हर सुबह बुलबुल खिड़कियों में लगे शीशे पर चोंच चलाती है। उसे शीशे अच्छे नहीं लगते या जिसने शीशे लगाए हैं, वे अच्छे नहीं लगते, जो भी हो, वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करती रहती है। दुनिया में बुलबुल की 9700 हज़ार प्रजातियाँ हैं। छोटी-सी बहुरंगी चिड़िया। मजा यह है कि मादा बुलबुल गा नहीं पाती, नर बुलबुल गाते हैं। मुर्ग़े में देखिए। मादा बाँग नहीं देती, नर बाँग देता है। यों गाने और बाँग देने में बहुत अंतर है। गाने में तरन्नुम है। सुनने में सुखद लगता है। नर मुर्गा बहुत अहंकार में रहता है। उसे ध्यान से देखिए तो उसकी चाल में अकड़ साफ़ नज़र आयेगी। बुलबुल को शायद मालूम नहीं है कि देश के लिए क़ुर्बान होने वाले राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा था-
“क्या हुआ ग़र मिट गये अपने वतन के वास्ते बुलबुलें क़ुर्बान होतीं हैं चमन के वास्ते।”
वतन के वास्ते मिट गए बिस्मिल जैसे हज़ारों लोग और अब के सत्ताधारी स्वार्थ के वास्ते वतन को ही चींथ रहे हैं। देश की रक्षा के लिए जिन्हें देश सौंपा, लगता है, वे गिद्ध हैं, जिन्हें मांस की पोटली की रक्षा का दायित्व सौंप दिया गया है। एक थे जो घर-बार लुटाया और खुद को कुर्बान किया, एक ये हैं, जिन्हें साज़िश रचने, देश लूटने और असत्य बोलने के सिवा कुछ आता नहीं। वक़्त का परिंदा कहाँ से कहाँ पहुँच गया! टेर लगाने के बाद भी वक़्त लौटता नहीं-
“वक़्त का ये परिंदा रुका है कहाँ, मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा।”
कभी समय था कि खोने में गर्व महसूस होता था और एक समय यह है कि लोग जमा करने में गर्व महसूस करते हैं। वक़्त कितना बदल गया है, गाँव में घूमते और बातें करते महसूस होता है। एक गाँव में एक बैठक को संबोधित करने मैं गया। सभा को मैंने संबोधित किया, अन्य लोगों ने भी अपनी बातें कहीं। सभा की अध्यक्षता गाँव के एक इंजीनियर कर रहे थे। पहले वे सरकारी सेवा में थे, अब सेवानिवृत्त हैं। उन्हें आर्थिक कोई तकलीफ़ नहीं है। गाँव में वे होम्योपैथी की प्रैक्टिस भी करते हैं। कभी उनका पूरा परिवार कम्युनिस्ट हुआ करता था।अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कुछ नहीं कहा, मगर वे अंदर-ही-अंदर कुपित थे। मैंने वर्तमान सरकार और तथाकथित धर्म के कुप्रभावों के बारे में कहा था। सभा समाप्त होते ही वे लगभग फट पड़े- “सनातन धर्म आज से नहीं है। सदियों से है। वह था और रहेगा। नरेंद्र मोदी की सरकार 2047 तक रहेगी और भारत विश्वगुरु बनेगा।”
सनातन धर्म समता का धर्म नहीं है और सच यही है कि यह धर्म देश से बाहर नहीं फैला। देश से बाहर सनातन धर्म से विद्रोह करनेवाले बुद्ध फैले। जिस धर्म में आदमी को जानवरों से भी बदतर माना जाता है, वह विश्वगुरु कैसे बनेगा? लेकिन यह भी सच है कि लोगों के मन में सनातन धर्म और विश्वगुरुत्व की भावना को इस कदर बैठा दिया गया है कि वह न तर्क करना चाहता है, न चर्चा में भागीदार होता है। वह एकतरफ़ा प्रबोधन है। समाज को भेड़ों की झुंड में तब्दील किया जा रहा है।
कल ही नालंदा में मंदिर में कुचल कर आठ लोग मरे और अनेक घायल हुए। जिन्होंने जनता के अंदर अधार्मिक उछाल पैदा की, वही मृतकों और घायलों को दान-दक्षिणा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री ने दो लाख और मुख्यमंत्री ने छह लाख दिए। मृतकों को उन्हीं लोगों ने कुचला, जो भक्तगण थे। सचमुच वक़्त का परिंदा कहाँ से कहाँ आ गया!

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







