इन दिनों : सत्ता की शाकाहारी मछलियाँ 

"बंगाल में इन्होंने मछली खा ली तो वह मछली शाकाहारी हो गयी और जब ये अरुणाचल जायेंगे, जहाँ लोग कुत्ते को प्यार से खाते हैं, वहाँ ये लोग कुत्ते खायेंगे और कहेंगे कि मैंने शाकाहारी कुत्ता खाया।" - इसी आलेख से

आदत और बोली दोनों बिगड़ गयी है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर और मनोज तिवारी ने एक नयी खोज की है। बंगाल में जाकर इन्होंने ‘शाकाहारी मछली’ का पता लगाया है। बंगाल हैरान है कि उसे ऐसी मछली का अब तक पता नहीं चला था और अनुराग ठाकुर और मनोज तिवारी ने एक ही दिन में ऐसी मछली की खोज कर डाली। वाह रे भारत के लाल! लगे रहो। जिसके साथ रहते हो, वह इससे बड़ा ज्ञान नहीं दे सकता। आप सोचिए कि जनता को ये लोग कैसे बेवक़ूफ़ बनाते हैं। बंगाल में इन्होंने मछली खा ली तो वह मछली शाकाहारी हो गयी और जब ये अरुणाचल जायेंगे, जहाँ लोग कुत्ते को प्यार से खाते हैं, वहाँ ये लोग कुत्ते खायेंगे और कहेंगे कि मैंने शाकाहारी कुत्ता खाया।

आजकल सांसद पप्पू यादव एक अलग राग अलाप रहे हैं। उन्हें अलग से पता चला है कि सत्तर-अस्सी प्रतिशत महिलाएँ किसी की अंकशायिनी बन कर सांसद या विधायक बनती हैं। इसके लिए दोषी कौन है? स्त्री या पुरुष? पुरुष सत्ता को तोड़े बिना स्त्रियाँ मुक्त नहीं हो सकतीं। बीजेपी की महिला विधायक पप्पू यादव के बयान पर उत्तेजित हो गयीं। उन्हें उत्तेजित होना चाहिए, लेकिन उनकी उत्तेजना महिलाओं की इज़्ज़त तार-तार करने वाले बृजभूषण शरण सिंह, कुलदीप सेंगर, राम रहीम आदि पर भोथरी क्यों हो जाती है? पटना में हाल-फ़िलहाल एक लड़की के साथ बलात्कार और उसकी हत्या हुई, उस पर वे  चुप क्यों हैं? इसका मतलब है कि वे भी पुरुष के एजेंडे के तहत ही विरोध कर रही हैं। पप्पू यादव और श्रेयसी सिंह का सिरा एक ही जगह पर जुड़ता है । 

वीर कुँअर सिंह की जयंती थी। भागलपुर में मुख्य अतिथि बन कर आये – महिला पहलवानों का शोषण करने के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह। मंच पर क्षत्रियों की जमात बैठी थी। सभी दलों के क्षत्रिय नेता और शिक्षाविद। वीर कुँअर सिंह पर अब क्षत्रियों का एकाधिकार है। बृजभूषण शरण सिंह ने और बातें भी कहीं, लेकिन उन्हें ‘बिना खड्ग, बिना ढाल’ गांधी पसंद नहीं हैं। जयंती है वीर कुँअर सिंह की और आलोचना हो रही है महात्मा गांधी की। सुनते हैं कि उन्होंने डॉ अम्बेडकर को भी संविधान निर्माता के पद से बेदखल कर दिया। महात्मा गांधी और डॉ अम्बेडकर उन्हें पसंद क्यों आयेंगे। उन्होंने ही तो उनकी कुर्सियाँ छीनी हैं। बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि वे राम, कृष्ण, बुद्ध और जैन के वंशज हैं तो भारत के और लोग क्या विदेश से आये हैं? खैर। अनुराग ठाकुर, मनोज तिवारी, बृजभूषण शरण जैसे लोग इसलिए पैदा ले रहे हैं, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था चौपट होती जा रही है। अज्ञानता ही फ़िलहाल ज्ञान बन गयी है । 

लगभग दस महीने से ति० माँ० भागलपुर विश्वविद्यालय में न कुलपति हैं, न प्रति कुलपति। प्रति कुलपति तो लगभग दो साल से नहीं है। कुलाधिपति जहाँ रहते हैं, उसे पहले राजभवन कहा जाता था, लेकिन नाम बदलने के शौकीन सरकार ने राजभवन को लोकभवन कर दिया। उसे लगा कि नाम बदलने से लोक का काम धड़ाधड़ होने लगेगा। लोकभवन में रहनेवाले कुलाधिपति एक अदना कुलपति भी समय पर नियुक्त नहीं कर सकते। सरकार भी कैसी, उसे विष्णुपद मंदिर चमकाना है। नीतीश कुमार पढ़े-लिखे थे, लेकिन विश्वविद्यालयों को उन्होंने भी तबाह कर दिया।

लोकभवन में रहनेवाले कुलाधिपति निजी शिक्षण संस्थानों में भी पहुँच जाते हैं। उनके अपने शिक्षण संस्थानों की हालत ख़राब है। लेकिन लाट साहब तो लाट साहब होते हैं। आजकल के साहबों की पहली ज़िम्मेदारी है कि कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। किसकी हिम्मत है कि लाट साहब से मुँह लगाये। शिक्षकों और कर्मचारियों के महासंघ गूँगे-बहरे हैं। सिनेट और सिंडिकेट के माननीय सदस्यों को अपने-अपने काम हैं। वे भी सँभल कर बोलेंगे। कहीं उनका सीआर ख़राब नहीं हो जाय। रहे शिक्षकों और स्नातकों के एम० एल० सी० यानी बिहार विधान परिषद के सदस्यगण – वे अपनी-अपनी पार्टी और लोटे के प्रति प्रतिबद्ध हैं। सभी हुजूर की गर्दन कहीं-न-कहीं फँसी है।

विश्वविद्यालयों में पार्टी के छात्र संगठन भी हैं। उनकी चाल, चरित्र और चेहरे में घुन लग गई है। वे आदमी, समय और ज़रूरत के मुताबिक़ हल्ला करते हैं। उनकी भी मजबूरी है कि वे भी पार्टी निर्देशों का पालन करें। कुलाधिपति पर आरोप लगता रहा है कि वे करोड़ों-करोड़ लेकर कुलपति की नियुक्ति करते हैं। मैं बीसों बरस से देख रहा हूँ कि समय पर कुलपति की नियुक्ति नहीं होती और जिनकी होती है, वे अकादमिक नहीं होते। जब ऐसे कुलपति विश्वविद्यालय में योगदान करते हैं तो उन्हें वैसी फाइलों और वैसे लोगों की तलाश रहती है, जो उन्हें धन इकट्ठा कर दे। विश्वविद्यालय अब ज्ञान का केंद्र नहीं है, कुलपति आदि के धन कमाने और शाकाहारी मछलियों के उत्पादन का केंद्र बन गया है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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