वसंत में ही एक जंगली फूल खिलता है – टिटभांत। जहाँ-तहाँ उजले फूलों वाला यह पौधा खिल जाता है। ज्यों-ज्यों सूरज आसमान में चढ़ता है, त्यों-त्यों इसके फूलों की सुगंध मदमस्त करने लगती है। दूसरी तरफ है मंजरियों से लदे रसाल-वृक्ष। टिटभांत घुटनों तक आता है और आम का तो कोई लेखा नहीं, मगर दोनों की खुशबू में जबर्दस्त प्रतियोगिता है कि कौन नथुनों को सुवास से पहले भर देगा! यों चिड़िया स्वच्छंद ही होती है, लेकिन वसंत उसकी स्वच्छंदता में अभूतपूर्व वृद्धि करता है। ठंड उतर रही है और गर्मी चढ़ रही है। ठंड कंपकंपाने वाली हो तो चिड़िया भी दुबक जाती है। वसंत में वह पंख खोलती और मधुर ध्वनि के साथ आसमान की सैर करती है, मंजरियों से लदी टहनियों पर बैठती है और चहचहाहट से बगीचे को भर देती है।
आदमी बेचारा हाँफ रहा है। हर वक्त जुगाड़ में लगा रहता है कि दो पैसा कहीं से आ जाये! पेड़ों के बीच से गुजर कर भी नहीं गुजरता। उसे नजर ही नहीं आता कि पेड़ मंजरियों से लदे हैं और सृजन में लगे हैं। उसे तो कहीं फँसना है या फँसाना है। चिड़िया बेफिक्र है। अगर फिक्र है तो सिर्फ बच्चों की कि वे भूखे नहीं रहें। बड़े जतन से घोंसलों की रचना करता है और अपने रचे घोंसलों में अपने नवजात को पालता है। वहाँ घोंसलों में कोई प्रतियोगिता नहीं है। मनुष्य हर वक्त प्रतियोगी रहता है, इसलिए जीवन जीता नहीं है, घसीटता रहता है।
चिड़िया झुंड में उड़ती है। आदमी के पास चार यार भी नहीं हैं, जिसके साथ ठठा कर हँस सके। वह या तो डरा या सहमा या अतिरिक्त उत्तेजित रहता है। हँसी में खोखलापन साफ़-साफ़ महसूस होता है। जो जितने बड़े पदों पर, वह उतना ही अकेला है। प्रधानमंत्री के पास कोई दोस्त है? उनके पास चम्मच-बेलचे हैं, लाभार्थी हैं, लेकिन दोस्त नहीं हैं। भयावह अकेलापन है और हर वक्त एक डर उनकी चारों तरफ फैला हुआ। पता नहीं, कब कुर्सी गायब हो जाय। ऐसा आदमी आदमी कम, कुर्सी ज्यादा हो जाता है। ट्रंप, पुतिन, किमजोंग, शी जिनपिंग जैसे लोग क्या निर्भय हैं? उनके पास कोई दोस्त है, जिसके पास खुल कर हँस या बोल सकता है? इन लोगों ने दुनिया ही ऐसी बनाई है, जिसमें दोस्ती टिक नहीं सकती। उसे तो हर वक्त सत्ता खोने का डर बना रहता है।
आदमी की अतिरिक्त चेतना उसे डराती है। चेतना आदमी को निर्भार करती या निर्भय बनाती तो बड़ा सुखद होता। यहाँ तो जो जितना चेतनशील हो, वह उतना ही परेशान है। मुझे तो शक होने लगा है कि यह चेतना है या नहीं? यह चेतना कितनी भोथरी और कुंद है कि जब कोई मर जाता है तो फेसबुक पर हार्दिक श्रद्धांजलियों की भरमार हो आती है। जो लिखे जाते हैं, वे कितने औपचारिक होते हैं! आलोचना बर्दाश्त करना आसान नहीं होता और आजकल तो आलोचना कब झूठ को गले लगा कर वीभत्स हो जाय, कहा नहीं जा सकता। आदमी की बौद्धिक कुशलता इसी में लगी है कि कौन किसको कितना नंगा करता है! खैर।
नंगा को और नंगा करने के लिए नयी शिक्षा नीति आयी है। देश में गलगोटिया-चेतना को प्रखर बनाने के लिए निजी विश्वविद्यालय प्रस्तुत है। यूजीसी के बेवसाइट पर 471 प्राइवेट विश्वविद्यालय खुलने की सूचना है जिसमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश अग्रिम सूची में शामिल हैं। उम्मीद है कि सरकारी विश्वविद्यालयों को अपदस्थ कर जल्द ही गलगोटिया विश्वविद्यालय हमारे सिर पर नाचेगा और हमें अपार प्रसन्नता होगी कि अब हमारे बच्चे गलगोटिया-चेतना से लैस होंगे। यह कीमती चेतना नक़लची भी होगी और झूठ बोलने और लिखने से परहेज़ नहीं करेगी। एक नया इतिहास लिखेगी, जिसमें गद्दार नायक होंगे और नायक गद्दार। यह शुभ दिन आपके दरवाजे के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है। आप इसका स्वागत करने के लिए पंजीकरण करवा लें।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







