपको पढ़ लेता है। ज़ाहिर है कि फ़ेसबुक तटस्थ नहीं है। दूसरे, कुछ ऐसे पोस्ट आते हैं, जिसका प्रचार फ़ेसबुक पैसे लेकर करता है। उस पोस्ट में अक्सर नफ़रत फैलाई जाती है, असंभव घटनाओं को गौरवान्वित करने की कोशिश की जाती है, तर्कहीन और विवादास्पद बातें होती हैं। इसके बाद जो बचते हैं, उनमें दो प्रवृत्तियों का बाहुल्य है। एक अपनी जाति का समर्थन करना और दूसरे अपने संप्रदाय के लोगों को हवा देना। इसके बाद उनकी संख्या है, जो अच्छे और तार्किक पोस्ट करते हैं। यह संख्या बहुत कम रहती है। अंत में वे लोग हैं जो अपनी तस्वीरें चेपते रहते हैं। वे खाना खा रहे हैं, कि कहीं जा रहे हैं या किसी का जन्म दिन है या कोई धरती से चले गए हैं।
‘हार्दिक श्रद्धांजलियों’ से फ़ेसबुक भरा रहता है। संवेदना और लेखन से कोई संबंध ही नहीं रहता। फटाफट का युग है। इंस्टेंट फुड चाहिए। शब्द भी इंस्टेंट फुड बन गया है। आदमी इस कदर कातर है कि पूरी शिक्षा को इंस्टेंट फुड बना दिया है। बच्चों को सोचने का मौक़ा नहीं देना है। सेमेस्टर में बँटी शिक्षा दनादन नंबर दे रही है। इतने नंबर की झोली तो लबालब भर जाय, लेकिन दिमाग़ ख़ाली रहे या बेचैन रहे। महत्वाकांक्षा इस क़दर दिमाग़ जकड़ ले कि जीवन हाय- हाय करता रहे। बच्चे को खाने में भी फटाफट फुड चाहिए और नंबर भी फटाफट। लब्बोलुबाब यह कि ज़िंदगी छूटती जाती है और वह अंधकार से घिरती जाती है।
दूसरी बात यह सोशल मीडिया पर ज्ञान के नाम पर अज्ञानता फैलाई जा रही है। लोग उसे सच मान कर जीवन पर लागू करते रहते हैं। नतीजा है कि सच को पकड़ना मुश्किल है। सत्य-असत्य में जितना घालमेल इस युग में है, शायद ही किसी युग में रहा हो। कोई आदमी बड़ा दिखता है, अचानक वह गिनीपिग हो जाता है। गिनीपिग दक्षिण अमेरिका का कायर जानवर है।
इस युग की मुश्किलें ये हैं कि जो मंच पर दहाड़ता है, वह अक्सर कायर होता है। उसके काम और बोली में बेशुमार विभेद होता है। जो शांति से बात नहीं कह सकता, वह अक्सर झूठा होता है। मनुष्य का सद्गुण नज़र नहीं आता। वह दुनिया में आया ही इसलिए है कि वह दुनिया को सद्गुणों से मुक्त कर दे। सद्गुण उसके दुश्मन हैं। उसकी खाल इतनी मोटी होती है कि वह लिटमस पेपर की तरह रंगहीन व वर्णहीन होता है।
यह दुनिया ऐसे ही लफ़ंगों के हाथों में है। इसमें काली और गोरी चमड़ी का मामला नहीं है। दोनों चमड़ियों के अंदर एक ही जानवर सो रहा है। जिसका स्वभाव है- अति महत्वाकांक्षा, नफ़रत, हिंसा और अपने को सुप्रीम घोषित करना। इसकी वजह से दुनिया की धरती, जंगल और जल तबाह हैं। यों मूलतः ये कायर लोग हैं, लेकिन आज इसी कायरता का बोलबाला है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





