इस उदास पृथ्वी पर युद्ध के खिलाफ संगीत के सुर हवा में तैर रहे हैं। मशहूर संगीतकार अली घामसारी ने बीच सड़क पर दरी बिछाकर ईरानी वाद्य छेड़ दिया हैं। गिरे बम या मिसाइल – अली के सुर उम्मीद की शाश्वत किरणें बन कर उभर रही हैं। उम्मीद की अनोखी किरण। विध्वंसक और सत्ता के मद में चूर ट्रंप ने सिर्फ़ कहा कि ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया जायेगा और ऐसी तबाही मचायी जाएगी कि ईरान के लिए क़यामत की रात होगी। जनता डरी नहीं। सुखद आश्चर्य, ईरान थर्राया नहीं, हज़ारों ईरानी परमाणु संयंत्रों के आसपास हाथों में हाथ लेकर खड़े हो गए। फ़िरदौसी के शाहनामे से पुकार उठी। हज़ारों रुस्तम कदमताल करते निकल पड़े। रूस्तम का प्रेम पुकार उठा।
सच्ची सभ्यता चुनौतियों को स्वीकार करती है। मृत्यु उसे डराती नहीं, बल्कि मृत्यु को वह वरण करती है। युद्ध के खिलाफ ईरानियों के इस जज़्बे में गांधी भी हैं और बुद्ध भी। ईरानी घर-घुसडे लोग नहीं हैं कि दरवाज़े पर कुत्ते की तरह ‘हुआ-हुआ’ करो और जब युद्ध का मैदान चुनौती दे तो पूछ हिलाते हुए ‘म्याऊँ-म्याऊँ’ करने लगो। ईरान की आत्मा जीत गई है। ट्रंप जीते-जी मर चुका है। जिस देश के पास संगीत, कला, साहित्य , संकल्प, साहस और निडरता हो, उसे कोई नहीं हरा सकता।
ईरानी जनता ने एक नयी राह दिखाई है और हमारे देश में ढोंग और पाखंड सिर पर बोल रहा है। उसे विश्वगुरु बनना है डंडा लेकर। मोहन भागवत कह रहे हैं- ‘संघ डंडा लेकर खड़ा रहेगा, देश को विश्वगुरु बनाएं संत।’ डंडा से कौन विश्वगुरु हुआ है? घर के गुरु तो हैं नहीं? विश्वगुरु बनने के लिए उन्हें लोगों को गौ का भक्त बनाना है। किस कोने में वे संत हैं? देश को आनंद का देश बनाना है तो हिन्दुओं की जाति-व्यवस्था का विनाश करें। मोहन भागवत की सुरक्षा में भारत सरकार की जेड श्रेणी के सिपाही लगे हैं। अपनी सुरक्षा तो कर नहीं सकते, लेकिन इस देश को हाँकने की बीमारी हो गई है।
विश्व की रक्षा डंडों, बमों, मिसाइलों से नहीं होगी, न होगी नफ़रत और खूनी- खेल खेलने से। विश्व की रक्षा तो किसी की वायलिन और किसी की शहनाई करेगी। किसी की तान और किसी के स्वर से ही हमें उम्मीदें हैं। कला ही रच सकती है और दर्शन ही सपने देख सकता है।
नेतन्याहू की काली आत्मा और ट्रंप के विषैले नखदंत आते-जाते रहेंगे, लेकिन अली घामसारी की कथा हर वक़्त अक्षुण्ण रहेगी। हरिवंश राय बच्चन की एक लंबी कविता है- ‘है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?’ उसकी अंतिम हिस्से की कुछ पंक्तियाँ हैं-
“क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।”
हाथ हमारे कमज़ोर ही सही, मगर अपनी देहरी पर एक दीपक ही जलायें। युद्ध अगर बदतमीजों के हथियार हैं तो गुनगुनाना इंसानों के। सभ्यताएँ गुनगुनाने से समृद्ध होंगी। जिस लाइब्रेरी पर अमेरिका ने बम गिराए, किताबें धूल और मलबों में दब गई। लेकिन एक मुसाफ़िर आया और किताबों को पुनः लाइब्रेरी में सजाने लगा। युद्धखोरों का सच्चा सामना तो किताबों के पन्नों में मौजूद अपरिमित भावनाएँ और विचार ही करेंगे।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






