कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री बने थे तो अंग्रेजी में फेल रहने के बाद भी बच्चे पास हो जाते थे। आम लोग इसका नाम ‘कर्पूरी डिवीजन’ रख दिया था। ‘कर्पूरी डिवीजन’ बहुत पहले खत्म हो गया। अब बिहार के स्कूलों में अंग्रेजी बेमतलब हो गई है। अंग्रेजी की परीक्षा में सिर्फ बच्चे बैठ जायें , इतना भर काफी है। इसके अंक डिग्री में जुटते ही नहीं हैं। वे परीक्षा देने जाते हैं तो उत्तरपुस्तिकाओं पर या तो ड्राइंग बनाते हैं या खाली छोड़ देते हैं। बच्चों को परीक्षा का निर्धारित समय खपाने में अपार कष्ट हो रहा है और वीक्षक बच्चों की हरकतों से परेशान हैं। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति में कौन बेवकूफ बैठा हुआ है, जिसने अंग्रेजी की ऐसी हालत कर डाली? एक तरफ अंग्रेजी स्कूल धड़ल्ले से खुल रहे हैं। देश के सिस्टम में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और बिहार के बच्चों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति बेवकूफ बना रही है। अगर पूरे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व हो तो आप अंग्रेजी के बिना भी काम चला सकते हैं, लेकिन जब कुएं में ही भंग पड़ी हो तो भंग से परहेज़ करना मुश्किल है। दूसरी बात है कि किसी भी भाषा के प्रति बच्चों के मन में विष बोना बहुत ख़तरनाक बात है। अंग्रेजी एक समृद्ध भाषा है, इस नाते कोई इसका अध्ययन करना चाहता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। औपनिवेशिक मानसिकता के तहत अंग्रेजी को स्वीकार करना अच्छी बात नहीं है, जिसे केंद्र सरकार समेत राज्य की सरकारों ने अपना रखा है।
नब्बे हजार से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हुए। वे बंद क्यों हुए, जबकि देश की आबादी बढ़ रही है? विश्व के कई देश ऐसे हैं जो बच्चों की जिम्मेदारी उठाते हैं। जन्म के साथ ही सरकार उसे तमाम सुविधाएँ देती हैं। हमारे यहाँ दूसरी स्थिति है। सरकार ने अपने स्कूलों में मध्याह्न भोजन का इंतजाम कर रखा है। जहाँ भोजन करते हैं, वहाँ पढ़ाई होती है। शिक्षा प्रदान करने के लिए एक वातावरण चाहिए। बेहतर हो कि सभी बच्चों को छात्रवृत्ति दी जाय। विद्यालय विद्या का केंद्र बने, भोजन का नहीं। बच्चों की मानसिकता को मध्याह्न भोजन बर्बाद कर रहा है। उसके अंदर दारिद्रय भाव भर रहा है। निर्धन लोगों में कम-से-कम स्वाभिमान हो सकता है, लेकिन दरिद्र तो सब-कुछ को देता है।
सरकारी स्कूल बदइंतजामी और शिक्षा को पूँजीपतियों को हवाले करने के कारण बंद हो रहे हैं। सरकार कल्याणकारी योजनाओं से अपना हाथ खींच रही है और उसमें पूँजीपतियों को प्रवेश करा रही है। नयी शिक्षा नीति किसके लिए है? वह सिर्फ सरकारी संस्थानों के लिए है। निजी संस्थानों के अपने सिलेबस हैं। एनसीईआरटी ने बढ़िया सिलेबस बनाया है। किताबें उपलब्ध हैं, लेकिन पूरे देश में सिलेबस और किताबों को लेकर मनमानापन है। बच्चों को भीड़ की तरह हाँका जा रहा है। इन बच्चों के अंदर अपनी धरती, माता-पिता, समाज और देश के प्रति प्रेम कहाँ से उपजेगा? आये दिन हम बच्चों और अभिभावकों के कितने किस्से सुन रहे हैं।परिवार घुटन और टूटन के शिकार हैं। माता-पिता ने भी बच्चों से अतिरिक्त अपेक्षाएँ पाल ली हैं और बच्चे भी सद्व्यवहार नहीं कर पा रहे।
कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि जिस दौर में सरकार और उसके बंधुओं का सिर्फ एक काम है – मंदिर बनाना, कथावाचकों को अतिरिक्त तरजीह देना, बात-बात में धर्म के नाम पर बमक जाना, उस दौर में कोई पढ़ा-लिखा बच्चा अपने पिता को मार डाले और टुकड़े-टुकड़े कर दे! शायद इसी दौर में यह घटित हो सकता है, जब समाज को आध्यात्मिक बनाने के बजाय पाखंडी बनाते जायें। शिक्षा का यह पूरा तंत्र शातिर लोगों के हाथ में है, जो इसके बुनियाद को ही खोद रहा है।
प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







