बंगाल में चुनाव नहीं हो रहा। जबरन बंगाल पर क़ब्ज़ा करने की तैयारी चल रही है। सेंट्रल फोर्स की छावनी बिछायी जा रही है। लगता है कि बंगाल पर कोई आक्रमण हुआ है। बंगाल पुलिस चुनाव में मूकदर्शक रहेगी। चुनाव आयोग ने उसे बेदखल कर दिया है। चुनाव आयोग ने लाखों लाख बंगाल वासियों को मतदाता सूची से निकाल दिया है।
हम एक अँधेरी गली में आगे बढ़ रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटरों को पकड़-पकड़ कर लाया जा रहा है। ज्ञानेश् गुप्ता, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तिकड़ी ने निर्णय लिया है कि साम- दाम-दंड भेद का सहारा लेकर बंगाल सरकार को अपदस्थ कर देना है। चुनाव में निष्पक्षता किताबों में पढ़िए और ख़ुश रहिए। मरती हुई लोकतांत्रिक व्यवस्था का हम सब दिग्दर्शन करें। ख़ुद की जमीर नहीं, वे दूसरों की ज़मीर तौलेंगे। ऊलजलूल बकना, लगातार अफ़सरों को हटाना, मनमाने को बैठाना- ज्ञानेश गुप्ता की आदत बन चुकी है। विपक्षी सरकारों और उसके नेताओं पर तीखे हमले करना और सरकारी नेताओं के कुकृत्यों पर पर्दा डालना उसका काम रह गया है।
हेमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के तीन पासपोर्ट, अमरीका में 56 हज़ार करोड़ की संपत्ति, दुबई में अरबों की संपत्ति- जिसका हलफ़नामे में ज़िक्र नहीं- ज्ञानेश गुप्ता के मुँह पर टेप लगा रहेगा। अगर किसी विपक्षी नेता पर यह आरोप लगता तो पाँव में घुँघरू बाँध कर नाचते। मीडिया तो ता-ता तैय्या करती। चित्रा त्रिपाठी, अंजना ओम कश्यप जैसे एकंर टीवी पर बैठ कर जो मुँह चला रही हैं, वह कितना गंदा और भयावह है! चुनाव कई राज्यों में हो रहा है, लेकिन बंगाल में जिस तरह से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त की गिद्ध-दृष्टि है, वह लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर ही मानेगी।
दूसरी तरफ़ हुमायूं कबीर और ओवैसी की जोड़ी- जिसके पीछे बीजेपी लगी है। बीजेपी ने एक टिकट मुसलमानों को नहीं दिया, नाम में भारतीय जुड़ा है, मुसलमान को वह भारतीय मानती नहीं, लेकिन दोनों मुस्लिम नेताओं की पीठ पर खड़ी है। गजब की राजनीति है और ग़ज़ब के हैं मुस्लिम नेता। सावरकर और जिन्ना की औलादें एक बार फिर भारत पर क़हर ढाने वाली है। बीजेपी के बेरोजगार नेता रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि ममता बनर्जी ईवीएम में छेड़खानी कर चुनाव जीतती रही है। यानी वे खुद मानते हैं कि ईवीएम में छेड़खानी संभव है। दूसरी बात ईवीएम चुनाव आयोग के क़ब्ज़े में रहता है। चुनाव आयोग केंद्र सरकार के क़ब्ज़े में है। अगर ईवीएम में कोई कर सकता है तो वह केंद्र सरकार है। चमकदार धूप में और खुले दरबार में दुशासन लोकतंत्र का वस्त्र उतार रहा है।
इस पर भी अगर ममता बनर्जी की पार्टी नहीं हारती है तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। ममता बनर्जी को कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल नेता मान ले और अगर तीनों अपने पद पर जरदगव बन कर बैठा ही रहे तो ममता बनर्जी को उससे लड़ने की खुली छूट दे। बाघ और कुकुर में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकती। लोकतंत्रभक्षियों के लिए कोई नियम-क़ानून नहीं होता। क़ानून बस्ते में बंद रहता है। क़ानून के रखवाले क़ानून की किताब पढ़ कर फ़ैसले नहीं देते, बल्कि बादशाह के चेहरे पढ़ कर फ़ैसला देता है। बादशाह का चरण-चुंबन न्यायालय, चुनाव आयोग, प्रशासन करने लगे तो लोकतंत्र बचता कहाँ है? आख़िर बचती है जनता। जनता के बीच भी दलाल हैं। लेकिन अंतिम उम्मीद जनता ही है। अपार कष्ट झेल कर जनता देश सँवारती है, लेकिन बहुरूपिये आते हैं, झाँसा देकर जनता के संघर्ष धूल-धूसरित करते हैं। आज तो कुछ ज़्यादा ही गर्दोगुबार छाया है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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