बगीचा मंजरियों की खुशबू से महमह कर रहा है। पूर्व क्षितिज पर सूर्य का बड़ा-सा लाल गोला दाखिल हो रहा है। साफ निरभ्र आकाश। भोली, प्यारी-सी ठंड। आते-जाते इक्के-दुक्के लोग। आम में ताजगी है तो मटर में निराशा। मटर के पौधे विदा हो रहे हैं। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन लिखते हैं –
”यह सांझ-उषा का आँगन, आलिंगन विरह-मिलन का; चिर हास-अश्रुमय आँगन रे इस मानव जीवन का!"
मानव जीवन क्या प्रकृति से अलग होता है? जो क्रिया-प्रतिक्रिया प्रकृति में होती है, वही जीवन में होती है। चिर हास-अश्रुमय आंगन – यह नियति है इस जीवन का। विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है। आम में बौर आने वाले हैं और मटर की जवानी पीली पड़ गई है। बचपन मिलन और विरह की परवाह नहीं करता, जवानी भरपूर अहसास करती है और बुढापा डरा हुआ रहता है। बुढ़ापे में छूटने का अहसास ज्यादा होता है, इसलिए हर चीज को पकड़ना चाहता है। मुकेश ने गाया है न, एक गाना –“लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया/ बुढ़ापा देख कर रोया।” इन पंक्तियों के बाद फिर स्वर गूँजता है –’बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है।’
महात्मा बुद्ध ने बुढ़ापे से सबक ली और जीवन की सार्थकता की तलाश में जुट गए। महात्मा गांधी बूढ़े हो गए थे, लेकिन अपने बुढ़ापे पर रो नहीं रहे थे। उनसे तो गोडसे की जवानी परेशान थी। जवानी पिस्तौल की गोलियाँ दाग रही थीं और बुढापा तन कर खड़ा था। ऐसी जवानी भी किस काम की कि बुढ़ापे से परेशान रहे? बुढ़ापे का भी एक सौंदर्य होता है। दुनिया में आगमन जितना सुखद होता है और विदाई उससे ज्यादा सुखद होनी चाहिए। आगमन का सौंदर्य शायद कुछ अभिमान भी पैदा करे, लेकिन बुढ़ापे का सौंदर्य हर वक्त उदार बनाता है।
जो देश विश्वगुरु बनने को उतावला है, उसकी जवानी क्यों उबली हुई है और बुढापा क्यों परेशान है? बुढ़ापा जो अनुभवों से लबरेज रहता है, वह इतना उपेक्षित क्यों है? जवानी दिशाहीन क्यों है? जवानी बुढ़ापे को क्यों दुत्कारती है और बुढापा जवानी पर क्यों खींजता रहता है? दोनों में गहरी दोस्ती होनी चाहिए, लेकिन आज दोनों एक-दूसरे को पहचानना नहीं चाहते! खैर। सी पी कवाफी की कविता है – ‘एक बूढ़ा आदमी’। उसकी पंक्तियाँ देखिए –
“कहवाघर के शोर-शराबे वाले छोर पर, सिर झुकाए
मेज़ पर एक वृद्ध बैठा है अकेला,
एक अख़बार उसके सामने।
और बुढ़ौती के चुके हुए आलम में
वह सोचता है कितना कम उन सालों
का वह आनंद ले पाया
जो ताक़त, हाज़िरजवाबी और ख़ूबसूरती से लबरेज़ थे।
वह जानता है यह वयोवृद्ध हो गया है वह इसे देखता है,
महसूस करता है
लगता तब भी ऐसा है गोया वह जवान था अभी कल तक तो।
इतना संक्षिप्त एक अंतराल, इतना संक्षिप्त।
और वह सोचता है दुनियादारी के बारे में,
इसने कैसे उसे उल्लू बनाया,
कैसे वह हमेशा विश्वास करता था—क्या दीवानगी थी—
उस ठग पर जिसने कहा था : 'कल। तुम्हारे पास है बहुत समय।'
उसे याद है लगाम कसी उफ़नती धड़कनें, आनंद
जिसका त्याग किया उसने।
हरेक मौक़ा जो उसने खोया खिल्ली उड़ाता है उसकी ख़रदिमाग़
चौकसी पर
लेकिन इतना सोचना, इतना उतरना यादों में
बूढ़े को चकरा देता है।
उसे नींद आ जाती है,
उसका माथा आराम कर रहा है कहवाघर की मेज़ पर।”
आम के मंजर और मटर के सूखते पंजर एक सच्चाई है। इन सच्चाइयों से खेलता जीवन है। जीवन इस हालत में रससिक्त होना चाहिए।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







