बादल मौजूद है आसमान में। पनियाया हुआ मौसम। लोग इसे प्री मानसून कहते हैं, लेकिन इससे किसानों के कलेजे पर छूरी ही चली है। सुबह टहलने एक तालाब पर गया। तालाब लगभग सूखा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने धूमधाम से इस तालाब को जीविका दीदी को सौंपा था। जिस दिन वे तालाब समर्पित करने आये, उस दिन तालाब में कृत्रिम उपायों से पानी भर दिया गया था। बगल के गाँव के दसियों ट्यूबवेल को सक्रिय कर इसे लबलबा दिया गया था। मुख्यमंत्री की आँखों में कुछ गड़े नहीं, इसका पुख्ता इंतज़ाम ज़िलाधिकारी करते हैं। ज़िलाधिकारी का मुख्य काम ही यही है।
मुख्यमंत्री आयें और उनके अमले-चमले न आयें, यह तो संभव नहीं है। तालाब सौंपते हुए मुख्यमंत्री ने चहकते हुए कहा कि जीविका दीदी इसमें मत्स्य पालन करेंगी। अब जब पानी ही नहीं है तो मत्स्य कहाँ रहे? हर गाँव में जीविका दीदियों का एक गिरोह है। सरकार बीच-बीच में उनको दान-पुण्य करती रहती है और जीविका दीदियाँ नीतीश कुमार के लिए वोट जुटाती रहती हैं। लोकतंत्र का क्रियाकर्म कैसे होता है, इसकी पूर्ण जानकारी और तरीक़े नेताओं को मालूम है। समृद्धि यात्रा करते हुए मुख्यमंत्री पुनः दूसरे गाँव में आये थे और वहाँ भी करोड़ों देकर गये। मुख्यमंत्री की दान-दक्षिणा का पब्लिक ऑडिट होना चाहिए। पता तो चले कि जनता का पैसा किसकी जेब की सुंदरता बढ़ाता है?
मौसम पनियाला हो तो कामिनी अभूतपूर्व ढंग से खिलती है। सफेद और गुच्छों में उसकी कलियाँ। तालाब पर घूमते हुए कामिनी की सुगंध आयी। इधर-उधर देखा तो कुछ दूरी पर सफेद फूल दिखाई पड़े। मैं उसके पास गया। लाखों कलियों से लदी कामिनी। कली जब फूल बन जाती है तो चौबीस घंटे से ज़्यादा नहीं टिकती, लेकिन उसकी सुगंध का क्या कहने! इसके टक्कर में बेली, मालती, रातरानी और मौलश्री। एक जगह कालिदास का अशोक भी मिलता है, लेकिन वह सुगंधहीन होता है। रास्ते में बेली और मालती मिलती है और फिर मिलते हैं जंगली फूल, ख़ासकर टिटभांत।
फूलों की दुनिया कितनी निष्पाप और निष्कलुष होती है! वृतों पर फूल खिलते हैं, झड़ते हैं, फिर खिलते हैं। काश, मनुष्य भी ऐसा होता। वह बटोरता कम, बाँटता ज़्यादा। मजा यह है कि वह बटोर भी क्या-क्या रहा है!
परसों गाँव में छह बैठकें कीं थीं। गाँव के लोगों से बातचीत । बातचीत का मकसद था – भागलपुर में फुले-अम्बेडकर जयंती समारोह का आयोजन। बातचीत बहुत तरह की हो ही रही थी कि एक किसान, मुश्किल से उसकी देह पर कपड़े थे, उसने बीच में टोका- “सब बात तो ठीक है, लेकिन मुसलमान को ठीक करना होगा। बड़ा लुटेरा और बदमाश होता है।” उसे समझाया गया कि जो भी मुस्लिम या हिन्दू बदमाशी करेगा, देश में क़ानून और संविधान है, उसके तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी एक के कारण पूरे संप्रदाय या जाति को तो फाँसी नहीं देनी चाहिए। मगर वह सहमत नहीं हुआ। बैठक समाप्त हुई तो वह यह कहते हुए निकला कि गांधी और नेहरु का कोई जात है? वह देश का गद्दार था। साले ने देश बर्बाद कर दिया। देश को तोड़ा भी और मुसलमानों का मन बढ़ाया।
मुझे ग़ुस्सा आ रहा था, लेकिन मैं यह समझ भी रहा था कि इसके पीछे कौन लोग हैं जो नया पाठ पढ़ा रहा है। मैंने उससे कहा कि झूठ मत बोलिए। गांधी-नेहरु की आलोचना हो सकती है, लेकिन गाली मत दीजिए। जो वर्षों-बरस देश की आज़ादी के लिए जेलों में रहे, वह गद्दार था और जो आपको सिखा रहा है, वह अंग्रेज़ों के तलुवे चाट रहा था, वह राष्ट्रभक्त हो गया? किसान मेरी बात से शायद ही सहमत हुआ होगा।
वर्षों से गाँव-देहात में राष्ट्रवाद का एक नया पाठ पढ़ाया जा रहा है। वह आसानी से उतरेगा नहीं। मैंने गाँव में देखा कि लगभग हर घर में काले रंगों में विद्रूप किए गए राम के झंडे फहरा रहे हैं। एक बैठक में मैंने कहा भी कि कुछ वर्षों से तथाकथित धार्मिकता क्यों उफान पर है? घर की स्त्रियॉं, बहुएँ और बेटियाँ धार्मिक जुलूसों में ज़्यादा से ज़्यादा पंक्तिबद्ध क्यों हो रही हैं? क्या समाज सचमुच धार्मिक हो रहा है या इस धार्मिकता के पीछे कोई छल है? धर्म तो आत्मा और परमात्मा की तलाश है। क्या हर घर में इस तलाश की भँवर उठी है या धर्म के पीछे कोई षड्यंत्र है?

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







