आज डॉ भीमराव अम्बेडकर की जयंती है। वे लोग जो मन-ही-मन डॉ अम्बेडकर से नफ़रत करते हैं, वे भी उन्हें पुष्प अर्पित करेंगे और वे लोग तो स्वाभाविक रूप से करेंगे, जिनकी ज़िंदगी उनके होने से बदली है। सदियों से जिन्होंने प्रताड़ना सही है और जिनको मनुष्य तक मानने से इंकार किया, उनमें मनुष्यता-बोध जगा है और अपने होने के बोध का अहसास हुआ है।
हिन्दू समाज का जो भयानक दुर्गुण है, वह जाति ही है। जाति को क़ायम रखते हुए कोई हिंदू अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता। दुर्भाग्य यही है कि ज़्यादातर हिंदू जाति बचाने में लगे हैं। डॉ भीमराव अम्बेडकर ने किताब ही लिखी है- जाति का विनाश। मेरा मन यह स्वीकार नहीं कर पाता कि जाति को क़ायम रखते हुए यह समाज सिर उठाने के क़ाबिल कैसे हो सकता है? हिन्दू पंथी जितने भी संगठन और चिंतक हैं, वे जाति को बनाए और सुसज्जित करते हुए हिन्दू एकता की बात करते हैं। ये मक्कार लोग हैं और छल-छद्मी हैं। ये हिन्दू समाज के साथ एक बार फिर ठगी का धंधा कर रहे हैं। हिन्दू संगठनों को देखिए तो उनके नेता या तो उच्चवर्णी हैं या मनुवाद के मुखौटे हैं। मुखौटों को सिर्फ़ इस्तेमाल किया जाता है और एस सी/ एस टी और पिछड़े वर्ग का एक तबका बाक़ायदा इसमें शामिल है और मनुवाद की ढोल पीट रहा है।
यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि जब भारत आज़ाद हुआ और डॉ भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में संविधान बना तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दिल्ली के रामलीला मैदान में डॉ अम्बेडकर के पुतले और संविधान को जलाया। आज मोहन भागवत यह कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना देश को आज़ादी दिलाने के लिए हुई थी। दुनिया में इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी, उस समय भगत सिंह से लेकर गांधी तक ब्रिटिश सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे।
पूछा जा सकता है मोहन भागवत जी से कि एक भी व्यक्ति का नाम बताइए जो आरएसएस का हो और देश के लिए कुर्बान हुआ हो? उस समय के जो भी उन्मादी संप्रदाय आधारित संगठन थे- चाहे वह हिन्दू महासभा हो या मुस्लिम लीग हो या आरएसएस हो- सभी-के-सभी अपने–अपने संप्रदाय में कट्टरता के बीज बो रहे थे। देश को तोड़ने के लिए इन्हीं लोगों ने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया, जिनमें एक हिन्दू महासभा के सावरकर थे और दूसरे मुस्लिम लीग के जिन्ना थे। सिद्धांत देनेवाले ये लोग थे। सांप्रदायिक विद्वेष ये लोग फैला रहे थे और यही लोग गांधी, नेहरु को देश तोड़ने के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। आज़ादी के मूल्यों को कुचलने के लिए ये लोग संगठित हो गए हैं।
इस युग का सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि ये लोग डॉ भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं और उनके द्वारा बनाए गये संविधान की खिल्ली उड़ा रहे हैं। आज़ादी के पूर्व समाज में मनुस्मृति का बोलबाला था और आज़ादी के बाद संविधान आया। मनु को डॉ अम्बेडकर ने बेदखल कर दिया, लेकिन मनु की औलादों को चैन कहाँ है, वे संविधान पर लगातार हमला कर रहे हैं।
मनुवादी विचारधारा बहुरूपिया है। बहुरूपिया के लिए सत्य-असत्य का कोई मतलब नहीं होता, इसलिए आप देखेंगे कि अलग-अलग मंच पर प्रधानमंत्री हो या आरएसएस चीफ – सर्वथा अलग-अलग बयान देते हैं। वे देश की जनता को भरमाते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि मनुवादी व्यवस्था क़ायम रहे और उन्हें लाभ मिलता रहे। आज हमारा प्राथमिक दायित्व है कि मनुवादी सामाजिक ऑर्डर को ध्वस्त करें और संविधान और आज़ादी के मूल्यों की रक्षा करें।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







