इन दिनों : बुढ़ापा और जवानी: सौंदर्य और उदासी

"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से

”यह सांझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;                                                                                      चिर हास-अश्रुमय आँगन                                                                                             रे इस मानव जीवन का!"
“कहवाघर के शोर-शराबे वाले छोर पर, सिर झुकाए
मेज़ पर एक वृद्ध बैठा है अकेला,

एक अख़बार उसके सामने।
और बुढ़ौती के चुके हुए आलम में

वह सोचता है कितना कम उन सालों
का वह आनंद ले पाया

जो ताक़त, हाज़िरजवाबी और ख़ूबसूरती से लबरेज़ थे।
वह जानता है यह वयोवृद्ध हो गया है वह इसे देखता है,

महसूस करता है
लगता तब भी ऐसा है गोया वह जवान था अभी कल तक तो।

इतना संक्षिप्त एक अंतराल, इतना संक्षिप्त।
और वह सोचता है दुनियादारी के बारे में,

इसने कैसे उसे उल्लू बनाया,
कैसे वह हमेशा विश्वास करता था—क्या दीवानगी थी—

उस ठग पर जिसने कहा था : 'कल। तुम्हारे पास है बहुत समय।'
उसे याद है लगाम कसी उफ़नती धड़कनें, आनंद

जिसका त्याग किया उसने।
हरेक मौक़ा जो उसने खोया खिल्ली उड़ाता है उसकी ख़रदिमाग़

चौकसी पर
लेकिन इतना सोचना, इतना उतरना यादों में

बूढ़े को चकरा देता है।
उसे नींद आ जाती है,

उसका माथा आराम कर रहा है कहवाघर की मेज़ पर।”
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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