सामान्य-सा दिन है। न बादल है, न सूर्य ग़ुस्से में है। कल जहाँ कोयल कूकती थी, आज भी वहीं कूक रही थी। उसने ‘कू-ह-कू-ह’ में तान दी तो मैंने भी ‘कू-कू’ किया। मेरी ‘कू-कू’ सुन थोड़ी देर कोयल चुप रही, फिर वैसी ही तान छेड़ दी। मैंने अनुभव किया है कि जंगलों में चिड़िया कम रहती है, गाँवों की तुलना में। लगता है, उसे भी मनुष्य की संगति चाहिए या संभव है कि उसे गाँवों में दाना-पानी आसानी से मिल जाता हो।
मनुष्य ने ही सबसे ज़्यादा जंगली जानवरों को पालतू बनाया। अपने लाभ के लिए युद्ध से लेकर घरेलू कामों के लिए जानवरों और पक्षियों का इस्तेमाल किया। मौजूदा वक़्त में जिस परिवार में थोड़ा पैसा हो जाता है, वह बाज़ार से कुत्ता ख़रीद लाता है। उनके घर जाइए तो बिस्तर पर या सोफे पर कुत्ता पड़ा रहता है। संपत्ति के साथ कुत्ता-प्रेम का अन्योन्याश्रय संबंध हो चला है। इस पेंचाहा युग में लोग बिज़नेस के लिए तरह-तरह के कुत्ते पैदा कर रहे हैं। दुनिया में कुत्ते की लगभग 450 क़िस्म की नस्लें हैं। इनमें क्रास ब्रीडिंग के सहारे तरह-तरह के कुत्ते पैदा किए जा रहे हैं।
खैर, कुछ लोग तो कुत्ते का व्यापार कर धन कमा रहे हैं। यहाँ तो ऐसे शातिर लोग हैं, जो कुछ लोगों के गले में पट्टा डाल कर सत्ता के मजे ले रहे हैं। आज़ादी मिली तो भारतीयों को वयस्क मताधिकार मिला। संविधान ने गारंटी दी कि हर भारतीय को वोट देने का अधिकार है और सभी के वोट बराबर होंगे। संविधान के इस मूलभूत अधिकार को चुनाव आयोग ही नष्ट कर रहा है। एक तो उसे एस आई आर कराने का अधिकार नहीं है। दूसरे, अगर वह कराता है तो उसे इस बात की गारंटी देनी होगी कि इस प्रक्रिया में कोई नागरिक छूटे नहीं। लेकिन चुनाव आयोग के अध्यक्ष के गले में संवैधानिक पट्टा नहीं, सरकारी पट्टा है।
बंगाल में सत्ताईस लाख वोटर के नाम नहीं चढ़ रहे और कहा जा रहा है कि ये लोग अगले चुनाव में वोट करेंगे। इतनी बेशर्मी कहाँ से लाते हो भाई! संविधान की सरेआम खिल्ली उड़ायी जा रही है। संवैधानिक संस्था ही भारतीय नागरिकों को मताधिकार से बेदखल कर रही है। मजा यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक ने इस संदर्भ में सही-सही फ़ैसला नहीं दिया। बल्कि वह भी ऐसे निर्णय के साथ रहा।
मतदाता सूची में अगर एक भी नागरिक शामिल नहीं हो पाता है तो आयोग कटघरे में आता है। यहाँ तो हालत यह है कि सत्ताईस लाख वोटर मतदाता सूची में नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसके लिए खेद नहीं है, न गृह मंत्री अमित शाह को। इन्हें चाहे जैसे भी हो, बंगाल चुनाव जीतना है। संविधान जाये भाड़ में। बंगाल में सरकार जितनी गंदी हरकत कर सकती है, कर रही है। साज़िश, सत्ता का दुरुपयोग, लुंजपुंज चुनाव आयोग, सेंट्रल फोर्स की तैनाती, अफ़वाहबाजी।
प्रधानमंत्री की भाषा देश बाँटने वाली भाषा है। हर वक़्त हिन्दू-मुस्लिम करना प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता। जो भी हो आजकल दुनिया में सफल वही हैं, जो दूसरे को इस्तेमाल करना जानता है। मनुष्य ने सिर्फ़ जानवरों और पक्षियों का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि मनुष्य ने मनुष्य का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। आज भी कर रहा है। एक मात्र प्रकृति है जो इस्तेमाल की भाषा नहीं जानती है। वह तो लुटाती है, बटोरती नहीं है। हर सुबह देखता हूँ – पेड़-पौधे भी शांत रहते हैं। मौसम में अमूमन कोई व्यतिरेक नहीं रहता।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







